राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
युवाओं के सवालों के बीच सरकार का नया यूथ फोकस
देश में छात्रों, Gen Z और अब Gen Alpha के सवाल लगातार सरकार के सामने चुनौती बनकर खड़े हो रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, सरकारी स्कूलों की बदहाली, रोजगार के अवसर और युवाओं की भागीदारी तक—नई पीढ़ी अब सिर्फ भाषण सुनने वाली पीढ़ी नहीं रह गई है। छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं, युवा सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं और स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर Gen Alpha तक अपनी आवाज दर्ज करा रही है। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का केंद्र सरकार के शीर्ष अधिकारियों से युवाओं और विश्वविद्यालयों के साथ ज्यादा जुड़ने को कहना बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार के आलोचकों की नजर में यह युवाओं के बढ़ते सवालों और असंतोष के बीच सरकार का नया यूथ नैरेटिव है। यानी जिन सवालों का जवाब जमीन पर देना मुश्किल हो रहा है, उनके बीच अब संवाद और यूथ कनेक्ट का नया शिगूफा सामने आया है।
प्रधानमंत्री ने अफसरों को दिया युवाओं से जुड़ने का निर्देश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को अपने आवास पर केंद्र सरकार के सचिवों के साथ तीसरी हाई लेवल बैठक की। बैठक में इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी, सुरक्षा, विदेश नीति और शासन व्यवस्था समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। सरकार की ओर से जारी बयान के मुताबिक प्रधानमंत्री ने अधिकारियों से तत्काल मुद्दों और आंकड़ों तक सीमित रहने के बजाय लंबी अवधि की सोच के साथ देश के भविष्य की दिशा तय करने को कहा। उन्होंने सरकारी विभागों के बीच काम करने वाली ‘साइलो’ व्यवस्था को खत्म करने और अधिकारियों में जिम्मेदारी की भावना बढ़ाने पर भी जोर दिया। लेकिन बैठक का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला संदेश युवाओं को लेकर था। प्रधानमंत्री ने सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के बीच ज्यादा संवाद की जरूरत बताई और कहा कि युवाओं तथा विश्वविद्यालयों के साथ व्यापक संपर्क से नीति निर्माण में नए और गैर-पारंपरिक विचार सामने आ सकते हैं।
सवाल—अचानक युवाओं की इतनी याद क्यों आई?
प्रधानमंत्री का यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब देश में युवा वर्ग से जुड़े सवाल लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों से लेकर परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल, सरकारी स्कूलों की स्थिति, रोजगार और उच्च शिक्षा की चुनौतियां युवाओं के बीच चिंता का कारण हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार को युवाओं के साथ ज्यादा संवाद की जरूरत अब क्यों महसूस हो रही है? क्या यह सिर्फ सामान्य प्रशासनिक पहल है या इसके पीछे बदलते राजनीतिक माहौल की भी भूमिका है? सरकार के समर्थक इसे युवाओं को नीति निर्माण में शामिल करने की सकारात्मक पहल बता सकते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब युवा लगातार व्यवस्था से सवाल पूछ रहा है, तब केवल संवाद की भाषा बदलना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार उन सवालों के जवाब और समाधान भी बदलने को तैयार है?
15 अगस्त के बाद अब अधिकारियों की बैठक में भी युवा एजेंडा
युवाओं पर प्रधानमंत्री का बढ़ता जोर सिर्फ इस बैठक तक सीमित नहीं है। 15 अगस्त को लाल किले से दिए स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भी युवाओं का बार-बार उल्लेख किया गया था। प्रधानमंत्री ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, युवाओं के लिए एआई स्किलिंग कार्यक्रम और 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए देशव्यापी स्पोर्ट्स टैलेंट हंट जैसी घोषणाएं की थीं। अब इसके कुछ ही दिनों बाद शीर्ष अधिकारियों की बैठक में युवाओं और विश्वविद्यालयों के साथ ज्यादा जुड़ने का निर्देश सामने आया है। लगातार सामने आ रहे इन संदेशों से साफ है कि युवा वर्ग सरकार के एजेंडे में ऊपर आया है। लेकिन राजनीतिक सवाल यही है कि यह वास्तविक नीतिगत बदलाव की शुरुआत है या युवाओं के बीच सरकार की छवि को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश।
Gen Z के बाद Gen Alpha भी सवालों के साथ मैदान में
नई पीढ़ी का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि वह सवाल पूछने से डरती नहीं और अपने सवालों को दबने भी नहीं देती। Gen Z ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी आवाज बनाया है, तो अब Gen Alpha भी स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर सामने आती दिखाई दे रही है। महाराष्ट्र में अभिजीत दीपके के नेतृत्व में चल रहा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान हो या उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को लेकर सामने आ रही छात्र आवाजें—शिक्षा अब सिर्फ सरकारी घोषणाओं का विषय नहीं रह गई है। बच्चे और युवा स्कूल की वास्तविक स्थिति दिखा रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं और अपनी समस्याओं को सार्वजनिक बहस में ला रहे हैं। यही वह बदलाव है जिसे सरकार को समझना होगा कि नई पीढ़ी सिर्फ यह नहीं सुनना चाहती कि देश बदल रहा है, वह यह देखना चाहती है कि उसके स्कूल, कॉलेज, परीक्षा केंद्र और रोजगार के अवसर वास्तव में बदल रहे हैं या नहीं।
युवाओं को भाषण नहीं, भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए
सरकार अगर वास्तव में युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना चाहती है तो शुरुआत सिर्फ बैठकों और अभियानों से नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक समस्याओं के समाधान से करनी होगी। युवाओं को ऐसी प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था चाहिए जिस पर उन्हें भरोसा हो। उन्हें पेपर लीक और परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों पर तेज और निष्पक्ष कार्रवाई चाहिए। उन्हें ऐसे सरकारी स्कूल चाहिए जहां पढ़ाई के साथ बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध हों। उन्हें उच्च शिक्षा में बेहतर अवसर चाहिए और सबसे बढ़कर उन्हें रोजगार चाहिए। युवा अगर व्यवस्था की किसी कमी पर सवाल उठाता है तो उसे सिर्फ विरोध या राजनीतिक गतिविधि के रूप में देखने के बजाय यह समझना होगा कि वह सवाल पैदा क्यों हुआ। किसी भी सरकार के लिए इससे बड़ा फीडबैक सिस्टम नहीं हो सकता कि देश की युवा पीढ़ी खुद बता रही हो कि उसे व्यवस्था में क्या खराब नजर आ रहा है।
क्या यूथ कनेक्ट असली बदलाव है या नैरेटिव मैनेजमेंट?
यहीं से सरकार के नए यूथ फोकस पर सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल उठता है। सरकार के आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि छात्रों, Gen Z और Gen Alpha से जुड़े मुद्दों पर दबाव बढ़ने के बीच अब सरकार यूथ कनेक्ट के जरिए अपना नैरेटिव बदलना चाहती है। यानी सवाल परीक्षा व्यवस्था, स्कूल, रोजगार और अवसरों का है, लेकिन चर्चा अब युवाओं से संवाद की हो रही है। यह आरोप कितना सही है, इसका फैसला आने वाले दिनों में सरकार के काम से होगा। अगर युवाओं के साथ संवाद के बाद परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बढ़ता है, स्कूलों की हालत सुधरती है, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और छात्रों की शिकायतों पर कार्रवाई होती है, तो इसे वास्तविक बदलाव माना जाएगा। लेकिन अगर घोषणाएं और संवाद जारी रहे और जमीन पर वही पुराने सवाल खड़े रहें, तो विपक्ष और आलोचकों को इसे महज नैरेटिव मैनेजमेंट कहने का मौका मिलता रहेगा।
सरकार के लिए असली परीक्षा अब शुरू
प्रधानमंत्री ने अधिकारियों से युवाओं के साथ ज्यादा जुड़ने को कहा है। अब गेंद सरकार के पाले में है। युवाओं को बुलाकर उनकी बात सुनना आसान है, लेकिन उनकी मांगों पर फैसला लेना असली चुनौती है। Gen Z और Gen Alpha उस दौर की पीढ़ियां हैं जो सूचना के लिए सिर्फ सरकारी बयानों पर निर्भर नहीं हैं। वे सरकारी दावों की तुलना जमीन की तस्वीरों, अपने अनुभवों और सोशल मीडिया पर सामने आ रही जानकारी से करती हैं। इसलिए सरकार के लिए पुराना प्रचार मॉडल अब उतना प्रभावी नहीं हो सकता। नई पीढ़ी सवाल पूछेगी, जवाब मांगेगी और जवाब को अपने अनुभव से परखेगी।
भरोसा हेडलाइन से नहीं, जमीन पर काम से बनेगा
प्रधानमंत्री का युवाओं से ज्यादा जुड़ने का निर्देश अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि अगर इसे ईमानदारी से लागू किया जाए तो यह नीति निर्माण के लिए उपयोगी कदम हो सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होगी जब ‘यूथ कनेक्ट’ सिर्फ एक नया राजनीतिक नैरेटिव बनकर रह जाए। आज के युवा को यह नहीं बताया जा सकता कि उसकी समस्या हल हो गई क्योंकि उसके लिए एक नई घोषणा कर दी गई है। उसे परिणाम चाहिए। उसे भरोसेमंद परीक्षा चाहिए, बेहतर स्कूल चाहिए, रोजगार चाहिए, अवसर चाहिए और अपनी आवाज की सुनवाई चाहिए। Gen Z और Gen Alpha को सिर्फ संबोधित करके नहीं जीता जा सकता। उनके सवालों का जवाब देना होगा और वह जवाब भाषणों में नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव में देना होगा।



