अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
ट्रंप की नई आर्थिक जंग
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब सैन्य दबाव के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे को भी निर्णायक हथियार बनाने की कोशिश तेज कर दी है। ट्रंप ने ईरान को आर्थिक मदद देने वाले देशों को भारी आर्थिक कीमत चुकाने की चेतावनी देते हुए इसे एक तरह का “इकोनॉमिक डी-डे” बताया है। उनका संदेश साफ है—ईरान के साथ तेल कारोबार, धन हस्तांतरण, जहाजों की आवाजाही, फ्रंट कंपनियों या दूसरे रास्तों से आर्थिक संबंध रखने वाले देशों को अमेरिका बख्शने के मूड में नहीं है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत के दम पर पूरी दुनिया को ईरान से दूर कर सकता है? समस्या यह है कि ईरान अकेला नहीं है। उसके पीछे चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियां खड़ी हैं, जिनके साथ उसके आर्थिक, ऊर्जा, सैन्य और रणनीतिक संबंध पिछले कई वर्षों में काफी गहरे हो चुके हैं। यही कारण है कि ट्रंप की रणनीति कागज पर जितनी कठोर दिखाई देती है, जमीन पर उसे लागू करना उतना आसान नहीं होगा।
अमेरिका का सबसे बड़ा निशाना चीन
ईरान के लिए सबसे बड़ी आर्थिक ताकत चीन है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025 में ईरान से समुद्री रास्ते से भेजे गए तेल का लगभग 80 प्रतिशत चीन ने खरीदा। यही आंकड़ा बताता है कि ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह दबाने के लिए अमेरिका को सिर्फ तेहरान पर प्रतिबंध लगाने से काम नहीं चलेगा। उसे चीन के साथ भी टकराव मोल लेना पड़ेगा। लेकिन चीन कोई ऐसा देश नहीं है जिस पर वॉशिंगटन आसानी से दबाव डालकर अपनी नीति मनवा ले। चीन खुद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है और अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर उसकी निर्भरता पहले जैसी नहीं रही। इसके अलावा ईरानी तेल खरीदने वाली कई चीनी रिफाइनरियां ऐसी हैं जिनका कारोबार अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से सीधे तौर पर बहुत ज्यादा जुड़ा हुआ नहीं है। इसलिए अमेरिका अगर चीन के बैंकों और कंपनियों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाता है, तो चोट केवल चीन को नहीं लगेगी। उसका असर अमेरिका-चीन के पहले से तनावपूर्ण आर्थिक रिश्तों पर भी पड़ेगा।
चीन क्यों पीछे नहीं हटेगा?
चीन के लिए ईरान केवल सस्ता तेल खरीदने का स्रोत नहीं है। ईरान पश्चिम एशिया में चीन के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। चीन लंबे समय से ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहा है जहां अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा व्यवस्था केवल अमेरिकी नियमों पर निर्भर न रहे। ऐसे में ईरान के साथ कारोबार जारी रखना उसके लिए आर्थिक हित के साथ-साथ रणनीतिक संदेश भी है। बीजिंग पहले ही कई मौकों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ अपनी असहमति जताता रहा है। चीन का तर्क है कि एकतरफा प्रतिबंध किसी समस्या का समाधान नहीं करते और विवादों को राजनीतिक तथा कूटनीतिक तरीके से सुलझाया जाना चाहिए। इसलिए अगर ट्रंप चीन पर यह दबाव डालते हैं कि वह ईरान से तेल खरीदना बंद करे, तो बीजिंग इसे केवल ईरान का मामला नहीं मानेगा। वह इसे अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ अमेरिकी दबाव के रूप में देख सकता है।
ट्रंप के सामने सबसे बड़ी दुविधा
यहीं ट्रंप की रणनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ अमेरिका ईरान पर इतना दबाव बनाना चाहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाए और तेहरान अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर हो। दूसरी तरफ वॉशिंगटन चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को पूरी तरह खराब करने का जोखिम भी नहीं उठा सकता। अमेरिका और चीन के बीच पहले से व्यापार, तकनीक, टैरिफ और वैश्विक प्रभाव को लेकर तनाव है। अगर ईरान के मुद्दे पर अमेरिका चीनी बैंकों, रिफाइनरियों और कंपनियों पर बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगाने लगता है, तो बीजिंग भी जवाबी कदम उठा सकता है। ऐसे में ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश कहीं अमेरिका-चीन आर्थिक टकराव को और गहरा न कर दे, यही ट्रंप प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
रूस की कहानी अलग है
ईरान के मामले में रूस की भूमिका चीन से अलग है। रूस चीन जितना बड़ा व्यापारिक साझेदार भले न हो, लेकिन पिछले कई वर्षों में मॉस्को और तेहरान ने पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए अपनी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी काफी मजबूत की है। जनवरी 2025 में दोनों देशों ने 20 साल का रणनीतिक साझेदारी समझौता किया। इसके बाद व्यापारिक संबंधों को भी बढ़ावा मिला। दोनों देश तेल और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग करते हैं और पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था से बाहर अपने रास्ते तलाशते रहे हैं। यही वजह है कि रूस पर पहले से व्यापक अमेरिकी प्रतिबंध होने के बावजूद मॉस्को ने ईरान के साथ संबंध खत्म नहीं किए।
रूस को धमकाना आसान नहीं
अमेरिका के लिए रूस पर नए प्रतिबंध लगाना कोई नई बात नहीं है। रूस पहले से ही भारी अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इसके बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह पश्चिमी व्यवस्था पर निर्भर नहीं है। रूस ने चीन, भारत, ईरान और दूसरे देशों के साथ वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते विकसित किए हैं। ऊर्जा व्यापार में डॉलर के बाहर दूसरी मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं की कोशिशें भी इसी दिशा का हिस्सा हैं। ऐसे में अगर अमेरिका ईरान की मदद करने के आरोप में रूस पर और दबाव डालता है, तो मॉस्को के पास पहले से मौजूद वैकल्पिक नेटवर्क का इस्तेमाल करने की क्षमता है। इसका अर्थ यह नहीं कि रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का कोई असर नहीं होगा। असर होगा। लेकिन ईरान को पूरी तरह आर्थिक रूप से अलग-थलग करना फिर भी मुश्किल रहेगा।
ईरान के पास अब पुराने दौर से ज्यादा विकल्प हैं
ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच जी रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव है, मुद्रा पर दबाव है और व्यापार के लिए उसे कठिन रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ता है। लेकिन इतने वर्षों में तेहरान ने भी प्रतिबंधों से बचने के कई तरीके विकसित किए हैं। तेल की बिक्री के वैकल्पिक रास्ते, गैर-पश्चिमी बैंकिंग चैनल, क्षेत्रीय व्यापार और पड़ोसी देशों के साथ संबंध उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। अब चीन और रूस के साथ गहरे रिश्ते उसे कुछ अतिरिक्त विकल्प देते हैं। इसलिए ट्रंप अगर यह मानते हैं कि अमेरिकी आर्थिक दबाव लगाते ही ईरान घुटने टेक देगा, तो वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा जटिल हो सकती है।
BRICS ईरान के लिए नया दरवाजा बन सकता है
ईरान BRICS जैसे मंचों को भी पश्चिमी आर्थिक दबाव से बाहर निकलने के संभावित रास्ते के रूप में देख रहा है। ईरान ने BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक से जुड़ने की इच्छा भी जताई है। अगर भविष्य में उसे ऐसे वित्तीय तंत्रों तक पहुंच मिलती है जो पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर नहीं हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता को चुनौती मिल सकती है। अभी इसे किसी तत्काल विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी, लेकिन दिशा महत्वपूर्ण है। दुनिया में कई देश अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या वैश्विक वित्तीय व्यवस्था हमेशा एक ही शक्ति के नियंत्रण में रहनी चाहिए। ईरान इसी बदलती सोच का फायदा उठाना चाहता है।
डॉलर बनाम वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था
अमेरिका की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था नहीं है। अमेरिकी डॉलर और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उसकी केंद्रीय भूमिका वॉशिंगटन को असाधारण शक्ति देती है। अमेरिकी प्रतिबंधों का असर इसलिए भी व्यापक होता है क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार और वित्तीय लेन-देन किसी न किसी स्तर पर अमेरिकी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लेकिन अब चीन, रूस, ईरान और कुछ अन्य देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं और आपसी वित्तीय सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं। अभी डॉलर की जगह लेना आसान नहीं है और निकट भविष्य में इसकी संभावना भी सीमित है। लेकिन यदि लगातार दबाव बढ़ता रहा, तो दुनिया धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था की तरफ जा सकती है जहां अमेरिकी प्रतिबंधों की मार पहले जितनी व्यापक न रहे।
अमेरिका के सामने सिर्फ ईरान नहीं, एक बड़ा भू-राजनीतिक सवाल है
ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध को केवल अमेरिका बनाम ईरान के रूप में देखना अधूरा होगा। असली लड़ाई इससे बड़ी है। यह इस बात को लेकर भी है कि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पर किसका कितना प्रभाव रहेगा। अमेरिका चाहता है कि उसकी वित्तीय और आर्थिक शक्ति विदेश नीति का प्रभावी हथियार बनी रहे। चीन चाहता है कि उसके पास अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए ज्यादा स्वतंत्रता हो। रूस पहले ही पश्चिमी प्रतिबंधों से बाहर वैकल्पिक नेटवर्क बनाने की कोशिश कर चुका है। ईरान इन्हीं बदलती परिस्थितियों में अपने लिए जगह तलाश रहा है।
पश्चिम एशिया की लड़ाई का असर दुनिया तक जाएगा
ईरान पर आर्थिक दबाव जितना बढ़ेगा, उसका असर केवल ईरान की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ेगा। तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार, शिपिंग, बीमा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। अगर तनाव फारस की खाड़ी और समुद्री रास्तों तक पहुंचता है, तो पूरी दुनिया इसकी कीमत चुका सकती है। एशिया के लिए इसका महत्व और ज्यादा है क्योंकि भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता पश्चिम एशिया से आने वाली ऊर्जा पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भर हैं।
यानी ईरान को आर्थिक रूप से दबाने की कोशिश में अमेरिका को एक और मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है—वह ईरान पर जितना ज्यादा दबाव बढ़ाएगा, उतना ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है। और अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर उन देशों पर भी पड़ेगा जो ईरान के साथ किसी राजनीतिक गठजोड़ में नहीं हैं।
भारत के लिए भी यह सिर्फ दूर की खबर नहीं
भारत को इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ध्यान से देखना होगा। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ईरान भारत के लिए ऊर्जा, मध्य एशिया तक पहुंच और चाबहार जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक हितों से जुड़ा हुआ है। दूसरी तरफ भारत के अमेरिका के साथ भी गहरे रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। इसलिए भारत के सामने संतुलन की चुनौती है। उसे ईरान के साथ अपने वैध राष्ट्रीय हितों को बचाना है और साथ ही अमेरिका के साथ अपने बढ़ते संबंधों को भी नुकसान नहीं पहुंचाना है।
यही कारण है कि भारत के लिए किसी भी महाशक्ति के दबाव में तुरंत किसी एक खेमे में जाना सही रणनीति नहीं होगी। भारत को अपने हितों के आधार पर फैसले लेने होंगे। बदलती दुनिया में रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यही है कि भारत अमेरिका के साथ भी काम करे, रूस से भी संवाद रखे, चीन से प्रतिस्पर्धा के साथ जरूरत पड़ने पर बातचीत करे और ईरान के साथ भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंध बनाए रखे।
ट्रंप की रणनीति कितनी सफल होगी?
ट्रंप की आर्थिक रणनीति ईरान पर गंभीर दबाव डाल सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आर्थिक दबाव और पूर्ण आर्थिक अलगाव में बहुत अंतर है। अमेरिका अगर ईरान के हर आर्थिक रास्ते को बंद करना चाहता है, तो उसे चीन, रूस, UAE और दूसरे व्यापारिक साझेदारों पर भी लगातार दबाव डालना पड़ेगा। जितने ज्यादा देशों पर दबाव बढ़ेगा, उतना ही यह अभियान केवल ईरान के खिलाफ कार्रवाई न रहकर वैश्विक आर्थिक टकराव में बदल सकता है।
यही कारण है कि ट्रंप के सामने सबसे कठिन सवाल यह नहीं है कि अमेरिका ईरान पर कितना दबाव डाल सकता है। असली सवाल यह है कि अमेरिका कितने देशों को एक साथ अपने साथ रख सकता है। आर्थिक प्रतिबंध तब सबसे प्रभावी होते हैं जब कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक ही दिशा में चलें। लेकिन अगर चीन और रूस जैसे देश अलग रास्ता चुनते हैं, तो प्रतिबंधों की ताकत कम हो सकती है।
ईरान की मुश्किल खत्म नहीं हुई है
यह भी गलत होगा कि चीन और रूस के समर्थन को ईरान के लिए किसी जादुई सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाए। अमेरिकी प्रतिबंध ईरानी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालते हैं। व्यापार की लागत बढ़ती है, निवेश मुश्किल होता है, बैंकिंग चैनल सीमित होते हैं और आम लोगों पर भी आर्थिक असर पड़ सकता है। चीन और रूस ईरान की मदद कर सकते हैं, लेकिन वे ईरान की सारी आर्थिक समस्याओं को खत्म नहीं कर सकते।
इसलिए ईरान के सामने भी आसान रास्ता नहीं है। उसे एक तरफ अमेरिकी दबाव का सामना करना है और दूसरी तरफ अपनी अर्थव्यवस्था को चलाए रखना है। अगर संघर्ष लंबा चलता है, तो उसके लिए आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ सकता है।
असली लड़ाई अब प्रतिबंधों से आगे की है
ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान एक बड़े बदलाव की ओर संकेत कर रहा है। दुनिया धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है जहां एक तरफ अमेरिका की विशाल आर्थिक और वित्तीय शक्ति है, तो दूसरी तरफ चीन, रूस और दूसरे देश अपने वैकल्पिक नेटवर्क विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह बदलाव रातोंरात नहीं होगा। डॉलर की जगह कोई दूसरी मुद्रा तुरंत नहीं ले सकती और अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था को दरकिनार करना भी आसान नहीं है। लेकिन वैश्विक राजनीति में दिशा अक्सर छोटे-छोटे बदलावों से बनती है।
अगर चीन और रूस ईरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखते हैं, अगर BRICS के भीतर वैकल्पिक वित्तीय रास्ते विकसित होते हैं और अगर अधिक देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाते हैं, तो आने वाले वर्षों में अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों की शक्ति को पहले जैसी चुनौती मिल सकती है।
निष्कर्ष: ईरान को घेरना आसान, अलग-थलग करना मुश्किल
ट्रंप ईरान को आर्थिक रूप से घेरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ईरान को पूरी तरह दुनिया से अलग करना आसान नहीं होगा। चीन उसके लिए सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है, रूस रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है और BRICS जैसे मंच तेहरान को पश्चिमी व्यवस्था से बाहर नए रास्ते तलाशने का अवसर देते हैं।
अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसके प्रतिबंधों की ताकत वास्तविक है। लेकिन आज की दुनिया पहले जैसी एकध्रुवीय नहीं रही। चीन अपने हितों के लिए अमेरिका से टकराने का जोखिम उठा सकता है। रूस पहले ही पश्चिमी प्रतिबंधों के साथ जीने की रणनीति विकसित कर चुका है। और ईरान लंबे समय से दबाव झेलते हुए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है।
इसलिए ट्रंप की असली परीक्षा ईरान को धमकी देने में नहीं, बल्कि यह साबित करने में होगी कि अमेरिकी दबाव के बावजूद चीन और रूस को किस हद तक अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है, लेकिन अगर चीन और रूस उसके साथ खड़े रहते हैं, तो ट्रंप के लिए उसे पूरी तरह अलग-थलग करना एक लंबी, महंगी और बेहद कठिन लड़ाई साबित हो सकती है।



