ओपिनियन/ राजनीति | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 नवंबर 2026
“आरंभ है प्रचंड, रास्ता भी प्रचंड बनाना पड़ेगा।” 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान और राजधानी की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने विपक्ष की राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह जनआक्रोश केवल एक दिन की रैली और नारों तक सीमित रहेगा या इसे लोकतंत्र, मताधिकार और संवैधानिक जवाबदेही की लंबी लड़ाई में बदला जाएगा?
INDIA bloc की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली और मार्च में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इस जुटान को केवल राजनीतिक दलों के समर्थकों की भीड़ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें ऐसे नागरिक भी शामिल थे, जो अपने खर्च पर दिल्ली पहुंचे और मतदाता सूची, वोट देने के अधिकार तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर अपनी आवाज उठाना चाहते थे।
इस आयोजन की तुलना 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण की रामलीला मैदान में हुई ऐतिहासिक रैली से भी की जा रही है, जब उन्होंने तत्कालीन सत्ता को चुनौती देते हुए ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ का नारा दिया था। हालांकि दोनों आयोजनों का राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ अलग है, लेकिन दोनों में जनता की भागीदारी और सत्ता से जवाब मांगने का सवाल प्रमुख रहा।
अब सिर्फ भाषण नहीं, जवाबदेही की ठोस योजना चाहिए
1 नवंबर की रैली ने विपक्ष के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी रख दी है। लाखों लोगों को दिल्ली बुलाना, मंच सजाना और नेताओं के भाषण कराना अपने आप में आंदोलन की मंजिल नहीं हो सकता। लोग केवल भाषण सुनने नहीं आए थे। वे यह जानना चाहते थे कि उनके वोट, उनकी पहचान और उनके संवैधानिक अधिकारों पर उठे सवालों के बाद आगे क्या किया जाएगा।
रैली में राहुल गांधी और INDIA bloc के दूसरे नेताओं ने स्पष्ट किया कि ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग और चुनावी प्रक्रिया की जवाबदेही का मुद्दा आगे भी उठाया जाएगा। लेकिन अब इस संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एक सार्वजनिक कार्ययोजना की जरूरत है।
विपक्ष को बताना होगा कि आगे कौन-से कानूनी कदम उठाए जाएंगे, किन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की मांग होगी, मतदाता सूची में नाम कटने से प्रभावित लोगों की मदद कैसे की जाएगी और नागरिकों की भागीदारी किस तरह सुनिश्चित होगी।
लोगों को केवल यह सुनना पर्याप्त नहीं कि लड़ाई जारी रहेगी। उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि इस लड़ाई में उनकी भूमिका क्या होगी।
SIR की चोट: वोट के साथ पहचान का सवाल
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का मुद्दा इस पूरे आंदोलन के केंद्र में है। विपक्ष ने मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा किया है। यह संख्या और इसके आधार पर उठाए गए सवाल देशव्यापी राजनीतिक बहस का विषय बने हुए हैं।
इस विवाद को केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आम नागरिक के लिए मतदाता पहचान पत्र सिर्फ चुनाव के दिन मतदान करने का दस्तावेज नहीं है। यह उसकी नागरिक पहचान और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रमाण है।
समाज के बड़े हिस्से के लिए पहचान हासिल करना हमेशा आसान नहीं रहा। गरीब, मजदूर, विस्थापित और वंचित समुदायों के लोगों ने वर्षों तक दस्तावेजों और सरकारी पहचान के लिए संघर्ष किया है। आधार कार्ड ने करोड़ों लोगों को एक पहचान दी। इसी तरह मतदाता पहचान पत्र ने उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अधिकार दिया।
ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो उसके लिए यह केवल एक प्रशासनिक परेशानी नहीं रह जाती। वह अपने अधिकार और पहचान पर संकट महसूस करता है।
माया देवी की पीड़ा ने उठाया बड़ा सवाल
जन संसद में सिविल सोसाइटी के निखिल डे के साथ पहुंचीं माया देवी की बात इस पूरे विवाद का मानवीय पक्ष सामने रखती है। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “मेरा घर गिरा दिया, मेरी आईडी भी खत्म कर दी।”
यह एक छोटा वाक्य है, लेकिन इसके भीतर एक नागरिक की बेबसी और पहचान खोने का दर्द छिपा है। जिन लोगों के लिए घर और पहचान दोनों जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं, उनके लिए इनका छिन जाना कितना बड़ा संकट हो सकता है, इसे समझना जरूरी है।
माया देवी का सवाल केवल उनका निजी सवाल नहीं है। यह उन तमाम लोगों की चिंता को सामने लाता है जो दस्तावेजों, पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
SIR को लेकर उठे सवालों का जवाब केवल आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता। प्रभावित नागरिकों की समस्याओं, नाम हटाए जाने के आधार, आपत्तियों के निस्तारण और अपील की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से सामने रखना जरूरी है।
ज्ञानेश कुमार और न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल
इस आंदोलन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में करोड़ों लोगों के अधिकार प्रभावित हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की भूमिका और SIR से संबंधित न्यायिक फैसलों पर भी राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस हो रही है। इस संदर्भ में न्यायिक आदेशों, उनके वास्तविक दायरे और मतदाता सूची पर पड़े प्रभाव को दस्तावेजों के आधार पर समझना आवश्यक है।
विपक्ष और नागरिक संगठनों को उन मामलों का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखना चाहिए, जिनके आधार पर वे निर्वाचन आयोग और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।
यह सवाल केवल किसी एक पदाधिकारी का नहीं है। सवाल यह है कि यदि किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? उसे न्याय कैसे मिलेगा? और ऐसी गलती दोबारा न हो, इसकी गारंटी कौन देगा?
नूरेमबर्ग ट्रायल्स की चर्चा और जवाबदेही की मांग
इस पूरे आंदोलन के बीच जर्मनी के नूरेमबर्ग ट्रायल्स का उदाहरण भी सामने आया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नाजी शासन के प्रमुख नेताओं पर अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण में मुकदमे चलाए गए थे। इन मुकदमों ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सत्ता में होना किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं कर देता और गंभीर अपराधों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है।
भारत के मौजूदा राजनीतिक विवाद को सीधे नूरेमबर्ग ट्रायल्स के बराबर नहीं रखा जा सकता। लेकिन इस उदाहरण के माध्यम से एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—यदि किसी संवैधानिक संस्था, सरकारी अधिकारी या किसी अन्य जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ गंभीर अनियमितताओं के प्रमाण सामने आते हैं, तो जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और प्रभावी होगी?
क्या चुनावी प्रक्रिया से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की जरूरत है? क्या ऐसे मुकदमों की सुनवाई का सीधा प्रसारण होना चाहिए? क्या जांच और जवाबदेही तय करने के लिए स्वतंत्र आयोग बनाया जाना चाहिए?
ये सवाल सार्वजनिक बहस और कानूनी परीक्षण की मांग करते हैं।
उद्योगपतियों से लेकर अधिकारियों तक, जवाबदेही का दायरा स्पष्ट हो
आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावित करने के आरोपों की जांच केवल राजनीतिक पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें उन सभी लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए जिनके खिलाफ ठोस दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध हों।
इस दायरे में उद्योगपति, निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी, सरकारी विभागों के जिम्मेदार कर्मचारी, जांच एजेंसियों के अधिकारी, नौकरशाही और मीडिया संस्थानों की भूमिका से जुड़े सवाल भी शामिल किए जा सकते हैं।
लेकिन इसके लिए नामों की सूची या राजनीतिक भाषण पर्याप्त नहीं होंगे। हर व्यक्ति के खिलाफ विशिष्ट आरोप, संबंधित दस्तावेज, घटनाक्रम और कानूनी आधार सार्वजनिक करना होगा। किसी को केवल राजनीतिक विरोध या संदेह के आधार पर अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता। जवाबदेही का रास्ता प्रमाण, निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होकर गुजरना चाहिए।
विपक्ष को इस दिशा में कोई ठोस दस्तावेज तैयार किया है तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि देश के नागरिक जान सकें कि आगे की कानूनी लड़ाई किस आधार पर लड़ी जाएगी।
फरवरी-मार्च 2027 के चुनाव से पहले समय बहुत कम
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय की है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर में 2027 के विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों से पहले मतदाता सूची का मुद्दा सुलझाना और प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यदि मतदाता सूची में नाम हटाए जाने, नाम जोड़ने, दस्तावेजों की जांच और अपील की प्रक्रिया को लेकर लोगों की शिकायतें बनी रहती हैं, तो चुनावी तैयारी पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
विपक्ष को केवल चुनावी सभाओं और राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे बूथ स्तर पर मतदाता सूची की जांच, प्रभावित लोगों की सहायता, शिकायतों के दस्तावेजीकरण और कानूनी कार्रवाई के लिए संगठित व्यवस्था बनानी होगी।
चुनाव में समान अवसर और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची की शुद्धता सबसे बुनियादी शर्त है। इस मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल की जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
अब आंदोलन को अगला चरण देना होगा
1 नवंबर को दिल्ली पहुंचे लोगों ने अपनी नाराजगी और चिंता जाहिर कर दी। अब उनकी अपेक्षा है कि विपक्ष इस जनभागीदारी को एक संगठित लोकतांत्रिक अभियान में बदले।
लोगों को अगला कार्यक्रम चाहिए। उन्हें कानूनी लड़ाई की जानकारी चाहिए। उन्हें अपने वोट और पहचान की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था चाहिए। उन्हें यह भी जानना है कि जिन सवालों को लेकर वे सड़कों पर उतरे, उनका जवाब हासिल करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
रामलीला मैदान से उठी आवाज को केवल एक रैली की सफलता या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के आंकड़ों में नहीं समेटा जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन हर उस नागरिक तक पहुंचेगा, जो अपने वोट, अपनी पहचान और अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर चिंतित है?
आरंभ हो चुका है। अब रास्ता भी उतना ही मजबूत बनाना होगा। दिल्ली की सड़कों पर उमड़ी आवाज को दस्तावेज, कानूनी कार्रवाई, जनभागीदारी और स्पष्ट कार्ययोजना में बदलना ही इस आंदोलन की अगली कसौटी होगी।



