अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | लंदन | 1 नवंबर 2026
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने देश के ऐतिहासिक दास व्यापार में ब्रिटेन की भूमिका के लिए औपचारिक माफी मांगने की संभावना जताई है। हालांकि, उन्होंने गुलामी के पीड़ितों और उनके वंशजों को आर्थिक मुआवजा देने की मांग को खारिज कर दिया है।
बर्नहैम ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को प्रकाशित अपने एक लेख में यह रुख सामने रखा। यह बयान अगले सप्ताह एंटीगुआ और बारबुडा में होने वाली राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों की बैठक (CHOGM) से पहले आया है।
ब्रिटेन से लंबे समय से दास व्यापार और औपनिवेशिक शासन के दौरान किए गए शोषण के लिए माफी मांगने और मुआवजा देने की मांग होती रही है। भारत सहित कई देश ब्रिटिश शासन के ऐतिहासिक अन्याय के लिए जवाबदेही की मांग उठाते रहे हैं।
माफी की बात, लेकिन मुआवजे से पीछे हटे प्रधानमंत्री
एंडी बर्नहैम ने कहा कि उनकी सरकार ब्रिटेन की दास व्यापार में ऐतिहासिक भूमिका के लिए औपचारिक माफी के विचार के लिए तैयार है। लेकिन उन्होंने आर्थिक मुआवजे की मांग का समर्थन नहीं किया।
बर्नहैम ने दलील दी कि आज के ब्रिटिश नागरिकों को इतिहास में हुए अन्याय के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह उन्होंने माफी की संभावना तो जताई, लेकिन गुलामी के पीड़ितों और उनके वंशजों को आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का रास्ता बंद कर दिया।
शशि थरूर ने औपनिवेशिक इतिहास को नजरअंदाज करने पर उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बर्नहैम के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ब्रिटेन के औपनिवेशिक इतिहास का उल्लेख नहीं किए जाने को ‘अक्षम्य’ बताया।
थरूर की आपत्ति इस बात पर है कि ब्रिटेन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी की चर्चा केवल दास व्यापार तक सीमित नहीं हो सकती। भारत जैसे देशों पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के प्रभाव, आर्थिक शोषण और ऐतिहासिक अन्याय को भी इस बहस में शामिल करना जरूरी है।
राष्ट्रमंडल बैठक से पहले बढ़ी ऐतिहासिक जवाबदेही की मांग
एंटीगुआ और बारबुडा में अगले सप्ताह होने वाली राष्ट्रमंडल देशों की बैठक से पहले ब्रिटेन का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गुलामी और औपनिवेशिक शासन से प्रभावित देशों में लंबे समय से मांग उठती रही है कि ब्रिटेन अपने अतीत की जिम्मेदारी स्वीकार करे।
ब्रिटेन की ओर से औपचारिक माफी की संभावना जताना एक कदम हो सकता है, लेकिन मुआवजे से इनकार और औपनिवेशिक इतिहास पर सीमित चर्चा ने बहस को फिर तेज कर दिया है।
सवाल यह है कि क्या ब्रिटेन केवल माफी मांगकर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से आगे बढ़ जाएगा, या भारत सहित उन देशों के साथ औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए शोषण और नुकसान पर भी खुलकर जवाबदेही स्वीकार करेगा।


