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संसद में अध्यक्ष चाहिए, पार्टी का रंगदार पहरेदार नहीं

मीरा कुमार ने बताया, स्पीकर की कुर्सी कैसे संभाली जाती है; ओम बिरला ने बनाया पार्टी की चौकी? विपक्ष का माइक बंद करने वालों को मीरा कुमार से सीखने की जरूरत है। शांत आवाज, दृढ़ तेवर और पूरी निष्पक्षता के साथ मीरा कुमार ने की जन-महाभियोग की अध्यक्षता; राहुल-सोनिया, खड़गे, शरद पवार और अखिलेश रहे मौजूद, ओम बिरला की कार्यशैली पर फिर उठे सवाल।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 नवंबर 2026

लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठना और उस कुर्सी की गरिमा निभाना दो अलग-अलग बातें हैं। कुर्सी किसी को पद दे सकती है, लेकिन सम्मान उसके आचरण से मिलता है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने 31 अक्टूबर को INDIA bloc के प्रतीकात्मक जन-महाभियोग कार्यक्रम की अध्यक्षता कर संसदीय मर्यादा की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की कार्यशैली पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

मीरा कुमार के सामने राहुल गांधी, सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार और अखिलेश यादव जैसे देश के बड़े राजनीतिक नेता बैठे थे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से आयोजित इस सार्वजनिक कार्यक्रम में छह आरोपों वाला प्रस्ताव पेश किया गया। लेकिन मीरा कुमार के संचालन में न किसी नेता के कद का दबाव दिखाई दिया, न राजनीतिक कटाक्ष और न ही किसी पक्ष के प्रति झुकाव।

आवाज शांत थी, शब्द दृढ़ थे और संचालन में मर्यादा थी। न किसी को नीचा दिखाने की कोशिश, न किसी की आवाज दबाने की जल्दबाजी। उन्होंने यह साबित किया कि अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर सत्ता का प्रदर्शन नहीं, लोकतंत्र की सेवा की जाती है।

मीरा कुमार ने कुर्सी का कद बढ़ाया, ओम बिरला ने सवालों का

यही वह अंतर है जिसे देश की संसद को समझने की जरूरत है। मीरा कुमार ने अध्यक्ष की कुर्सी को पार्टी की सीमाओं से ऊपर रखा। वहीं ओम बिरला के कार्यकाल में विपक्षी सांसदों के माइक बंद किए जाने, उन्हें अपनी बात पूरी न करने देने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा में बाधाएं आने की शिकायतें बार-बार उठी हैं।

संसद में विपक्ष सवाल पूछे तो माइक बंद, विरोध करे तो कार्रवाई, सरकार से जवाब मांगे तो हंगामा! क्या यही संसदीय लोकतंत्र का नया नियम बन गया है? अगर विपक्ष की आवाज ही सुनाई नहीं देगी तो संसद में बहस किससे होगी? केवल सत्ता पक्ष की तालियों से लोकतंत्र नहीं चलता।

ओम बिरला को यह याद दिलाने की जरूरत है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद किसी पार्टी का नियुक्ति-पत्र नहीं है। अध्यक्ष पूरे सदन का संरक्षक होता है, सत्तारूढ़ दल का राजनीतिक प्रवक्ता नहीं। लेकिन जब अध्यक्ष की कुर्सी से निष्पक्षता के बजाय पार्टी की भाषा सुनाई देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

मीरा कुमार के सामने बड़े नेता, लेकिन कुर्सी सबसे बड़ी

मीरा कुमार के सामने राहुल गांधी, सोनिया गांधी और खड़गे जैसे नेता मौजूद थे। इसके बावजूद उन्होंने किसी के राजनीतिक कद को अपने संचालन पर हावी नहीं होने दिया। न चाटुकारिता, न कटाक्ष और न ही किसी को अपमानित करने का प्रयास। यही अध्यक्षीय गरिमा है।

एक तरफ मीरा कुमार हैं, जिन्होंने अपनी शांत आवाज और निष्पक्ष व्यवहार से कुर्सी का सम्मान बढ़ाया। दूसरी तरफ ओम बिरला हैं, जिनके कार्यकाल में विपक्ष की आवाज और संसदीय अधिकारों को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। यह तुलना किसी व्यक्ति की आवाज की ऊंचाई से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने के तरीके से होनी चाहिए।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह आरोप, चुनाव आयोग पर विपक्ष का हमला

कार्यक्रम में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह आरोपों वाला प्रस्ताव पेश किया। विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मतदाताओं के नाम हटाए जाने, फॉर्म-6 में बदलाव, ECINET के इस्तेमाल और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए।

राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। विपक्ष ने आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जवाबदेही की मांग की। ये आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए हैं और इन पर संबंधित संस्थाओं का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।

यह स्पष्ट रहना चाहिए कि मीरा कुमार की अध्यक्षता में हुआ कार्यक्रम प्रतीकात्मक सार्वजनिक जन-महाभियोग था। यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं थी। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग के कामकाज पर सार्वजनिक बहस और राजनीतिक जवाबदेही की मांग को सामने लाना था।

स्पीकर साहब, कुर्सी आपकी नहीं, संसद की है!

मीरा कुमार ने बिना शोर मचाए बता दिया कि अध्यक्ष की ताकत माइक बंद कराने में नहीं, हर आवाज को सुनने का अवसर देने में है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं और विपक्ष कोई दुश्मन नहीं होता।

ओम बिरला के लिए यह दृश्य एक आईना है। सवाल सीधा है—क्या अध्यक्ष की कुर्सी सत्ता पक्ष की सुविधा के लिए है या पूरे सदन के अधिकारों की रक्षा के लिए?

स्पीकर साहब, माइक का स्विच आपके हाथ में हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की आवाज किसी एक दल की जागीर नहीं है। मीरा कुमार ने कुर्सी की इज्जत कमाए हुए सम्मान से बढ़ाई थी। कुर्सी पर बैठकर केवल आदेश देने से कोई निष्पक्ष अध्यक्ष नहीं बन जाता।

संसद में अध्यक्ष चाहिए, पार्टी का रंगदार पहरेदार नहीं।

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