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स्वामी प्रसाद मौर्य का नया सियासी दांव, 2027 से पहले कांग्रेस के साथ नई बिसात!

बसपा से भाजपा, भाजपा से सपा और फिर अपनी पार्टी तक का सफर। अखिलेश यादव की नाराजगी के बीच राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत। क्या मौर्य एक बार फिर उत्तर प्रदेश के पिछड़े वर्गों की राजनीति में अपनी जगह बनाने जा रहे हैं?

उत्तर प्रदेश/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | लखनऊ | 3 नवंबर 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले दलों का बदलना, नए गठबंधन बनना और जातीय समीकरणों का पुनर्गठन कोई नई बात नहीं है। लेकिन कुछ नेताओं की राजनीतिक गतिविधियां ऐसी होती हैं, जिनका असर केवल उनकी विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहता। स्वामी प्रसाद मौर्य उन्हीं नेताओं में गिने जाते हैं।

बसपा में लंबे समय तक महत्वपूर्ण पदों पर रहने से लेकर भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने, फिर अखिलेश यादव के साथ समाजवादी पार्टी में जाने और अंततः अपनी पार्टी बनाने तक मौर्य का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियां उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ती दिखाई दे रही हैं।

2 नवंबर को उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के साथ उनकी मुलाकात ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। खास बात यह है कि यह मुलाकात उस समय हुई है, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सार्वजनिक रूप से मौर्य को INDIA गठबंधन का हिस्सा मानने से इनकार कर चुके हैं।

मौर्य का दावा है कि उनकी बातचीत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से हुई है। ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़कर उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्गों के बीच एक नया राजनीतिक आधार तैयार करना चाहती है?

बसपा से शुरू हुआ सफर, नेता प्रतिपक्ष तक पहुंचे

स्वामी प्रसाद मौर्य का सक्रिय राजनीतिक जीवन 1980 में लोकदल से शुरू हुआ। इसके बाद वह जनता दल की राजनीति में सक्रिय रहे और 1996 में बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए।

बसपा में उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वह चार बार विधायक बने और मायावती सरकार में मंत्री पद सहित संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। जनवरी 2008 में उन्हें बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हो गई, लेकिन मौर्य अपनी पडरौना सीट बचाने में सफल रहे। इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने मार्च 2012 से जून 2016 तक इस पद पर काम किया।

यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण दौर था। सत्ता में समाजवादी पार्टी थी और विपक्ष में बसपा। मौर्य विधानसभा के भीतर और बाहर अखिलेश सरकार के खिलाफ आक्रामक राजनीति कर रहे थे।

आठ जिलों के नाम बदलने का फैसला और दलित राजनीति

अखिलेश यादव सरकार ने जुलाई 2012 में मायावती सरकार के दौरान रखे गए आठ जिलों के नाम बदलने का फैसला किया था।

इनमें छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, रमाबाई नगर, भीम नगर, प्रबुद्ध नगर, पंचशील नगर, कांशीराम नगर, महामाया नगर और जेपी नगर शामिल थे।

बसपा ने इस फैसले को दलित महापुरुषों और सामाजिक प्रतीकों के सम्मान से जोड़कर सरकार का विरोध किया। स्वामी प्रसाद मौर्य ने नेता प्रतिपक्ष के रूप में इस मुद्दे पर सरकार को घेरा।

इस विवाद ने बसपा को विपक्ष में रहते हुए दलित सम्मान और सामाजिक पहचान की राजनीति करने का अवसर दिया। हालांकि इस मुद्दे को किसी चुनावी परिणाम का अकेला कारण मानना उचित नहीं होगा।

2016 : बसपा से बगावत और भाजपा में प्रवेश

जून 2016 में स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने और पार्टी को उसके मूल उद्देश्य से भटकाने के आरोप लगाए।

यह बसपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका था। मौर्य केवल एक विधायक नहीं थे, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे।

8 अगस्त 2016 को उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। उनके साथ बसपा के कुछ अन्य नेता भी भाजपा में पहुंचे।

उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा गैर-यादव पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलितों के बीच अपना आधार मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही थी।

मौर्य का भाजपा में आना इसी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया। मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जैसे समुदायों के बीच उनकी राजनीतिक पहचान भाजपा के लिए उपयोगी हो सकती थी।

2017 : भाजपा की सत्ता वापसी और मौर्य की नई भूमिका

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 312 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत हासिल किया।

स्वामी प्रसाद मौर्य पडरौना से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। उन्हें श्रम एवं रोजगार सहित महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली।

यह उनके राजनीतिक सफर का दूसरा बड़ा सत्ता परिवर्तन था।

हालांकि भाजपा की जीत को केवल मौर्य के बसपा छोड़ने का परिणाम बताना सही नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, भाजपा का व्यापक संगठन, सामाजिक गठबंधन, चुनावी रणनीति और विपक्ष की कमजोरियां भी इस जीत के महत्वपूर्ण कारण थे।

लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि मौर्य के भाजपा में आने से पार्टी को पिछड़े वर्गों के बीच अपना राजनीतिक संदेश पहुंचाने में एक अतिरिक्त चेहरा मिला।

2022 : चुनाव से पहले भाजपा को झटका, सपा में शामिल हुए

जनवरी 2022 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए।

उनके साथ कुछ अन्य विधायक भी सपा में आए। इस घटनाक्रम को भाजपा के लिए राजनीतिक झटके के रूप में देखा गया।

मौर्य के सपा में आने के पीछे पिछड़े वर्गों के बीच भाजपा के खिलाफ असंतोष और सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत करने का संदेश प्रमुख था।

अखिलेश यादव ने भी उनके आने को अपनी सामाजिक गठबंधन की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना।

लेकिन चुनाव में मौर्य को व्यक्तिगत तौर पर बड़ा झटका लगा। उन्हें पडरौना के बजाय फाजिलनगर से उम्मीदवार बनाया गया, जहां भाजपा के सुरेंद्र कुमार कुशवाहा ने उन्हें पराजित कर दिया।

फाजिलनगर में भाजपा उम्मीदवार को 73,354 वोट मिले, जबकि मौर्य को 40,682 वोट हासिल हुए।

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने 2017 की 47 सीटों के मुकाबले 2022 में 111 सीटें जीतकर अपनी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया। यह विपक्ष के लिए बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन इस बढ़त का पूरा श्रेय किसी एक नेता को देना चुनावी तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा।

सपा से भी मोहभंग, अपनी पार्टी बनाने का फैसला

समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद मौर्य को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और विधान परिषद भेजा गया।

लेकिन समय के साथ उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ते गए। रामचरितमानस पर उनकी टिप्पणियों और अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उनके बयानों ने विवाद पैदा किया।

मौर्य का आरोप था कि पार्टी नेतृत्व ने उनके विचारों और राजनीतिक गतिविधियों को पर्याप्त समर्थन नहीं दिया।

13 फरवरी 2024 को उन्होंने सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया। 20 फरवरी को उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और विधान परिषद की सदस्यता भी छोड़ दी।

इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के गठन के बाद उनके राजनीतिक संगठन और आगे की रणनीति में बदलाव हुए। नवंबर 2026 के राजनीतिक घटनाक्रम में वह अपनी जनता पार्टी के नाम से भी राजनीतिक गतिविधियां कर रहे हैं।

यहां से उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि किसी बड़े राजनीतिक दल के संगठन के बिना अपनी राजनीतिक ताकत को कैसे बचाया जाए और उसे चुनावी समर्थन में कैसे बदला जाए।

2026 : कांग्रेस के साथ नई राजनीतिक संभावनाएं

अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मौर्य की राजनीति का केंद्र कांग्रेस बनती दिखाई दे रही है।

अक्टूबर 2026 में उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने का कोई प्रस्ताव नहीं है, लेकिन वह INDIA गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं।

इस घटनाक्रम के बाद सीटों के बंटवारे को लेकर भी खबरें सामने आईं।

27 अक्टूबर को ABP Live की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि मौर्य की पार्टी ने कांग्रेस से 12 सीटों की मांग की थी और 10 सीटों पर सहमति बनने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट में कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारने की संभावना का भी उल्लेख था।

हालांकि इस समझौते की कोई औपचारिक घोषणा या सार्वजनिक रूप से पुष्ट अंतिम सूची सामने नहीं आई है।

इसलिए फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक समझौते और मीडिया रिपोर्टों के दायरे में ही देखना चाहिए।

अखिलेश यादव की नाराजगी ने बढ़ाई गठबंधन की मुश्किल

मौर्य की कांग्रेस से बातचीत के बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का रुख उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है।

30 अक्टूबर को लखनऊ में अखिलेश यादव से जब मौर्य के INDIA गठबंधन में शामिल होने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने साफ कहा कि मौर्य उनके गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं और उन्हें सीटों के बंटवारे में शामिल नहीं किया जा सकता।

अखिलेश का यह बयान केवल एक नेता पर टिप्पणी नहीं था। इसके पीछे सपा और मौर्य के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेद भी हैं।

मौर्य ने भी जवाब देने में देर नहीं की। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव अकेले INDIA गठबंधन नहीं हैं। गठबंधन में कांग्रेस सहित कई दल शामिल हैं और अंतिम निर्णय गठबंधन के नेतृत्व का विषय है।

मौर्य ने यह भी कहा कि उन्होंने अखिलेश यादव के कोटे से कोई टिकट नहीं मांगा है। उनकी बातचीत कांग्रेस नेतृत्व से हुई है और राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी से भी उनकी चर्चा हुई है।

इस बयान से स्पष्ट है कि मौर्य अपनी राजनीतिक बातचीत को सीधे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से जोड़कर देख रहे हैं।

2 नवंबर की मुलाकात : कांग्रेस के दरवाजे खुले या नया राजनीतिक दबाव?

2 नवंबर को स्वामी प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से उनके कार्यालय में मुलाकात की।

मौर्य ने स्वयं सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए बताया कि बैठक में उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा हुई।

मुलाकात के बाद राजेंद्र पाल गौतम ने मौर्य को सामाजिक न्याय की लड़ाई का साथी और अति पिछड़े वर्गों की आवाज बताया। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि मौर्य के लिए गठबंधन के दरवाजे खुले हैं और अखिलेश यादव से बातचीत की जाएगी।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस एक तरफ अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ मौर्य जैसे नेता को भी अपने साथ जोड़ने की संभावनाएं तलाश रही है।

यहां कांग्रेस के सामने राजनीतिक संतुलन की कठिन परीक्षा है। उसे यह तय करना होगा कि मौर्य को साथ लेने से पिछड़े वर्गों के बीच कितना लाभ मिलेगा और इसके लिए सपा के साथ रिश्तों को किस तरह संभाला जाएगा।

कांग्रेस को मौर्य में क्या दिखाई दे रहा है?

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में राजनीतिक स्थिति और सामाजिक आधार को देखना जरूरी है।

कांग्रेस लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी की सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की राजनीति इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है।

स्वामी प्रसाद मौर्य को साथ लेने के पीछे कांग्रेस की संभावित रणनीति के कई पहलू हो सकते हैं।

पहला, पिछड़े वर्गों में राजनीतिक पहुंच बढ़ाना। मौर्य की पहचान मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समुदायों के बीच एक राजनीतिक चेहरे के रूप में रही है।

दूसरा, सामाजिक न्याय की राजनीति को जमीनी स्तर पर विस्तार देना। कांग्रेस को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो पिछड़े वर्गों के बीच पार्टी का संदेश पहुंचा सकें।

तीसरा, पूर्वांचल और कुशीनगर सहित उन इलाकों में अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करना जहां मौर्य का पुराना राजनीतिक आधार रहा है।

चौथा, भाजपा के खिलाफ विपक्षी सामाजिक गठबंधन को व्यापक बनाना।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी नेता का किसी समुदाय में प्रभाव होना और उस समुदाय के मतदाताओं का सामूहिक रूप से उसी नेता या पार्टी के पक्ष में मतदान करना अलग-अलग बातें हैं। मौर्य के लिए भी यही सबसे बड़ी चुनावी परीक्षा होगी।

मौर्य की सबसे बड़ी चुनौती : व्यक्तिगत प्रभाव को वोट में बदलना

स्वामी प्रसाद मौर्य के राजनीतिक सफर में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है।

2017 में भाजपा के साथ रहते हुए वह चुनाव जीते और मंत्री बने। 2022 में सपा के साथ आए तो खुद चुनाव हार गए। बाद में सपा से अलग होकर उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई।

इससे एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि क्या मौर्य का व्यक्तिगत सामाजिक प्रभाव अब भी उतना मजबूत है जितना उनके राजनीतिक सहयोगी और समर्थक दावा करते हैं?

उनकी राजनीतिक उपयोगिता का आकलन केवल पुराने पदों या राजनीतिक बयानों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए बूथ स्तर पर संगठन, स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता, समुदायों के बीच वास्तविक समर्थन और चुनावी प्रदर्शन को देखना होगा।

कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन में उन्हें सीटें मिल भी जाती हैं तो उन सीटों पर जीत सुनिश्चित करना अलग चुनौती होगी।

2027 का बड़ा सवाल : कांग्रेस, सपा और मौर्य के बीच कैसे बनेगा तालमेल?

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर 2027 में होने वाला चुनाव विपक्ष के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

भाजपा के सामने चुनौती पेश करने के लिए विपक्ष को सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक एकजुटता की जरूरत होगी। लेकिन विपक्ष के भीतर ही सीटों, नेतृत्व और सहयोगी दलों की भूमिका को लेकर मतभेद सामने आने लगे हैं।

कांग्रेस के लिए मौर्य को साथ लेना राजनीतिक विस्तार का अवसर हो सकता है। सपा के लिए यह अपने सहयोगी दलों और सीटों के समीकरण को संभालने का सवाल है। वहीं मौर्य के लिए यह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बचाते हुए बड़े गठबंधन में जगह बनाने की कोशिश है।

इन तीनों पक्षों के हित एक बिंदु पर मिलते भी हैं और कई जगह टकराते भी हैं।

यदि कांग्रेस मौर्य के साथ समझौता करती है, तो उसे सपा के साथ तालमेल बैठाना होगा। यदि सपा अपने रुख पर कायम रहती है, तो कांग्रेस को तय करना होगा कि वह मौर्य के साथ स्वतंत्र समझौता करने का राजनीतिक जोखिम उठाएगी या नहीं।

क्या मौर्य की सियासी वापसी संभव है?

स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वह बदलते राजनीतिक हालात में अपने लिए नए रास्ते तलाशने की क्षमता रखते हैं। लेकिन बार-बार राजनीतिक दल बदलने की कीमत भी चुकानी पड़ सकती है।

उनके सामने अब तीन बड़ी परीक्षाएं हैं : —

1. अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत को दोबारा संगठित करना।

2. कांग्रेस के साथ बातचीत को वास्तविक राजनीतिक समझौते में बदलना।

3. 2027 में अपनी राजनीतिक उपयोगिता को चुनावी परिणामों के जरिए साबित करना।

कांग्रेस के लिए भी यह फैसला आसान नहीं है। उसे यह देखना होगा कि मौर्य के साथ गठबंधन से मिलने वाला संभावित लाभ सपा के साथ संबंधों पर पड़ने वाले असर से बड़ा है या नहीं।

फिलहाल राजेंद्र पाल गौतम के साथ मुलाकात और कांग्रेस नेतृत्व से मौर्य की बातचीत ने नए समीकरणों की संभावना जरूर पैदा की है, लेकिन गठबंधन और सीटों के बंटवारे की अंतिम तस्वीर अभी सामने आना बाकी है।

सबसे बड़ा सवाल यही है :

क्या स्वामी प्रसाद मौर्य कांग्रेस के सहारे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर पाएंगे? क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की पहल से उनके लिए INDIA गठबंधन में रास्ता निकलेगा? या फिर अखिलेश यादव की असहमति और सीटों के बंटवारे का विवाद उनके इस नए राजनीतिक दांव को कमजोर कर देगा?

2027 का चुनाव मौर्य के लिए केवल सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और स्वतंत्र पहचान साबित करने की निर्णायक परीक्षा भी हो सकता है।

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