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ट्रंप का ‘इकोनॉमिक डी-डे’: ईरान को घेरने निकला अमेरिका, लेकिन चीन-रूस बन सकते हैं सबसे बड़ी दीवार

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026

ईरान पर युद्ध के बाद अब आर्थिक घेराबंदी की तैयारी

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। सैन्य कार्रवाई और मिसाइलों की लड़ाई के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जिस तरह की आर्थिक कार्रवाई की घोषणा की है, उसका मकसद सिर्फ ईरान को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन देशों को भी दबाव में लाना है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं। ट्रंप ने इसे बेहद कड़ी आर्थिक कार्रवाई बताते हुए चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान को आर्थिक मदद या व्यापारिक रास्ता उपलब्ध कराएगा, उसे भी गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। यानी अमेरिका अब केवल तेहरान को निशाना नहीं बनाना चाहता, बल्कि ईरान की पूरी आर्थिक जीवनरेखा काटने की कोशिश कर रहा है। तेल की बिक्री, बैंकिंग, जहाजों की आवाजाही, नकद लेन-देन, एक्सचेंज हाउस, शिप रजिस्ट्रियां और दूसरी व्यापारिक व्यवस्थाएं अब अमेरिकी दबाव के निशाने पर हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका वास्तव में ईरान को पूरी तरह दुनिया से काट सकता है? यहीं से इस पूरी रणनीति की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है—ईरान अकेला नहीं है। उसके साथ चीन और रूस जैसे दो ऐसे देश खड़े हैं, जिनकी अपनी वैश्विक ताकत, अपने आर्थिक हित और अमेरिका के साथ अपने अलग-अलग रणनीतिक समीकरण हैं।

अमेरिका का सबसे बड़ा संकट: ईरान से ज्यादा चीन और रूस

ईरान पर प्रतिबंध लगाना अमेरिका के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था ने इन्हीं परिस्थितियों में वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते तलाशे हैं। असली चुनौती तब पैदा होती है जब अमेरिका ईरान से जुड़े दूसरे देशों को भी अपने प्रतिबंधों के दायरे में लाने की कोशिश करता है। रूस पहले से ही अमेरिका और पश्चिमी देशों के व्यापक प्रतिबंधों के अधीन है। इसलिए मॉस्को के लिए अमेरिकी आर्थिक व्यवस्था से बाहर रहकर ईरान के साथ काम करना कोई बिल्कुल नई स्थिति नहीं है। दूसरी तरफ चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और ईरान का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार भी है। ऐसे में अमेरिका यदि चीन से कहता है कि वह ईरान से तेल न खरीदे, ईरान के साथ व्यापार न करे या उसके वित्तीय लेन-देन को रोक दे, तो मामला केवल ईरान पर प्रतिबंध का नहीं रहेगा। यह सीधे अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक शक्ति की लड़ाई बन जाएगा। यही वजह है कि ट्रंप की आर्थिक धमकी जितनी बड़ी दिखाई देती है, उसे लागू करना उतना ही आसान नहीं है।

ईरान का तेल और चीन: अमेरिका के लिए सबसे मुश्किल मोर्चा

ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए तेल सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है और चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार रहा है। उपलब्ध विश्लेषण के मुताबिक 2025 में ईरान से समुद्र के रास्ते भेजे गए तेल का बहुत बड़ा हिस्सा चीन पहुंचा। यही वह जगह है जहां अमेरिका की रणनीति मुश्किल में पड़ सकती है। चीन की कई रिफाइनरियां और व्यापारिक संस्थाएं अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर उतनी निर्भर नहीं हैं जितनी पश्चिमी कंपनियां हैं। इसलिए वॉशिंगटन के लिए चीन की हर उस कंपनी पर कार्रवाई करना आसान नहीं होगा जो ईरानी तेल खरीदती है। अमेरिका किसी बड़े चीनी बैंक पर प्रतिबंध लगाकर दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन इसके बाद चीन की प्रतिक्रिया भी आएगी। आज अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, टैरिफ, सप्लाई चेन और वैश्विक प्रभाव को लेकर पहले से ही गहरी प्रतिस्पर्धा है। ऐसे समय में ईरान को लेकर चीन पर अत्यधिक दबाव डालना उस आर्थिक रिश्ते को और खराब कर सकता है जिसे दोनों देश किसी न किसी स्तर पर संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रंप की दुविधा: चीन को दबाएं या चीन से संबंध बचाएं?

यही ट्रंप की पूरी रणनीति की सबसे बड़ी दुविधा है। अगर अमेरिका ईरान के व्यापारिक साझेदारों पर बड़े पैमाने पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाता है, तो वह चीन को भी कठोर विकल्प चुनने के लिए मजबूर कर सकता है। लेकिन अगर चीन जवाबी कार्रवाई करता है, तो उसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, तेल बाजार, बैंकिंग, शिपिंग और सप्लाई चेन तक प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिका और चीन पहले ही आर्थिक टकराव के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में वॉशिंगटन के सामने सवाल यह है कि वह ईरान को कमजोर करने के लिए चीन के साथ आर्थिक तनाव को कितना बढ़ा सकता है। यही कारण है कि ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश कागज पर जितनी शक्तिशाली दिखाई देती है, जमीन पर उतनी ही जटिल है। अमेरिका के पास प्रतिबंधों की ताकत है, डॉलर की ताकत है और दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय व्यवस्था पर उसका प्रभाव है, लेकिन उसके सामने ऐसे देश भी हैं जिनके पास अपनी अर्थव्यवस्थाएं, अपने बाजार और अपने वैकल्पिक रास्ते हैं।

रूस पहले से प्रतिबंधों में है, इसलिए डर की सीमा भी अलग है

रूस की स्थिति चीन से अलग है। रूस पहले ही पश्चिमी प्रतिबंधों का बड़ा हिस्सा झेल रहा है। इसलिए मॉस्को के लिए अमेरिकी दबाव का डर उस सीमा तक नहीं है, जितना किसी ऐसे देश के लिए हो सकता है जिसकी अर्थव्यवस्था अमेरिकी बाजार और डॉलर व्यवस्था पर बहुत ज्यादा निर्भर हो। रूस और ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपने संबंधों को सिर्फ राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रखा। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, सैन्य सहयोग और पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के वैकल्पिक रास्तों पर भी काम हुआ है। जनवरी 2025 में दोनों देशों ने 20 साल की साझेदारी का समझौता किया था। ऐसे में अगर अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाता है, तो रूस के पास ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखने के पर्याप्त रणनीतिक कारण मौजूद हैं। दोनों देशों के सामने एक समान चुनौती है—पश्चिमी दबाव से अपनी अर्थव्यवस्थाओं और रणनीतिक हितों को बचाना।

ईरान के लिए चीन-रूस सिर्फ व्यापारिक साझेदार नहीं

ईरान के लिए चीन और रूस का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वे उसके साथ व्यापार करते हैं। असली महत्व यह है कि ये दोनों देश ईरान को पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था से बाहर वैकल्पिक रास्ते खोजने में मदद कर सकते हैं। व्यापार स्थानीय मुद्राओं में हो सकता है, अलग-अलग बैंकिंग रास्ते तलाशे जा सकते हैं, वस्तु-विनिमय या दूसरे भुगतान मॉडल सामने आ सकते हैं और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए व्यापार जारी रखा जा सकता है। यह व्यवस्था अमेरिकी डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था जितनी आसान या प्रभावशाली नहीं होगी, लेकिन ईरान के लिए सवाल सुविधा का नहीं, अस्तित्व का है। अगर तेहरान को विकल्प चुनना पड़े कि अमेरिकी दबाव के सामने झुकना है या कठिन और महंगे वैकल्पिक रास्तों से अपनी अर्थव्यवस्था चलानी है, तो वह दूसरा रास्ता चुनने की कोशिश करेगा। यही कारण है कि केवल प्रतिबंधों के जरिए किसी देश की राजनीतिक इच्छाशक्ति को तोड़ देना हमेशा संभव नहीं होता।

ईरान के लिए BRICS एक और रास्ता खोल सकता है

ईरान अब BRICS जैसे मंचों का इस्तेमाल भी अपने लिए नए आर्थिक रास्ते खोजने के लिए करना चाहता है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान BRICS New Development Bank से जुड़ने की संभावना तलाश रहा है। अगर भविष्य में उसे इस दिशा में सफलता मिलती है, तो पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं पर उसकी निर्भरता कम करने के लिए एक और विकल्प सामने आ सकता है। ईरान की सोच यह भी है कि BRICS के सदस्य देश आपसी व्यापार में अपनी-अपनी मुद्राओं का ज्यादा इस्तेमाल कर सकते हैं। यह व्यवस्था रातोंरात डॉलर को खत्म नहीं कर देगी और न ही इससे अमेरिकी वित्तीय शक्ति तुरंत समाप्त होगी। लेकिन अगर ऐसे वैकल्पिक नेटवर्क धीरे-धीरे मजबूत होते हैं, तो अमेरिका की एकतरफा प्रतिबंध नीति की प्रभावशीलता जरूर कम हो सकती है। यही वजह है कि ईरान पर जारी संघर्ष को केवल अमेरिका बनाम ईरान की लड़ाई मानना अब पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को लेकर भी एक बड़ी लड़ाई चल रही है।

अमेरिका की आर्थिक ताकत बड़ी है, लेकिन असीमित नहीं

इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली आर्थिक और वित्तीय क्षमताओं में से एक है। डॉलर का वैश्विक प्रभाव, अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था, वित्तीय संस्थाओं की पहुंच और अमेरिकी बाजार तक पहुंच आज भी दुनिया के अधिकांश देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन यही बात अमेरिका के खिलाफ भी एक सीमा पैदा करती है। जितना अधिक अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए करेगा, उतना ही दूसरे देश वैकल्पिक रास्ते खोजने की कोशिश करेंगे। अगर कोई देश लगातार देखता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसके व्यापार पर खतरा पैदा हो सकता है, तो वह धीरे-धीरे अपने भुगतान तंत्र, व्यापारिक साझेदार और आपूर्ति के स्रोत बदलने की कोशिश करेगा। इस प्रक्रिया में समय लगता है, लेकिन यही प्रक्रिया लंबे समय में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है।

युद्ध मैदान से निकलकर अब अर्थव्यवस्था में पहुंच गया है

ईरान के खिलाफ अमेरिका की रणनीति को केवल प्रतिबंधों की सूची के रूप में देखना भी सही नहीं होगा। इसके पीछे सैन्य दबाव, समुद्री नाकेबंदी, तेल व्यापार पर नियंत्रण और वैश्विक वित्तीय दबाव एक साथ काम कर रहे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान से जुड़े समुद्री व्यापार को रोकने के लिए कई वाणिज्यिक जहाजों को मोड़ने, कुछ को निष्क्रिय करने और कुछ पर सवार होकर कार्रवाई करने की जानकारी दी है। इसका सीधा मतलब है कि संघर्ष अब जमीन या हवाई हमलों तक सीमित नहीं है। समुद्री रास्ते भी युद्ध का हिस्सा बन गए हैं। और जब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक—हॉर्मुज़—से जुड़ी आवाजाही प्रभावित होती है, तो उसका असर केवल ईरान और अमेरिका पर नहीं पड़ता। इसका असर पूरी दुनिया के तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

हॉर्मुज़ का संकट दुनिया के लिए खतरे की घंटी

ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि यह ऐसे क्षेत्र में हो रहा है जहां से दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। अगर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में लंबे समय तक तनाव बना रहता है, जहाजों की आवाजाही बाधित होती है या बीमा और शिपिंग लागत बढ़ती है, तो तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। तेल महंगा होगा तो परिवहन महंगा होगा, उत्पादन लागत बढ़ेगी और अंततः महंगाई का असर आम लोगों तक पहुंचेगा। इसलिए अमेरिका की ईरान नीति केवल विदेश नीति का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था और हर उस देश से है जो ऊर्जा आयात करता है।

भारत के लिए भी यह संकट बेहद महत्वपूर्ण है

भारत को इस पूरे घटनाक्रम को बहुत सावधानी से देखना होगा। भारत के लिए ईरान केवल एक दूर का पश्चिम एशियाई देश नहीं है। ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का महत्वपूर्ण रास्ता है। दूसरी तरफ भारत ऊर्जा का बड़ा आयातक है। इसलिए ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव और हॉर्मुज़ में तनाव दोनों भारत के लिए सीधे रणनीतिक और आर्थिक चिंता का विषय हैं। भारत को एक तरफ अमेरिका के साथ अपने मजबूत रणनीतिक संबंधों को संभालना है और दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने वैध आर्थिक तथा कनेक्टिविटी हितों की रक्षा भी करनी है। यही भारतीय विदेश नीति की असली परीक्षा होगी—किसी एक खेमे में आंख बंद करके खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर फैसले लेना।

भारत को अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन रखना होगा

भारत की ताकत उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता में है। अमेरिका आज भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को हर अंतरराष्ट्रीय संकट में अमेरिकी नीति की हूबहू नकल करनी चाहिए। उसी तरह ईरान के साथ संबंधों का मतलब यह भी नहीं कि भारत अमेरिकी चिंताओं को नजरअंदाज कर दे। भारत को अपने हितों के आधार पर दोनों पक्षों से बातचीत करनी होगी। अगर पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा चलता है तो भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, व्यापारिक रास्ते और चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे। इस समय भारत को भावनात्मक बयानबाजी से ज्यादा शांत और व्यावहारिक कूटनीति की जरूरत है।

ट्रंप की ‘अधिकतम दबाव’ नीति की असली परीक्षा अब होगी

ट्रंप प्रशासन का दावा है कि कठोर आर्थिक दबाव ईरान को झुकने पर मजबूर कर सकता है। लेकिन इतिहास बताता है कि प्रतिबंध हमेशा राजनीतिक आत्मसमर्पण में नहीं बदलते। कई बार प्रतिबंध किसी देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करते हैं, आम लोगों की जिंदगी कठिन बनाते हैं, लेकिन सरकार की रणनीतिक नीति नहीं बदलते। ईरान लंबे समय से प्रतिबंधों के बीच रह रहा है। उसने प्रतिबंधों से बचने के लिए व्यापारिक नेटवर्क बनाए हैं, वैकल्पिक भुगतान रास्ते तलाशे हैं और अपने प्रमुख साझेदारों के साथ संबंध मजबूत किए हैं। इसलिए अमेरिका के सामने चुनौती यह है कि वह आर्थिक दबाव को कितना बढ़ा सकता है, बिना इस प्रक्रिया में चीन और रूस के साथ एक बड़ा टकराव पैदा किए।

सबसे बड़ा सवाल: क्या अमेरिका दुनिया को अपनी शर्तों पर चला सकता है?

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बहुत बड़ा सवाल छिपा है—क्या अमेरिका आज भी दुनिया के हर देश को अपनी आर्थिक शर्तें मानने के लिए मजबूर कर सकता है? जवाब सीधा नहीं है। अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसकी वित्तीय ताकत बहुत बड़ी है। लेकिन दुनिया भी बदल रही है। चीन आर्थिक महाशक्ति है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद अपनी वैकल्पिक व्यवस्था बनाए हुए है। BRICS जैसे मंच वैश्विक दक्षिण के देशों को अलग-अलग आर्थिक विकल्पों पर सोचने का अवसर दे रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पश्चिमी व्यवस्था खत्म होने वाली है। लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है जहां एक ही शक्ति के फैसले को चुनौती देने की क्षमता पहले से ज्यादा दिखाई दे रही है।

ईरान की कमजोरी भी कम नहीं

हालांकि इस पूरी कहानी में ईरान को केवल मजबूत खिलाड़ी के रूप में देखना भी गलती होगी। अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर लंबे समय से दबाव डाला है। युद्ध की लागत अलग है और व्यापारिक रास्तों पर दबाव अलग। अगर अमेरिका समुद्री व्यापार, तेल निर्यात और वित्तीय लेन-देन को बड़े स्तर पर बाधित करने में सफल होता है, तो ईरान के सामने गंभीर आर्थिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। चीन और रूस ईरान की मदद कर सकते हैं, लेकिन वे ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी दबाव से बचाने की गारंटी नहीं दे सकते। इसलिए तेहरान के सामने भी कठिन चुनौती है। उसे युद्ध लड़ना है, अर्थव्यवस्था चलानी है, जनता को संभालना है और साथ ही अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को बनाए रखना है।

असली जीत युद्ध खत्म करने में है

इस संकट में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अमेरिका कितना बड़ा प्रतिबंध लगा सकता है या ईरान कितने समय तक प्रतिबंध झेल सकता है। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या दोनों पक्ष किसी ऐसे राजनीतिक रास्ते पर लौट सकते हैं जहां युद्ध और आर्थिक तबाही की जगह बातचीत हो। सैन्य शक्ति किसी देश को युद्ध जीतने में मदद कर सकती है, लेकिन स्थायी शांति नहीं बना सकती। आर्थिक प्रतिबंध किसी सरकार पर दबाव डाल सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे राजनीतिक समाधान पैदा कर दें। अगर अंत में दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर ही लौटना है, तो जितनी जल्दी यह समझ आए उतना बेहतर होगा।

दुनिया को एक और लंबी जंग की जरूरत नहीं

आज दुनिया पहले ही कई संकटों से गुजर रही है। ऐसे में पश्चिम एशिया में लंबा युद्ध केवल ईरान और अमेरिका को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। इसका असर तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार, समुद्री मार्गों, खाद्य और ऊर्जा महंगाई और दुनिया की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। सबसे ज्यादा नुकसान उन आम लोगों को होगा जिनका इस भू-राजनीतिक संघर्ष में कोई हाथ नहीं है। इसलिए किसी भी सरकार के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण होना चाहिए कि उसकी रणनीति राजनीतिक जीत के बाद दुनिया को किस स्थिति में छोड़ेगी।

निष्कर्ष: आर्थिक दबाव से ज्यादा जरूरी है राजनीतिक रास्ता

ट्रंप का ‘इकोनॉमिक डी-डे’ एक बड़ी घोषणा जरूर है, लेकिन इसकी सफलता केवल अमेरिकी प्रतिबंधों की कठोरता से तय नहीं होगी। असली फैसला इस बात से होगा कि चीन कितना साथ देता है, रूस कितना सहयोग करता है, ईरान कितने वैकल्पिक रास्ते खोजता है और दुनिया के दूसरे देश अमेरिकी दबाव के सामने कितना झुकते हैं। अमेरिका के पास आर्थिक ताकत है, लेकिन चीन और रूस के अपने हित हैं। ईरान कमजोर हो सकता है, लेकिन पूरी तरह अकेला नहीं है। और दुनिया अब पहले जैसी एकध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था भी नहीं रही।

इसलिए ईरान को घेरने की अमेरिकी कोशिश एक बड़े सवाल की शुरुआत है—क्या प्रतिबंधों के दम पर किसी देश को पूरी दुनिया से काटा जा सकता है, जब उसके साथ चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देश खड़े हों? आने वाले महीनों में इसका जवाब मिलेगा। लेकिन एक बात अभी साफ है—यह लड़ाई अब सिर्फ वॉशिंगटन और तेहरान के बीच नहीं है। इसके पीछे दुनिया की बदलती आर्थिक व्यवस्था, चीन-अमेरिका की प्रतिस्पर्धा, रूस की पश्चिम-विरोधी रणनीति और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती भूमिका भी दांव पर लगी है।

और भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है—दूसरों की लड़ाई में किसी खेमे का हिस्सा बनने से ज्यादा जरूरी है अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक रास्ते और रणनीतिक स्वतंत्रता—इन चारों को बचाकर चलना ही भारत की सबसे समझदार नीति होगी।

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