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रामलीला मैदान के जनसैलाब से हिली बीजेपी की सियासत, मिंटो रोड से अजमेरी गेट तक उमड़ा हुजूम

छठ, दशहरा, करवाचौथ और दिवाली के बाद भी सार्वजनिक परिवहन की मुश्किलों को पार कर दिल्ली पहुंचे लोग; पहाड़गंज से अजमेरी गेट तक ठहरने की जगहों पर भारी दबाव; टीवी चैनलों की कवरेज और सोशल मीडिया पर भीड़ को लेकर छिड़ी बहस

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 नवंबर 2026

1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में INDIA bloc की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के बाद अब सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर दिल्ली में कितना बड़ा जनसैलाब उमड़ा था। सोशल मीडिया पर रैली की तस्वीरें, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लगातार साझा किए जा रहे हैं। मिंटो रोड से लेकर अजमेरी गेट तक लोगों का हुजूम दिखाई देने की चर्चा है। समर्थकों का दावा है कि रामलीला मैदान और आसपास की सड़कों पर इतनी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे कि पूरे आयोजन का असर राजधानी के कई इलाकों में दिखाई दिया।

यह सिर्फ राजनीतिक दलों के समर्थकों की रैली नहीं थी। इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे लोग भी पहुंचे थे, जो अपने वोट, पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर नाराजगी जाहिर करना चाहते थे। लोगों ने अपने खर्च पर दिल्ली पहुंचकर ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ अपनी भागीदारी दर्ज कराई।

मिंटो रोड से अजमेरी गेट तक लोगों का हुजूम

रैली में शामिल लोगों के अनुसार, रामलीला मैदान के आसपास ही नहीं, बल्कि मिंटो रोड से अजमेरी गेट तक सड़कों पर लोगों की भारी मौजूदगी थी। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में दूर तक लोगों की कतारें और सड़कों पर उमड़ी भीड़ दिखाई दे रही है।

रैली के लिए लोग एक-दो दिन पहले ही दिल्ली पहुंचने लगे थे। पहाड़गंज, अजमेरी गेट और आसपास के इलाकों में ठहरने की जगहों पर भारी दबाव की चर्चा रही। कई लोगों ने होटल और गेस्ट हाउस में जगह नहीं मिलने पर अपने परिचितों और अन्य उपलब्ध ठिकानों का सहारा लिया।

सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि बीजेपी के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने अपने परिसरों में ऐसे लोगों को ठहरने की जगह दी, जो रैली में शामिल होने दिल्ली आए थे और सरकार से नाराज थे। यह दावा भी रैली के बाद की चर्चाओं में शामिल रहा।

त्योहारों के बाद भी दिल्ली पहुंचे हजारों लोग

छठ, विजयादशमी, करवाचौथ और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर पहले से दबाव था। इसके बावजूद रैली में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से लोग दिल्ली पहुंचे।

समर्थकों का कहना है कि लोगों ने यात्रा की परेशानियों, ठहरने की दिक्कतों और खर्च की परवाह किए बिना इस आयोजन में हिस्सा लिया। उनके लिए यह केवल एक राजनीतिक सभा नहीं, बल्कि अपने मताधिकार और लोकतांत्रिक पहचान से जुड़े सवालों पर आवाज उठाने का मौका था।

टीवी चैनलों की कवरेज भी बनी चर्चा का विषय

रामलीला मैदान की भीड़ को लेकर टीवी चैनलों की कवरेज भी सोशल मीडिया पर बहस का विषय बनी। पत्रकार रुबिका लियाकत की ओर से भी रैली में जबरदस्त भीड़ होने की बात कहे जाने का उल्लेख किया जा रहा है।

वहीं, इंडिया टीवी के कवरेज को लेकर भी सोशल मीडिया पर सवाल उठे। साझा पोस्टों में दावा किया गया कि एंकर ने कैमरे को मैदान के उस हिस्से में ले जाने के लिए कहा, जहां खाली जगह और कीचड़ दिखाई दे रहा था। इसके बाद समर्थकों ने सवाल उठाया कि मैदान के किसी एक खाली हिस्से को दिखाकर पूरे आयोजन की तस्वीर कैसे पेश की जा सकती है?

रैली की कवरेज को लेकर यह बहस इस बात का संकेत है कि भीड़ का आकार और उसका राजनीतिक संदेश दोनों ही चर्चा के केंद्र में रहे।

बीजेपी के बड़े नेताओं पर भी टिकी रहीं निगाहें

सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता टीवी पर रैली का प्रसारण देख रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का उल्लेख किया गया।

रैली में खड़गे ने जिस तरह चुनावी प्रक्रिया और मताधिकार के मुद्दे को उठाया, उसे लेकर समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। हालांकि, नेताओं के निजी तौर पर टीवी देखने या उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं के दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

दिल्ली की सीमाओं पर पुलिस तैनाती को लेकर सवाल

रैली में शामिल होने पहुंचे लोगों ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश की ओर से दिल्ली आने वाले रास्तों पर पुलिस तैनाती और आवाजाही में परेशानी की शिकायतें भी साझा कीं।

सोशल मीडिया पर आरोप लगाए गए कि दिल्ली की सीमाओं पर लोगों को रोकने और उनके प्रवेश में बाधा डालने की कोशिश हुई। रैली के समर्थकों ने सवाल उठाया कि लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित सभा में शामिल होने आ रहे नागरिकों को रास्ते में परेशान क्यों होना पड़ा?

इन शिकायतों के बीच दिल्ली पहुंचने वाले लोगों की यात्रा और उनके अनुभव भी सोशल मीडिया पर लगातार साझा किए गए।

रैली के बाद भी वापसी में परेशानी का दावा

रैली समाप्त होने के चौबीस घंटे बाद भी कई लोगों ने सोशल मीडिया पर दिल्ली से बाहर जाने में परेशानी होने की बात कही। कुछ पोस्ट में दावा किया गया कि बड़ी संख्या में आंदोलनकारी परिवहन की उपलब्धता और भारी भीड़ के कारण राजधानी से वापस नहीं लौट पाए थे।

इससे पहले दिल्ली पहुंचने के लिए लोगों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उसके बाद वापसी की परेशानी ने भी रैली के आयोजन को लेकर चर्चा को और बढ़ाया।

एक आंदोलनकारी दस नफरती भक्तों के बराबर!

सोशल मीडिया पर रैली के समर्थकों की एक टिप्पणी खास तौर पर चर्चा में है। टिप्पणी में कहा गया कि रामलीला मैदान में पहुंचे आंदोलनकारियों का उत्साह और लोकतंत्र के लिए उनकी भागीदारी इतनी बड़ी थी कि “एक-एक आंदोलनकारी दस-दस नफरती भक्तों के बराबर था।”

यह टिप्पणी रैली में शामिल लोगों के आत्मविश्वास और उनके राजनीतिक संदेश को दर्शाती है। समर्थकों का कहना है कि दिल्ली पहुंचने वाले लोग किसी लालच या सुविधा के लिए नहीं, बल्कि अपने वोट और लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज उठाने आए थे।

भीड़ की बहस से आगे, जनसंदेश पर भी ध्यान

1 नवंबर की रैली के बाद सोशल मीडिया पर भीड़ की संख्या को लेकर बहस जारी है। मिंटो रोड से अजमेरी गेट तक लोगों की मौजूदगी, दिल्ली में ठहरने की व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन की परेशानियां, टीवी चैनलों की कवरेज और सीमाओं पर पुलिस तैनाती जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं।

लेकिन इस आयोजन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश मतदाता सूची और वोट के अधिकार से जुड़ा रहा। रैली में पहुंचे लोगों ने साफ किया कि वे अपने मताधिकार, पहचान और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवालों पर जवाब चाहते हैं।

रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ अब केवल तस्वीरों और वीडियो की बहस नहीं रह गई है। 1 नवंबर को दिल्ली पहुंचे लोगों ने अपने वोट और लोकतंत्र के सवाल को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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