[the_ad id="179"]
Home » National » योगी आदित्यनाथ, आरोप लगाने से पहले इतिहास पढ़ लीजिए! चौरी-चौरा कांड के वक्त नेहरू अंग्रेजों की जेल में थे

योगी आदित्यनाथ, आरोप लगाने से पहले इतिहास पढ़ लीजिए! चौरी-चौरा कांड के वक्त नेहरू अंग्रेजों की जेल में थे

नेहरू से सवाल पूछने निकले योगी पहले तारीखें देख लें। 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना हुई, तब जवाहरलाल नेहरू लखनऊ जिला जेल में बंद थे। 6 दिसंबर 1921 को गिरफ्तार हुए नेहरू 3 मार्च 1922 को रिहा हुए। इतिहास का यह तथ्य उन लोगों के लिए काफी है जो स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों पर सवाल उठाने से पहले बुनियादी जानकारी जुटाना जरूरी नहीं समझते।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चौरी-चौरा कांड को लेकर जवाहरलाल नेहरू पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल यह है कि उस घटना के समय नेहरू कहां थे और उन्होंने आरोपियों की पैरवी क्यों नहीं की? लेकिन योगी जी को शायद यह बताना भूल गए कि जिस समय चौरी-चौरा की घटना हुई, उस समय नेहरू खुद अंग्रेजों की जेल में कैद थे।

इतिहास की तारीखें बिल्कुल स्पष्ट हैं। नेहरू 6 दिसंबर 1921 को गिरफ्तार किए गए थे। 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना हुई और 3 मार्च 1922 को उन्हें जेल से रिहा किया गया। यानी जिस स्वतंत्रता सेनानी से अदालत में पैरवी न करने का सवाल पूछा जा रहा है, वह उस समय ब्रिटिश हुकूमत की कैद में था। The Nehru Archive +1

172 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, सभी को फांसी नहीं हुई

चौरी-चौरा कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं। मुकदमे में बड़ी संख्या में लोगों को मृत्युदंड सुनाया गया। 172 लोगों को फांसी की सजा सुनाए जाने का उल्लेख मिलता है। इस मामले में महामना मदन मोहन मालवीय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आरोपियों की पैरवी की। मोतीलाल नेहरू की भूमिका का भी ऐतिहासिक संदर्भों में उल्लेख मिलता है।

लेकिन यहां एक बुनियादी तथ्य समझना जरूरी है। फांसी की सजा सुनाया जाना और वास्तव में फांसी दे दिया जाना दो अलग बातें हैं।

30 अप्रैल 1923 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपीलों पर फैसला सुनाया। 19 लोगों की फांसी की सजा बरकरार रखी गई, 38 लोगों को बरी किया गया और बाकी आरोपियों की सजाओं में बदलाव किया गया। अंततः 19 लोगों को फांसी दी गई। इसलिए 172 लोगों को फांसी पर चढ़ा दिए जाने जैसा भ्रम फैलाना ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय होगा। Wikipedia +1

नेहरू जेल में थे, फिर उनसे पैरवी की उम्मीद कैसे?

योगी आदित्यनाथ जी, इतिहास के सवाल उठाना आपका अधिकार है। नेहरू की भूमिका पर सवाल पूछिए, उनके फैसलों की आलोचना कीजिए, लेकिन कम से कम यह तो देख लीजिए कि जिस समय की बात कर रहे हैं, उस समय नेहरू की स्थिति क्या थी।

अंग्रेजों की जेल में बंद व्यक्ति अदालत में जाकर आरोपियों की पैरवी कैसे कर सकता था? क्या इस सामान्य तथ्य को नजरअंदाज करके राजनीतिक आरोप लगाना उचित है?

चौरी-चौरा की घटना के बाद 12 फरवरी 1922 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला किया था। यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बहस और आलोचना का विषय रहा है। उस समय कांग्रेस के भीतर भी इस फैसले को लेकर मतभेद थे। इतिहास को समझने के लिए उस दौर की परिस्थितियों, नेताओं की भूमिकाओं और ब्रिटिश दमन की पूरी तस्वीर देखनी पड़ती है। Civilsdaily +1

स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक दल की जागीर नहीं

आजादी की लड़ाई में नेहरू, गांधी, मालवीय, मोतीलाल नेहरू और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों की अपनी-अपनी भूमिकाएं थीं। किसी की भूमिका पर सवाल उठाने से पहले उसके समय, परिस्थितियों और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों को समझना जरूरी है।

इतिहास को राजनीतिक भाषणों में सुविधानुसार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों को आज की दलगत राजनीति के चश्मे से देखना और अधूरे तथ्यों के आधार पर आरोप लगाना इतिहास के साथ न्याय नहीं है।

योगी आदित्यनाथ जी, नेहरू पर सवाल उठाने से पहले उनकी गिरफ्तारी और रिहाई की तारीखें पढ़ लीजिए। चौरी-चौरा के मुकदमे का फैसला देख लीजिए। महामना मालवीय की पैरवी और हाईकोर्ट के फैसले को समझ लीजिए।

इतिहास किसी पार्टी की जागीर नहीं है। नेहरू से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों को छिपाकर नहीं। जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानी से यह पूछना कि वह अदालत में पैरवी करने क्यों नहीं पहुंचा, इतिहास की समझ नहीं—अधूरी जानकारी पर आधारित राजनीतिक आरोप है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *