[the_ad id="179"]
Home » Opinion » आरएसएस ने खुद ही राम मंदिर आंदोलन खत्म कर दिया

आरएसएस ने खुद ही राम मंदिर आंदोलन खत्म कर दिया

ओपिनियन | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली, 30 जून 2026

सुप्रीम कोर्ट के बेतुके फैसले से बना था राम मंदिर

चंदा और चढ़ावे की चोरी के मामले में दर्ज FIR तथा राम मंदिर ट्रस्ट के कर्ताधर्ता चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्र के इस्तीफों के बाद मंदिर के चढ़ावे में 90 प्रतिशत की भारी कमी आ गई है। रोजाना दर्शन करने वालों की संख्या भी लगभग आधी रह गई है। क्या यह काम कोई और कर सकता था, जो आरएसएस ने कर दिखाया?

राम मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह बाबरी मस्जिद को गिराकर सुप्रीम कोर्ट के एक बेतुके फैसले के सहारे बना।

तीस साल से अधिक समय तक राम मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति को पूरी तरह प्रभावित किया। इस दौरान एक लंबा, हिंसक और नफरत भरा दौर चला। इसी आंदोलन के बूते भाजपा 1989 के लोकसभा चुनाव में महज दो सांसदों से 85 सीटों तक पहुंची और फिर लगातार चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू हुआ। उत्तर भारत में चुनाव अब जन मुद्दों के बजाय ध्रुवीकरण पर केंद्रित होने लगे।

विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक यह समझ ही नहीं आया कि राम मंदिर के घोड़े पर सवार भाजपा को कैसे रोका जाए। उत्तर प्रदेश और बिहार से कांग्रेस का सफाया हो गया। विपक्षी नेता खुद को भाजपा से भी बड़ा हिंदू साबित करने की होड़ में जुट गए।

पिछले कुछ वर्षों से निरंतर प्रयासरत राहुल गांधी अंततः संविधान और सामाजिक न्याय के आधार पर इस नफरत की राजनीति की काट निकालने में सफल हुए। हालांकि साम्प्रदायिकता की राजनीति की चुनौती अभी भी बरकरार है, लेकिन नई पीढ़ी इसे तेजी से रिजेक्ट कर रही है। इस पूरे खेल की पोल खोलने में स्वतंत्र पत्रकारों, लेखकों, राजनीतिक विश्लेषकों, यूट्यूबर्स, कवियों, लोकगायकों और समाजसेवकों का भी अहम योगदान रहा है।

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय मोदी और मोहन भागवत सेंटरस्टेज पर थे, जबकि शंकराचार्यों ने इसका बहिष्कार किया था। साधु-संतों की उपेक्षा हुई। उसी समय साफ हो गया था कि यह आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पैसा उगाही और रियल एस्टेट के धंधे का जरिया बनने वाला है। समय ने वैसा ही साबित किया। राम मंदिर एक इंडस्ट्री बन गया। अरबों रुपये की हेराफेरी का धंधा शुरू हो गया।

गुजराती व्यापारी बड़ी संख्या में पहुंच गए। बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद-फरोख्त हुई। सस्ती जमीन खरीदकर महंगे दामों पर बेचने का खेल शुरू हुआ। जो कुछ वहां हो रहा था, उसका आस्था या आध्यात्म से कोई लेना-देना नहीं था। आरएसएस में नैतिक बल की हमेशा से कमी रही है और वह कमी अयोध्या में भी साफ दिखी।

राम मंदिर में आखिर वही हुआ जिसके लिए इसे बनाया गया था। इस पूरे प्रकरण में तीन दशक लंबा राजनीतिक आंदोलन अब समाप्त हो चुका है। अब राजनीति असल मुद्दों की तरफ लौटेगी। भाजपा चाहे भी तो इस डैमेज को रिपेयर नहीं कर सकती। आरएसएस और भाजपा एक बड़े राजनीतिक वनवास की ओर बढ़ती दिख रही हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *