
जब हक़ छिनें, आवाज़ दबे और ख़्वाब टूटें—तब सर सैयद और भी ज़रूरी हो जाते हैं!
जब अंधेरे बढ़ते हैं, सर सैयद की रौशनी और ज़रूरी हो जाती है! AMU लाइब्रेरी की जुबानी समझें कि जब हक छिनने लगें, आवाज़ें दबने लगें और नौजवानों के ख्वाब व रोजगार शक के अंधेरे में खोने लगें, तब सर सैयद की वो रोशनी और भी तेज हो जाती है जो इल्म को सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि सोचने, सवाल करने और अपनी जबान आजाद रखने का हथियार मानती थी। अलीगढ़ की लाइब्रेरी आज भी उसी रौशनी को अपने पन्नों में संभाले हुए है।








