राष्ट्रीय/ उत्तर प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ लखनऊ | 30 जून 2026
अयोध्या राम मंदिर में दान के कथित गबन मामले का असर अब केवल कानूनी जांच तक सीमित नहीं रहा है। इस विवाद ने विश्व हिंदू परिषद (VHP) के लंबे समय से चल रहे ‘मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने’ के अभियान पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, संघ परिवार के भीतर भी इस बात को लेकर चिंता बढ़ गई है कि इस विवाद से मंदिर प्रबंधन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंच सकता है।
विश्व हिंदू परिषद कई वर्षों से यह मांग करती रही है कि देशभर के हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकार के बजाय हिंदू समाज के हाथों में होना चाहिए। वर्ष 2021 में फरीदाबाद में हुई न्यासी मंडल की बैठक में संगठन ने केंद्र सरकार से ऐसा कानून बनाने का प्रस्ताव भी पारित किया था, जिसके तहत मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जा सके।
हालांकि, राम मंदिर में दान के कथित गबन का मामला सामने आने के बाद इस अभियान को झटका लगा है। संघ परिवार से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि यदि देश के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक में वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो दूसरे मंदिरों के प्रबंधन को लेकर भी लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
VHP के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि फिलहाल ऐसा लगता है कि मंदिर मुक्ति अभियान की गति धीमी पड़ सकती है। हालांकि संगठन का आधिकारिक रुख है कि इस विवाद से उसके अभियान पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह अपनी रणनीति के अनुसार आगे बढ़ेगा।
VHP अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि संगठन का मनोबल बरकरार है। उन्होंने बताया कि कई राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों से इस मुद्दे पर बातचीत हो चुकी है और 19-20 जुलाई को दिल्ली में होने वाली न्यासी मंडल की बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी।
संघ से जुड़े कुछ वरिष्ठ प्रचारकों ने भी माना है कि राम मंदिर जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल में कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने संगठन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। उनका कहना है कि यदि मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठेंगे, तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की मांग को जनता के बीच उतना समर्थन मिलना कठिन हो सकता है।
हालांकि कुछ पदाधिकारियों का तर्क है कि सरकारी नियंत्रण वाले कई मंदिरों में भी समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए केवल इस एक मामले के आधार पर पूरे अभियान का मूल्यांकन उचित नहीं होगा।
इस बीच संगठन से जुड़े नेताओं का मानना है कि जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच जरूरी है। उनका कहना है कि एफआईआर की जांच तेजी से पूरी होनी चाहिए और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उनका विश्वास है कि पारदर्शी कार्रवाई से लोगों का भरोसा फिर से मजबूत किया जा सकता है।
गौरतलब है कि देश में लगभग 10 लाख मंदिर होने का अनुमान है। इनमें अधिकांश छोटे और स्थानीय स्तर पर संचालित हैं, जबकि कई बड़े मंदिर विभिन्न राज्यों के कानूनों के तहत सरकारी नियंत्रण में हैं। ऐसे में अयोध्या राम मंदिर से जुड़ा यह विवाद केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि मंदिर प्रबंधन और उसकी व्यवस्था पर चल रही राष्ट्रीय बहस को भी नई दिशा दे सकता है।




