नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 15 अगस्त 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रजिस्ट्रार की नियुक्ति को लेकर विवाद अब गंभीर कानूनी सवालों के बीच पहुंच गया है। सामने आई पुलिस शिकायत की कॉपी में मौजूदा रजिस्ट्रार डॉ. महताब आलम रिजवी की नियुक्ति से लेकर उनके एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पद तक पहुंचने की प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। 17 जुलाई 2026 को थाना जामिया नगर के SHO को दी गई शिकायत में FIR दर्ज करने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता भूपेंद्र पाल सिंह चमार, जो स्वयं को वर्ल्ड दलित काउंसिल (विश्व दलित परिषद) का इंटरनेशनल प्रेसिडेंट और जामिया मिल्लिया इस्लामिया का पूर्व छात्र बताते हैं, ने आरोप लगाया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में योग्यता और अनुभव से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को कथित तौर पर छिपाया गया, गलत जानकारी प्रस्तुत की गई तथा आधिकारिक रिकॉर्ड के साथ कथित हेरफेर किया गया। शिकायत में केवल नियुक्ति तक मामला सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि आरोप लगाया गया है कि यदि शुरुआती नियुक्ति ही गलत तथ्यों या तथ्यों को छिपाकर हासिल की गई थी तो उसके आधार पर हुई पदोन्नति और बाद में रजिस्ट्रार की नियुक्ति की वैधता की भी जांच जरूरी है।
पुलिस को दी गई शिकायत का शीर्षक ही पूरे मामले की गंभीरता को सामने रखता है। इसमें cheating, forgery, use of forged documents, falsification of records, criminal conspiracy और abuse of official position जैसे आरोपों के संबंध में FIR दर्ज करने का अनुरोध किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उपलब्ध दस्तावेज पुलिस में दी गई शिकायत और FIR दर्ज करने की मांग को दर्शाता है; इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध हो चुके हैं या FIR वास्तव में दर्ज हो चुकी है। आरोपों की सत्यता जांच का विषय है। लेकिन शिकायत में जिन दस्तावेजों, नियुक्ति प्रक्रियाओं और संस्थागत समितियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है, वे इसे महज व्यक्तिगत सेवा-विवाद से कहीं बड़ा मामला बना देते हैं।
शिकायत में सबसे महत्वपूर्ण आरोप एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में डॉ. रिजवी की प्रारंभिक नियुक्ति की पात्रता को लेकर है। शिकायतकर्ता का दावा है कि RTI से प्राप्त दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह सवाल उठता है कि क्या उस समय निर्धारित UGC नियमों के अनुसार आवश्यक अनिवार्य योग्यता और अनुभव वास्तव में पूरा किया गया था। शिकायत में विशेष रूप से UGC Regulations, 2010 का हवाला देते हुए कहा गया है कि जिस पद पर नियुक्ति हुई, उसके लिए आवश्यक पात्रता की जांच की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses (MP-IDSA) में बताए गए अनुभव को लेकर सवाल हैं और यह जांचना जरूरी है कि वह अनुभव UGC के अनुसार Assistant Professor के समकक्ष आवश्यक teaching/research experience माना जा सकता था या नहीं।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। शिकायत में इथियोपिया की State Civil Services University में बताए गए अनुभव को लेकर भी गंभीर विसंगतियों का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर इस अनुभव की अवधि, निरंतरता और उसे निर्धारित पात्रता में गिने जाने की वैधानिक स्थिति पर सवाल उठाए हैं। यानी विवाद केवल डिग्री या एक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जांच का विषय बनाया गया है कि उम्मीदवार द्वारा प्रस्तुत पूरा अनुभव रिकॉर्ड किस तरह सत्यापित किया गया और चयन प्रक्रिया में उसे किस आधार पर स्वीकार किया गया।
सबसे सनसनीखेज आरोपों में से एक जामिया की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध Curriculum Vitae के अलग-अलग संस्करणों में कथित अंतर से जुड़ा है। शिकायत में दावा किया गया है कि वेबसाइट पर उपलब्ध CV के विभिन्न संस्करणों में योग्यता, अनुभव और सेवा संबंधी विवरणों में महत्वपूर्ण विसंगतियां दिखाई देती हैं। शिकायतकर्ता ने इन अंतर को केवल मामूली प्रशासनिक गलती नहीं मानते हुए आरोप लगाया है कि इनकी जांच इस दृष्टि से की जानी चाहिए कि कहीं नियुक्ति हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाया, बदला या अलग तरीके से प्रस्तुत तो नहीं किया गया। यदि किसी स्वतंत्र जांच में ऐसे रिकॉर्ड में जानबूझकर बदलाव या तथ्य छिपाने की पुष्टि होती है, तो यह मामला निश्चित तौर पर गंभीर प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न खड़े कर सकता है।
एक नियुक्ति से रजिस्ट्रार की कुर्सी तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में
शिकायत में एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि डॉ. रिजवी की प्रारंभिक नियुक्ति के बाद उन्हें Career Advancement Scheme के तहत प्रोफेसर के रूप में पदोन्नत किए जाने और फिर रजिस्ट्रार नियुक्त किए जाने की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता का तर्क है कि यदि शुरुआती नियुक्ति की बुनियाद ही गलत जानकारी, तथ्यों के कथित दमन या गलत दस्तावेजों पर आधारित पाई जाती है तो उसके बाद हुई पदोन्नतियों और नियुक्तियों की भी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए। यहां मामला इसलिए भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि रजिस्ट्रार का पद किसी सामान्य प्रशासनिक पद की तरह नहीं है। यह विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण वैधानिक पद है, जिसके साथ व्यापक प्रशासनिक, वित्तीय और नियामकीय जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं।
शिकायतकर्ता ने केवल डॉ. रिजवी की भूमिका की जांच की मांग नहीं की है, बल्कि Screening Committee, Selection Committee, Executive Council और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है। शिकायत में सवाल उठाया गया है कि यदि उम्मीदवार की योग्यता या अनुभव को लेकर कोई विसंगति थी, तो चयन प्रक्रिया के दौरान उसका सत्यापन कैसे हुआ? किन अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की? किस आधार पर नियुक्ति की सिफारिश हुई? और यदि दस्तावेजों में वास्तव में कोई गंभीर अंतर था तो वह चयन प्रक्रिया से गुजरते समय सामने क्यों नहीं आया? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
शिकायत में रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और फोरेंसिक जांच की भी मांग
पुलिस शिकायत में एक अहम चिंता रिकॉर्ड के संरक्षण को लेकर भी जताई गई है। शिकायतकर्ता ने कहा है कि मामले से जुड़े मूल आवेदन पत्र, अनुभव प्रमाणपत्र, नियुक्ति रिकॉर्ड, चयन समिति की कार्यवाही, कार्यकारी परिषद की कार्यवाही, सर्विस बुक, डिजिटल रिकॉर्ड, वेबसाइट आर्काइव और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। शिकायत में आशंका व्यक्त की गई है कि जांच में देरी होने पर इलेक्ट्रॉनिक या आधिकारिक रिकॉर्ड के नष्ट, बदले या छेड़छाड़ किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए शिकायतकर्ता ने दस्तावेजों को सुरक्षित रखने, उन्हें बरामद करने और आवश्यकता पड़ने पर फोरेंसिक जांच कराने की मांग की है।
यही बिंदु पूरे मामले को और संवेदनशील बनाता है। अगर विवाद केवल किसी कर्मचारी की सेवा-शर्तों या पदोन्नति तक सीमित होता तो मामला विभागीय जांच तक रह सकता था। लेकिन पुलिस शिकायत में criminal conspiracy, forgery, cheating, false information और official position के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसलिए अब सवाल यह है कि जामिया नगर पुलिस इस शिकायत पर क्या कार्रवाई करती है और क्या वह लगाए गए आरोपों की प्रारंभिक जांच के बाद FIR दर्ज करने की दिशा में आगे बढ़ती है।
SFI-JMI भी मैदान में, तत्काल स्वतंत्र जांच की मांग
इसी विवाद के बीच Students’ Federation of India (SFI), Jamia Millia Islamia Unit Committee ने 14 अगस्त 2026 को एक बयान जारी कर जामिया के रजिस्ट्रार की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं की तत्काल जांच की मांग की है। SFI-JMI ने कहा है कि नियुक्ति को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं और इनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। संगठन ने Screening Committee, Selection Committee और Executive Council जैसी संस्थागत इकाइयों की भूमिका की भी जांच की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
SFI के बयान में जामिया प्रशासन पर छात्रों की आवाज दबाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई के इस्तेमाल के राजनीतिक आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि ये SFI के राजनीतिक आरोप और संगठन की राय हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इसी तरह SFI ने केंद्र सरकार और RSS को लेकर भी राजनीतिक टिप्पणी की है, लेकिन यह उसके बयान का राजनीतिक पक्ष है और पुलिस शिकायत में लगाए गए नियुक्ति संबंधी आरोपों से अलग विषय है।
अब सबसे बड़ा सवाल: नियुक्ति प्रक्रिया में किसने क्या जांचा?
इस पूरे मामले का केंद्र अब एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता बनती जा रही है। अगर शिकायत में लगाए गए आरोप गलत हैं तो निष्पक्ष जांच के जरिए उन्हें खारिज किया जा सकता है। लेकिन अगर दस्तावेजों की जांच में योग्यता, अनुभव, CV, चयन प्रक्रिया या आधिकारिक रिकॉर्ड को लेकर वास्तविक अनियमितता सामने आती है, तो यह सवाल केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। तब यह पूछा जाएगा कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण वैधानिक पद तक पहुंचने वाली पूरी प्रक्रिया में निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था कहां कमजोर पड़ी।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया संसद के अधिनियम से स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालय है और सार्वजनिक धन से संचालित होने वाली ऐसी संस्था में नियुक्तियों की पारदर्शिता का महत्व और बढ़ जाता है। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को जांच से पहले दोष सिद्ध मानना उचित नहीं होगा, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि गंभीर आरोप सामने आने पर उन्हें केवल राजनीतिक बयान या छात्र संगठन के आरोप कहकर नजरअंदाज न किया जाए। दस्तावेज सामने हैं, पुलिस शिकायत सामने है और शिकायत में जांचे जाने वाले रिकॉर्ड और संस्थागत प्रक्रियाओं का स्पष्ट उल्लेख है। अब जवाब जांच से आना चाहिए।
पुलिस शिकायत में डॉ. एम.डी. महताब आलम रिजवी की योग्यता, अनुभव, CV के अलग-अलग संस्करणों, एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति, प्रोफेसर पद पर पदोन्नति और अंततः रजिस्ट्रार नियुक्ति तक की प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने FIR और आपराधिक जांच की मांग की है, जबकि SFI-JMI ने भी स्वतंत्र जांच की मांग उठाई है। ऐसे में सबसे उचित रास्ता यही है कि मूल दस्तावेज सुरक्षित किए जाएं, नियुक्ति से जुड़े सभी रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच हो, संबंधित चयन समितियों की भूमिका की जांच हो और आरोप सही पाए जाने या गलत साबित होने—दोनों ही स्थितियों में तथ्य सार्वजनिक किए जाएं।
क्योंकि सवाल सिर्फ रजिस्ट्रार की कुर्सी का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में नियुक्ति से लेकर सर्वोच्च प्रशासनिक पद तक किसी व्यक्ति की योग्यता और दस्तावेजों को सत्यापित करती है।




