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वाह मोदी जी! बैंक भी बेचेंगे और खरीदार को उसी बैंक से आधे से ज्यादा पैसा भी दिलवाएंगे! IDBI सौदे में ‘डबल फायदा’ किसका?

बैंक खरीदने के लिए 52,878 करोड़ रुपये की बोली और उसी बैंक से खरीदार की दूसरी कंपनियों की हिस्सेदारी खरीदने की करीब 3 अरब डॉलर की योजना! यानी जिस बैंक का मालिकाना हक बेचा जा रहा है, उसी बैंक के पैसे से खरीदार को बड़ी रकम मिलने का रास्ता। मोदी सरकार के इस निजीकरण मॉडल में सवाल ही सवाल हैं!

ओपिनियन | शीतल पी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026

IDBI बैंक का 60.72% हिस्सा बेचने के लिए सरकार ने कनाडा के Fairfax समूह को रणनीतिक खरीदार चुना है। सौदे की घोषित कीमत 52,878 करोड़ रुपये है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। Fairfax की योजना है कि उसकी Go Digit की दोनों बीमा कंपनियों और IIFL Capital में हिस्सेदारी भी IDBI बैंक के भीतर लाई जाए। निवेशकों के साथ बातचीत में इन हिस्सेदारियों का अनुमानित मूल्य करीब 3 अरब डॉलर बताया गया—यानी बैंक खरीदने की घोषित रकम का लगभग 54 प्रतिशत।

बैंक खरीदेगा Fairfax, अपनी कंपनियां भी उसी बैंक को देगा—और भुगतान बैंक करेगा!

IDBI को खरीदने वाले Fairfax समूह के प्रमुख प्रेम वत्स ने निवेशकों से बातचीत में कहा कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूंजी है और वह नकद भुगतान कर सकता है। यानी प्रस्तावित व्यवस्था में Fairfax बैंक का नियंत्रण हासिल करेगा और फिर अपनी दूसरी कंपनियों की हिस्सेदारी उसी बैंक के भीतर लाने की योजना पर आगे बढ़ेगा।

खरीदार भी वही, बेचने वाला भी वही, कीमत कौन तय करेगा?

यहीं सबसे बड़ा सवाल है। Fairfax अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी IDBI को देगा। लेकिन उन कंपनियों की कीमत कौन तय करेगा? क्या स्वतंत्र मूल्यांकन होगा? क्या बैंक के मौजूदा और छोटे शेयरधारकों के हितों को प्राथमिकता मिलेगी? क्या यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बैंक अपनी अतिरिक्त पूंजी का इस्तेमाल उचित मूल्य पर ही करे?

बैंक कोई निजी कारोबारी की तिजोरी नहीं है। उसके फैसलों का असर जमाकर्ताओं, शेयरधारकों और पूरे वित्तीय तंत्र पर पड़ता है। इसलिए इस सौदे की हर शर्त सार्वजनिक होनी चाहिए। आखिर बैंक की पूंजी का इस्तेमाल किसी एक कारोबारी समूह की कंपनियों को खरीदने में किया जाएगा, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

प्रेम वत्स और मोदी की तारीफों का रिश्ता

Fairfax के प्रमुख प्रेम वत्स का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सार्वजनिक प्रशंसा का रुख भी इस सौदे को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में लाता है। 14 अक्टूबर 2026 को Fairfax की आधिकारिक घोषणा में वत्स ने मोदी और उनकी टीम को पारदर्शी तथा प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने मोदी के 2047 तक विकसित भारत के विजन का समर्थन करने की बात भी कही।

एक और तथ्य है—भारत सरकार ने प्रेम वत्स को वर्ष 2020 में व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया था। यह सम्मान आधिकारिक पद्म पुरस्कार सूची में दर्ज है।

अब सवाल यह है कि मोदी सरकार जिस कारोबारी समूह को देश के एक बड़े बैंक का नियंत्रण सौंपने जा रही है, उसके साथ प्रस्तावित दूसरे वित्तीय लेन-देन की शर्तें कितनी पारदर्शी होंगी? सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।

अभी सौदा पूरा नहीं, लेकिन सवाल बहुत बड़े हैं

Fairfax की 14 अक्टूबर की आधिकारिक घोषणा के अनुसार, IDBI खरीदने और Digit तथा IIFL Capital की हिस्सेदारियां बैंक में लाने के लिए अंतिम बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे। इन प्रस्तावों को RBI, SEBI और IRDAI सहित संबंधित नियामकों की मंजूरी भी चाहिए। Fairfax ने यह भी स्पष्ट किया था कि बैंक खरीद का सौदा इन दोनों प्रस्तावित हिस्सेदारी हस्तांतरणों के बिना भी आगे बढ़ सकता है।

इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि IDBI ने Fairfax को 3 अरब डॉलर का भुगतान कर दिया है। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि बैंक की बिक्री के साथ खरीदार की दूसरी कंपनियों को उसी बैंक में शामिल करने की योजना भी सामने रखी गई है। यही वह व्यवस्था है जिस पर देश को पूरी जानकारी चाहिए।

मोदी सरकार से सीधे सवाल

* IDBI की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत 52,878 करोड़ रुपये कैसे तय हुई?

* Fairfax की Digit और IIFL Capital में हिस्सेदारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करेगा?

* क्या IDBI बैंक इन हिस्सेदारियों के लिए नकद भुगतान करेगा? यदि हां, तो कितनी रकम?

* क्या मूल्यांकन और भुगतान की पूरी जानकारी संसद तथा जनता के सामने रखी जाएगी?

* क्या बैंक के मौजूदा शेयरधारकों और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट शर्तें तय होंगी?

मोदी जी, देश का बैंक कोई कारोबारी प्रयोगशाला नहीं है, जहां खरीदार अपनी दूसरी कंपनियों को लाकर बैठा दे और भुगतान के लिए बैंक की पूंजी उपलब्ध हो जाए। सरकारी हिस्सेदारी बेचने का फैसला आपका है, लेकिन जनता के पैसे और बैंक की पूंजी का हिसाब भी आपको ही देना होगा।

और हां, याद दिलाने की जरूरत नहीं—एक नारा बहुत मशहूर किया गया था:

“मैं देश नहीं बिकने दूंगा!”

अब सवाल है—देश के बैंक बिक रहे हैं, उनके साथ खरीदार की दूसरी कंपनियों को जोड़ने की योजना बन रही है, तो इस पूरे सौदे का हिसाब कौन देगा? नारा आपका था, मैं देश नहीं बिकने दूंगा लेकिन 12 साल से देश आप ही बेच रहे हैं।

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