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WATCH VIDEO — राहुल गांधी की बात फिर हुई सही साबित! ‘मोदी चालीसा’ पर विवाद, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कार्यक्रम से किया किनारा

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026

राहुल गांधी ने जिस ‘अंधभक्ति’ की बात कही थी, क्या उसकी तस्वीर सामने आ गई?

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया से सामने आया एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के सामने आरती करते और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में ‘जय-जय मोदी’ और ‘हर-हर मोदी’ जैसे नारे भी सुनाई दे रहे हैं। अब इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उस टिप्पणी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने मॉनसून सत्र के दौरान ‘अंधभक्ति’ पर तीखी टिप्पणी की थी। उस वक्त राहुल गांधी के बयान पर राजनीतिक बवाल मचा था, लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या प्रेस क्लब में सामने आई ये तस्वीरें उसी बात को सही साबित करती दिखाई दे रही हैं? खास बात यह है कि विवाद बढ़ने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इस कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया और कहा कि हॉल का इस्तेमाल तय शर्तों के उल्लंघन के कारण रुकवाया गया।

प्रेस क्लब में क्या हुआ?

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के सामने कुछ लोगों को आरती करते और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते देखा जा सकता है। वीडियो में प्रधानमंत्री के समर्थन में नारे भी सुनाई दे रहे हैं। तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यह सवाल उठने लगा कि क्या प्रेस क्लब जैसे पत्रकारिता से जुड़े संस्थान के परिसर में किसी राजनीतिक नेता की पूजा या आरती की जा सकती है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया सिर्फ एक इमारत या कार्यक्रम स्थल नहीं है। यह देश के पत्रकारों और पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़ा एक प्रमुख संस्थान है। ऐसे स्थान पर राजनीतिक व्यक्ति की तस्वीर के सामने धार्मिक अनुष्ठान जैसा दृश्य सामने आना स्वाभाविक रूप से बहस पैदा करता है।

प्रेस क्लब ने साफ किया—कार्यक्रम हमारा नहीं था

विवाद बढ़ने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। क्लब ने कहा कि इस कार्यक्रम का आयोजन उसने नहीं किया था। उसके मुताबिक एक संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए क्लब का हॉल किराये पर लिया था। लेकिन हॉल के इस्तेमाल से जुड़ी तय शर्तों का उल्लंघन किए जाने के बाद क्लब के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और कार्यक्रम को रुकवा दिया।

इस तरह प्रेस क्लब ने साफ कर दिया कि वायरल वीडियो में दिखाई दे रही गतिविधियां उसकी ओर से आयोजित या अधिकृत कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थीं। यह स्पष्टीकरण इसलिए भी जरूरी था क्योंकि सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों के आधार पर यह धारणा बन सकती थी कि ‘मोदी चालीसा’ का आयोजन स्वयं प्रेस क्लब ने किया है।

लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता

प्रेस क्लब ने कार्यक्रम रोक दिया और खुद को उससे अलग भी कर लिया, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खत्म नहीं होता। सवाल यह है कि राजनीतिक समर्थन और व्यक्ति-पूजा के बीच की सीमा आखिर कहां है? किसी प्रधानमंत्री का समर्थन करना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। उनकी नीतियों की तारीफ करना, उनके पक्ष में नारे लगाना या उनके लिए राजनीतिक अभियान चलाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।

लेकिन जब किसी राजनीतिक नेता की तस्वीर के सामने आरती की जाए और उसके नाम पर ‘चालीसा’ का पाठ किया जाए, तो यह सामान्य राजनीतिक समर्थन से आगे की स्थिति दिखाई देती है। यहीं से व्यक्ति-पूजा और अंधभक्ति की बहस शुरू होती है।

राहुल गांधी की टिप्पणी फिर चर्चा में

इसी संदर्भ में राहुल गांधी की मॉनसून सत्र के दौरान की गई टिप्पणी फिर चर्चा में आ गई है। राहुल गांधी ने कहा था कि “अंधभक्त एक इडियट को अपना भगवान समझते हैं।” उस समय उनके बयान को लेकर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई थी। उनके विरोधियों ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान बताया और राहुल गांधी पर निशाना साधा।

लेकिन अब सोशल मीडिया पर सामने आए ‘मोदी चालीसा’ के वीडियो ने राहुल गांधी की उस टिप्पणी को एक नए राजनीतिक संदर्भ में ला दिया है। कांग्रेस के नजरिए से देखें तो पार्टी के पास यह कहने का आधार मिल गया है कि राहुल गांधी जिस ‘अंधभक्ति’ की बात कर रहे थे, उसका उदाहरण अब सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रहा है।

यानी राहुल गांधी के आलोचकों ने उनके बयान को भले ही उस समय खारिज किया हो, लेकिन प्रधानमंत्री की तस्वीर के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ का वीडियो यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या राजनीति में समर्थन की सीमा अब व्यक्ति-पूजा तक पहुंच रही है?

नेता लोकप्रिय हो सकता है, भगवान नहीं

लोकतंत्र में किसी नेता की लोकप्रियता पर सवाल नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करोड़ों समर्थक हैं और उन्हें अपने नेता के प्रति सम्मान और समर्थन व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेता और भगवान के बीच फर्क बनाए रखना भी जरूरी है।

प्रधानमंत्री देश के निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व का हिस्सा हैं। उनकी नीतियों की तारीफ भी हो सकती है और आलोचना भी। उनके फैसलों पर सवाल भी उठ सकते हैं और उनके समर्थन में आवाज भी उठ सकती है। यही लोकतंत्र है।

लेकिन अगर किसी नेता को राजनीतिक समर्थन से आगे बढ़ाकर धार्मिक प्रतीक के रूप में पेश किया जाने लगे, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति के समर्थन का मामला नहीं रह जाता। यह लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति को लेकर सवाल खड़ा करता है।

पत्रकारिता का मंच सत्ता से सवाल पूछने के लिए है

इस पूरे मामले में प्रेस क्लब की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता का मूल काम सत्ता से सवाल पूछना है। पत्रकार का काम किसी नेता की आरती करना नहीं, बल्कि उससे सवाल करना है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, पत्रकारिता को उसके सामने स्वतंत्र और निष्पक्ष रहना चाहिए।

इसीलिए प्रेस क्लब ने कार्यक्रम रोककर और उससे खुद को अलग करके यह स्पष्ट किया कि उसके परिसर का इस्तेमाल तय नियमों के अनुसार ही होना चाहिए। पत्रकारिता से जुड़े संस्थानों की विश्वसनीयता तभी कायम रहती है जब वे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से समान दूरी बनाए रखें।

आस्था का सम्मान, लेकिन राजनीति में सवाल भी जरूरी

किसी व्यक्ति की निजी आस्था का सम्मान होना चाहिए। किसी को प्रधानमंत्री पसंद हैं, कोई उनका समर्थक है और कोई उनका विरोधी—यह लोकतंत्र की स्वाभाविक तस्वीर है। लेकिन राजनीतिक समर्थन को धार्मिक आस्था का रूप देना एक अलग बहस पैदा करता है।

किसी नेता को पसंद करने के लिए उसे भगवान मानना जरूरी नहीं है। किसी नेता का समर्थन करने के लिए उसकी हर बात को सही मानना जरूरी नहीं है। और लोकतंत्र में किसी नेता से सवाल करना देश या नेता का विरोध करना नहीं होता।

राहुल गांधी की बात पर बहस अब और तेज

इस पूरे विवाद ने राहुल गांधी की उस टिप्पणी को फिर चर्चा में ला दिया है। राजनीतिक रूप से कांग्रेस इसे राहुल गांधी की बात के सही साबित होने के तौर पर देख सकती है। हालांकि, एक वायरल वीडियो में दिखाई देने वाले लोगों के व्यवहार को पूरे समर्थक वर्ग या हर बीजेपी समर्थक पर लागू करना भी उचित नहीं होगा।

फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है—क्या लोकतंत्र में राजनीतिक समर्थन धीरे-धीरे व्यक्ति-पूजा में बदल रहा है? क्या किसी नेता की लोकप्रियता का मतलब यह है कि उसके प्रति सवाल पूछने की गुंजाइश खत्म हो जाए? और क्या पत्रकारिता के संस्थानों को ऐसे आयोजनों से और अधिक सावधानी बरतने की जरूरत नहीं है?

लोकतंत्र में नेता जनता का प्रतिनिधि है

‘मोदी चालीसा’ का कार्यक्रम रुक गया। प्रेस क्लब ने उससे किनारा कर लिया। लेकिन इस घटना ने एक बड़ी बहस जरूर शुरू कर दी है। लोकतंत्र में नेता की लोकप्रियता स्वीकार्य है, राजनीतिक समर्थन स्वीकार्य है, आलोचना भी स्वीकार्य है। लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत व्यक्ति-पूजा में नहीं, जवाबदेही में है।

और शायद यही वजह है कि राहुल गांधी की पुरानी टिप्पणी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। राहुल गांधी ने ‘अंधभक्ति’ पर सवाल उठाया था। अब प्रेस क्लब में सामने आए ‘मोदी चालीसा’ के वीडियो ने उस सवाल को फिर सामने ला दिया है।क्योंकि लोकतंत्र में नेता भगवान नहीं होता। नेता जनता का प्रतिनिधि होता है—और जनता के प्रति जवाबदेह होता है।

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