राष्ट्रीय | निपुणिका शाहिद, असिस्टेंट प्रोफेसर, साउथ एशिया यूनिवर्सिटी| ABC NATIONAL NEWS | 15 अगस्त 2026
15 अगस्त 1947 केवल भारत की स्वतंत्रता का दिन नहीं था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के पुनर्निर्माण की शुरुआत थी, जिसने सदियों की गुलामी, विभाजन की त्रासदी, गरीबी और संसाधनों की कमी के बीच अपना भविष्य गढ़ने का संकल्प लिया। आजादी के समय भारत के सामने एक साथ कई मोर्चे थे—विस्थापितों का पुनर्वास, खाद्यान्न की कमी, बेहद कमजोर औद्योगिक आधार, अशिक्षा, गरीबी और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव। फिर भी भारत ने लोकतंत्र को चुना और विकास का रास्ता अपनाया। पिछले 80 वर्षों की कहानी किसी एक सरकार या एक प्रधानमंत्री की कहानी नहीं है, बल्कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग नेतृत्व द्वारा रखी गई उन ईंटों की कहानी है, जिनसे आज का भारत खड़ा हुआ है।
नेहरू: संस्थाओं और आधुनिक भारत की नींव
स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—एक नए राष्ट्र को मजबूत संस्थाओं के आधार पर खड़ा करना। उनके दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के साथ-साथ बड़े सार्वजनिक उपक्रमों, बांधों, इस्पात संयंत्रों, वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों और उच्च शिक्षा के केंद्रों की स्थापना पर जोर दिया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और वैज्ञानिक अनुसंधान की संस्थागत नींव ने आगे चलकर भारत की तकनीकी क्षमता को मजबूत किया। भाखड़ा-नांगल जैसे बड़े बांध उस दौर में आधुनिक भारत के विकास और सिंचाई-विद्युतीकरण के प्रतीक बने।
नेहरू की आर्थिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र और नियोजित विकास की बड़ी भूमिका थी। इस मॉडल की अपनी सीमाएं थीं और समय के साथ इसमें बदलाव की आवश्यकता भी सामने आई, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उस दौर में भारत ने भारी उद्योग, विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा जैसी उन बुनियादी क्षमताओं को विकसित करना शुरू किया, जिनका लाभ बाद की पीढ़ियों को मिला।
शास्त्री: आत्मनिर्भरता और किसान-सैनिक का विश्वास
लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उनका संदेश देश के मन में गहराई से बैठ गया—“जय जवान, जय किसान।” 1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौर में उन्होंने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। कृषि उत्पादन बढ़ाने की जरूरत और किसानों की भूमिका को राष्ट्रीय प्राथमिकता से जोड़ने का उनका दृष्टिकोण आगे चलकर हरित क्रांति के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण रहा।
इंदिरा गांधी: खाद्य सुरक्षा से लेकर बड़े राष्ट्रीय फैसलों तक
इंदिरा गांधी के दौर में भारत ने कई निर्णायक मोड़ देखे। हरित क्रांति ने गेहूं और चावल के उत्पादन में बड़ा बदलाव लाया और भारत को खाद्यान्न के मामले में अधिक आत्मनिर्भर बनाया। बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने बैंकिंग को बड़े पैमाने पर आम लोगों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण ने भारत की सामरिक क्षमता और क्षेत्रीय भूमिका को भी नई पहचान दी।
इंदिरा गांधी के दौर की उपलब्धियों के साथ-साथ आपातकाल जैसे लोकतांत्रिक इतिहास के विवादास्पद अध्याय भी जुड़े हैं। इसलिए उनके कार्यकाल का मूल्यांकन करते समय उपलब्धियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़े दबाव—दोनों को साथ देखना आवश्यक है। यही इतिहास की निष्पक्ष समझ है।
राजीव गांधी: कंप्यूटर और संचार क्रांति की शुरुआत
राजीव गांधी ने भारत के भविष्य को तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया। कंप्यूटर, दूरसंचार और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने की उनकी कोशिशों ने आने वाले दशकों की डिजिटल क्रांति की जमीन तैयार की। उन्होंने प्रशासन और अर्थव्यवस्था में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की आवश्यकता को समझा। ग्रामीण क्षेत्रों तक दूरसंचार पहुंचाने और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों ने भारत को धीरे-धीरे उस डिजिटल युग की ओर धकेला, जिसका व्यापक रूप आज दिखाई देता है।
वी.पी. सिंह से नरसिंह राव तक: सामाजिक बदलाव और आर्थिक मोड़
वी.पी. सिंह के दौर में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला भारतीय राजनीति और सामाजिक संरचना में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया। सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की बहस ने नई दिशा पकड़ी, हालांकि इसके साथ तीखा सामाजिक और राजनीतिक विवाद भी हुआ।
इसके बाद पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में भारत ने आर्थिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ देखा। 1991 के आर्थिक संकट के बीच वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर राव सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़े आर्थिक सुधार शुरू किए। लाइसेंस-परमिट आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अपने दरवाजे खोले। विदेशी निवेश, निजी उद्योग और प्रतिस्पर्धा के लिए वातावरण बदला और आने वाले दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता तेजी से बढ़ी।
अटल बिहारी वाजपेयी: सड़क, संचार और रणनीतिक आत्मविश्वास
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने बुनियादी ढांचे और तकनीक पर विशेष ध्यान दिया। स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी परियोजनाओं ने देश के प्रमुख आर्थिक केंद्रों को बेहतर सड़क संपर्क से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। दूरसंचार क्षेत्र में बदलाव और निजी भागीदारी ने मोबाइल संचार के विस्तार को गति दी।
1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों ने भारत की रणनीतिक क्षमता को दुनिया के सामने मजबूती से रखा। इसके बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की सफलता ने भी देश के आत्मविश्वास को मजबूत किया।
मनमोहन सिंह: तेज आर्थिक विकास और अधिकार आधारित नीतियां
डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था ने लंबे समय तक तेज विकास दर का अनुभव किया। सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारतीय कंपनियों की भूमिका तेजी से बढ़ी। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने भारत के वैश्विक रणनीतिक और ऊर्जा संबंधों को नई दिशा दी।
इसी दौर में मनरेगा, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और आधार जैसी पहलों ने शासन, सामाजिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की बहस को प्रभावित किया। ग्रामीण रोजगार और पारदर्शिता से जुड़ी इन नीतियों ने करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच को नए तरीके से परिभाषित किया। हालांकि इसी दौर में भ्रष्टाचार के आरोपों और नीतिगत निर्णयों को लेकर गंभीर राजनीतिक विवाद भी सामने आए।
मोदी दौर: डिजिटल भारत, बुनियादी ढांचा और आत्मनिर्भरता
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से अधिक समय में विकास की प्राथमिकताओं में डिजिटल तकनीक, बुनियादी ढांचा, वित्तीय समावेशन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिखाई देता है। जन धन योजना ने बड़ी संख्या में लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया, जबकि आधार और मोबाइल के साथ डिजिटल भुगतान तथा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने सरकारी सेवाओं की पहुंच और भुगतान प्रणाली को बदलने में भूमिका निभाई।
स्वच्छ भारत मिशन ने स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया। उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों की महिलाओं तक एलपीजी कनेक्शन पहुंचाने का लक्ष्य रखा। आयुष्मान भारत ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ाने का प्रयास किया। सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डों और एक्सप्रेसवे जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश ने कनेक्टिविटी को विकास की केंद्रीय प्राथमिकता बनाया।
डिजिटल क्षेत्र में भारत की कहानी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। UPI और डिजिटल भुगतान ने रोजमर्रा के आर्थिक लेन-देन को बदल दिया। भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अपने मॉडल को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया और तकनीक को केवल बड़े शहरों की सुविधा न रखकर आम नागरिक के जीवन से जोड़ने की कोशिश की।
आत्मनिर्भर भारत और नई औद्योगिक महत्वाकांक्षा
मोदी सरकार के दौर में मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं और रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण पर जोर बढ़ा। मोबाइल फोन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्रोन, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष और रक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए अवसर खोलना और चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग जैसी उपलब्धियों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को वैश्विक मंच पर मजबूत किया।
लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की क्षमता और हिस्सेदारी बढ़ाना होना चाहिए। भारत के सामने अब यही बड़ी चुनौती है कि वह रोजगार पैदा करने वाला मजबूत विनिर्माण क्षेत्र बनाए, युवाओं के कौशल को उद्योग की जरूरतों से जोड़े और आर्थिक विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाए।
विकास की असली कसौटी: अंतिम व्यक्ति का जीवन
आठ दशकों की इस यात्रा को केवल GDP, बड़े बांधों, एक्सप्रेसवे, परमाणु शक्ति या डिजिटल भुगतान से नहीं मापा जा सकता। भारत की खुशहाली की असली कसौटी वह गांव है जहां बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलती है, वह परिवार है जिसे समय पर स्वास्थ्य सुविधा मिलती है, वह किसान है जिसे अपनी उपज का उचित मूल्य मिलता है, वह महिला है जिसे सुरक्षित वातावरण और आर्थिक अवसर मिलता है और वह युवा है जिसे अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार या उद्यम का अवसर मिलता है।
भारत ने गरीबी कम करने, बिजली और बैंकिंग की पहुंच बढ़ाने, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी विस्तार, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक योजनाओं के क्षेत्र में लंबा सफर तय किया है। लेकिन बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता, प्रदूषण, शहरी भीड़, कृषि संकट और क्षेत्रीय असमानता जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। विकसित भारत की चर्चा तभी सार्थक होगी जब इन सवालों का समाधान भी विकास के केंद्र में रखा जाए।
आठ प्रधानमंत्रियों की विरासत, एक भारत की कहानी
नेहरू ने संस्थागत और औद्योगिक नींव मजबूत करने की कोशिश की, शास्त्री ने आत्मनिर्भरता और किसान-जवान के विश्वास को स्वर दिया, इंदिरा गांधी के दौर में हरित क्रांति और बैंकिंग विस्तार ने देश को नई दिशा दी, राजीव गांधी ने तकनीकी और संचार क्रांति का द्वार खोला, नरसिंह राव ने आर्थिक सुधारों की नींव रखी, वाजपेयी ने बुनियादी ढांचे और रणनीतिक आत्मविश्वास को आगे बढ़ाया, मनमोहन सिंह के दौर में तेज आर्थिक विकास और अधिकार आधारित कल्याणकारी नीतियों ने आकार लिया और नरेंद्र मोदी के दौर में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, बुनियादी ढांचे, आत्मनिर्भरता और वैश्विक महत्वाकांक्षा पर जोर बढ़ा।
इनमें से किसी एक दौर को भारत की पूरी विकास यात्रा मानना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। आज का भारत उन सभी दौरों की उपलब्धियों, प्रयोगों, सफलताओं, कमियों और उनसे मिली सीख का परिणाम है। राष्ट्र निर्माण किसी एक सरकार का प्रोजेक्ट नहीं होता; यह पीढ़ियों का साझा प्रयास होता है।
2047 की ओर: अब लक्ष्य सिर्फ विकास नहीं, गुणवत्तापूर्ण विकास
आजादी के 80वें वर्ष में भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक रूप से बड़ा देश बनने का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। यह ऐसा भारत बनाने का संकल्प होना चाहिए जहां आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक न्याय हो, आधुनिक तकनीक के साथ मानवीय संवेदना हो, तेज विकास के साथ पर्यावरण की चिंता हो और वैश्विक नेतृत्व के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती भी बनी रहे।
आज के बच्चे ही 2047 के भारत के निर्माता होंगे। वे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, सैनिक, शिक्षक, उद्यमी, किसान, कलाकार और नीति-निर्माता बनेंगे। इसलिए विकसित भारत की सबसे बड़ी पूंजी केवल पूंजीगत निवेश या तकनीक नहीं, बल्कि शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और जिम्मेदार नागरिक होंगे।
80 वर्षों का भारत हमें एक महत्वपूर्ण सबक देता है—देश की दिशा बदलने के लिए बड़े सपने जरूरी हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने के लिए मजबूत संस्थाएं, मेहनत, ईमानदार नीति और निरंतरता उससे भी ज्यादा जरूरी है। गुलामी से आजादी, अभाव से आत्मनिर्भरता, बंद अर्थव्यवस्था से वैश्विक सहभागिता और अब डिजिटल तथा तकनीकी शक्ति तक भारत की यात्रा असाधारण रही है।
तिरंगे के नीचे खड़ा आज का भारत इसलिए केवल अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने वाला भारत नहीं है; वह अपनी अगली मंजिल को पहचान चुका भारत है। आजादी हमें 1947 में मिली थी, लेकिन एक खुशहाल, समृद्ध, न्यायपूर्ण और विकसित भारत बनाने की आजादी और जिम्मेदारी—दोनों हमारे हाथ में हैं। यही स्वतंत्र भारत की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि भी है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।




