ओपिनियन | शकील अख्तर, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026
राहुल गांधी ने सावरकर के बारे में बोलना बंद कर दिया, तो क्या इससे सावरकर का महिमामंडन हो गया? क्या राहुल की चुप्पी से सावरकर के बारे में उनके विचार बदल गए? बिल्कुल नहीं।
लेकिन इस चुप्पी से एक राजनीतिक फायदा जरूर हुआ। राहुल गांधी के साथ मजबूती से खड़ी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को राहत मिल गई। सावरकर उद्धव ठाकरे के आदर्श हैं। राहुल को उनके खिलाफ बोलने से रोकने के लिए उद्धव की राजनीतिक स्थिति और गठबंधन की मजबूरियां महत्वपूर्ण थीं। राहुल इसके लिए बड़ी मुश्किल से तैयार हुए थे।
यही राजनीति है। हर लड़ाई हर समय और हर मोर्चे पर नहीं लड़ी जाती। कभी-कभी अपने साथ खड़े लोगों की राजनीतिक संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विचार बदल गए या इतिहास के सवाल खत्म हो गए।
अब आरएसएस को लेकर भी वही सवाल
आज राहुल गांधी खुद कह रहे हैं कि आरएसएस से जुड़े लोगों के बीच से भी उन्हें जानकारियां मिलने लगी हैं। बीजेपी और संघ के भीतर से लोग उनसे संपर्क कर रहे हैं और कुछ बातें साझा कर रहे हैं।
ऐसे समय में यदि राहुल आरएसएस के बारे में बोलना कुछ समय के लिए कम कर दें या चुप्पी साध लें, तो इसमें आश्चर्य कैसा? क्या इससे आरएसएस का चरित्र बदल जाएगा? क्या उसके वैचारिक आधार, अल्पसंख्यकों के प्रति उसके रुख और मनुवादी सोच को लेकर उठते सवाल खत्म हो जाएंगे?
नहीं। राहुल के बोलने या न बोलने से आरएसएस की विचारधारा नहीं बदलने वाली। उसका चरित्र अपनी जगह रहेगा। कुछ समय के लिए उसका राजनीतिक व्यवहार शांत दिखाई दे सकता है, लेकिन इससे उसके मूल वैचारिक सवालों का अंत नहीं हो जाता। इतिहास में ऐसे दौर पहले भी आए हैं, जब संघ ने राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदली है और कांग्रेस को भी समर्थन दिया है।
राजनीति में मदद करने वाले को मदद करने दीजिए
राजनीति का एक सीधा सिद्धांत है—अगर कोई व्यक्ति या संगठन अपने हितों के कारण भी आपकी मदद कर रहा है, तो उसकी मदद को स्वीकार करने में हर्ज क्या है? हर मददगार से वैचारिक सहमति जरूरी नहीं होती। कई बार राजनीतिक परिस्थितियां ऐसे अवसर पैदा करती हैं, जिनका इस्तेमाल बड़े लक्ष्य के लिए किया जा सकता है।
यदि आरएसएस के भीतर कुछ लोगों को अब मोदी के नेतृत्व से अपना नुकसान दिखाई दे रहा है और वे मोदी को हटाने की दिशा में किसी तरह की मदद करना चाहते हैं, तो राहुल गांधी को ऐसी मदद रोकने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? क्या केवल इसलिए कि वे आरएसएस की विचारधारा के आलोचक हैं, उन्हें उसके भीतर से आने वाली हर सूचना या मदद को ठुकरा देना चाहिए?
बिल्कुल नहीं।
सावरकर पर विचार नहीं बदले, आरएसएस पर भी नहीं बदलेंगे
राहुल गांधी ने उद्धव ठाकरे के साथ राजनीतिक रिश्तों को ध्यान में रखते हुए सावरकर पर अपनी सार्वजनिक आलोचना सीमित की। इससे न सावरकर का इतिहास बदला, न राहुल के विचार। इसी तरह यदि वे आरएसएस के भीतर से आने वाली जानकारियों के कारण कुछ समय तक उसके खिलाफ बोलने से बचते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि संघ के बारे में उनकी राय बदल गई है।
राजनीतिक विरोध और राजनीतिक रणनीति दो अलग चीजें हैं। किसी विचारधारा का विरोध करते हुए भी उसके भीतर से आने वाली सूचनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी राजनीतिक संगठन की मदद लेना उसकी विचारधारा को स्वीकार करना नहीं होता।
मोदी को सत्ता से हटाने की लड़ाई में यदि संघ के भीतर से भी कोई आवाज उठती है, तो राहुल को उसे सुनना चाहिए। हर आवाज को अपने विरोध की कसौटी पर कसने के बजाय यह देखना चाहिए कि उससे लोकतंत्र और राजनीतिक बदलाव की लड़ाई को क्या मदद मिल सकती है।
लक्ष्य बड़ा है, इसलिए रणनीति भी व्यावहारिक होनी चाहिए।
राहुल गांधी को सावरकर पर चुप रहने से सावरकर का महिमामंडन नहीं करना पड़ा। उसी तरह आरएसएस पर कुछ समय चुप रहने से संघ की विचारधारा को स्वीकार करना जरूरी नहीं है। विचार अपनी जगह रहेंगे, आलोचना अपनी जगह रहेगी और राजनीतिक रणनीति अपनी जगह।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल मोदी के नेतृत्व और सत्ता की जवाबदेही का है। यदि इस लड़ाई में आरएसएस के भीतर से भी कोई मदद मिलती है, तो उसे आने दीजिए। राजनीति में हर लड़ाई का समय और तरीका होता है। कभी-कभी अपने विरोधी खेमे से आने वाली दरार भी सत्ता की दीवार कमजोर करने में काम आती है।



