Home » Entertainment » हिंदी सिनेमा की पहली नायिका से आज की अभिनेत्री तक: घूंघट से ग्लोबल मंच तक का सफर

हिंदी सिनेमा की पहली नायिका से आज की अभिनेत्री तक: घूंघट से ग्लोबल मंच तक का सफर

भारतीय सिनेमा की कहानी केवल फिल्मों, सितारों और बॉक्स ऑफिस की कहानी नहीं है। यह उस समाज की बदलती तस्वीर भी है, जिसमें एक समय महिलाओं का फिल्मों में काम करना ही साहस माना जाता था और आज वही अभिनेत्री करोड़ों की फिल्मों की नायिका, निर्माता, निर्देशक, वैश्विक ब्रांड एंबेसडर और अंतरराष्ट्रीय मंच की पहचान बन चुकी है। फातिमा बेगम से लेकर देविका रानी, नरगिस, मधुबाला, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, काजोल, तब्बू, प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट तक का सफर दरअसल एक सदी में बदलती भारतीय महिला की कहानी है। कभी कैमरे के सामने आना सामाजिक वर्जनाओं को चुनौती देना था, आज कैमरे के पीछे की कमान संभालना भी अभिनेत्री के लिए उतना ही स्वाभाविक है।

मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 15 अगस्त 2026

जब फिल्मों में महिलाओं का आना ही बड़ी खबर था

भारतीय सिनेमा के शुरुआती दिनों में पर्दे पर महिला पात्र तो होते थे, लेकिन उन्हें निभाने के लिए महिलाओं का सामने आना आसान नहीं था। समाज में अभिनय को महिलाओं के लिए सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। ऐसे माहौल में फातिमा बेगम का फिल्मों में आना एक बड़ी सामाजिक और सिनेमाई घटना थी। वे केवल अभिनेत्री ही नहीं रहीं, बल्कि फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में भी आगे बढ़ीं। यानी उस दौर में जब महिलाओं के लिए फिल्म के सेट तक पहुंचना कठिन था, उन्होंने कैमरे के सामने आने के साथ कैमरे के पीछे खड़े होने का साहस भी दिखाया।

यही वह दौर था जब सिनेमा धीरे-धीरे मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक बदलाव का माध्यम बनने लगा। शुरुआती अभिनेत्रियों ने शायद उस समय यह नहीं सोचा होगा कि उनकी एक-एक उपस्थिति आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता तैयार कर रही है, लेकिन इतिहास में उनका महत्व इसी वजह से है। उन्होंने समाज को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर किया कि महिला भी अभिनय को अपना पेशा बना सकती है और पर्दे पर अपनी पहचान बना सकती है।

देविका रानी ने नायिका को दी नई पहचान

1930 के दशक में देविका रानी का आगमन हिंदी सिनेमा के लिए किसी बदलाव से कम नहीं था। वह सिर्फ सुंदर चेहरा नहीं थीं। अभिनय, संवाद, व्यक्तित्व और सिनेमा की समझ ने उन्हें अपने समय की प्रभावशाली कलाकार बनाया। बॉम्बे टॉकीज से उनका जुड़ाव उस दौर के भारतीय फिल्म उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण था।

देविका रानी के समय तक अभिनेत्री पर्दे की सजावट भर नहीं रह गई थी। वह कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगी थी। उनके व्यक्तित्व ने यह स्थापित किया कि नायिका केवल नायक की प्रेमिका नहीं, बल्कि अपने आप में एक प्रभावशाली कलाकार हो सकती है।

नरगिस ने नायिका को बनाया राष्ट्र की आवाज

आजादी के बाद भारतीय सिनेमा में महिला किरदारों की दुनिया तेजी से बदलने लगी। इसी दौर में नरगिस ने ऐसी पहचान बनाई जिसने अभिनेत्री की परिभाषा ही बदल दी। मदर इंडिया की राधा केवल एक मां नहीं थी। वह संघर्ष, त्याग, आत्मसम्मान और उस भारत की प्रतीक थी जो गरीबी और कठिनाइयों से लड़ते हुए आगे बढ़ रहा था।

नरगिस की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उन्होंने साबित किया कि महिला पात्र किसी फिल्म की भावनात्मक सजावट नहीं, बल्कि पूरी कहानी की धुरी हो सकता है। मदर इंडिया ने भारतीय दर्शकों को यह दिखाया कि एक अभिनेत्री अपने अभिनय से पूरी पीढ़ी की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन सकती है।

मधुबाला: मुस्कान के पीछे छिपी कहानी

फिर आया मधुबाला का दौर। उनकी खूबसूरती ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, लेकिन उनकी स्क्रीन मौजूदगी ने उन्हें अमर कर दिया। मुगल-ए-आजम की अनारकली आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार महिला छवियों में गिनी जाती है।

मधुबाला की कहानी भारतीय फिल्म उद्योग के उस चमकदार चेहरे के पीछे छिपी व्यक्तिगत कठिनाइयों को भी सामने लाती है। पर्दे पर उनकी मुस्कान लाखों दर्शकों को आकर्षित करती थी, लेकिन निजी जिंदगी में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। यही विरोधाभास सिनेमा को इतना मानवीय बनाता है—स्क्रीन पर चमक और स्क्रीन के पीछे संघर्ष।

मीना कुमारी और वहीदा रहमान: जब आंखों ने संवाद बोलना शुरू किया

1950 और 1960 के दशक में अभिनेत्री का अभिनय और अधिक परिपक्व हुआ। मीना कुमारी ने भावनाओं को अभिनय की ऐसी गहराई दी कि उन्हें ‘ट्रेजेडी क्वीन’ कहा जाने लगा। लेकिन उनकी प्रतिभा केवल दुखद भूमिकाओं तक सीमित नहीं थी। उनकी आवाज, चेहरे के भाव और आंखों की भाषा कई बार संवादों से ज्यादा प्रभावशाली साबित होती थी।

दूसरी ओर वहीदा रहमान ने शालीनता और अभिनय की सूक्ष्मता को नई ऊंचाई दी। गाइड जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसी महिला को पर्दे पर उतारा जो अपने फैसले लेने की इच्छा रखती है, अपने जीवन को समझना चाहती है और परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय अपना रास्ता चुनती है। यह बदलते भारतीय समाज की झलक भी थी।

वैजयंतीमाला से शर्मिला टैगोर तक: नायिका का बदलता अंदाज

वैजयंतीमाला ने अभिनय और शास्त्रीय नृत्य के अद्भुत मेल से हिंदी फिल्मों की नायिका को नया आकर्षण दिया। उनके नृत्य ने फिल्मी गीतों को सिर्फ मनोरंजन नहीं रहने दिया, बल्कि अभिनेत्री की प्रतिभा और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया।

इसके बाद शर्मिला टैगोर आईं, जिनकी छवि में परंपरा और आधुनिकता दोनों दिखाई दीं। वह उस भारतीय महिला का चेहरा बनीं जो अपनी संस्कृति से जुड़ी भी है और बदलती दुनिया के सवालों से परिचित भी। सिनेमा में महिला अब धीरे-धीरे अपनी इच्छा, व्यक्तित्व और निर्णयों के साथ दिखाई देने लगी थी।

हेमा मालिनी और रेखा: ग्लैमर से व्यक्तित्व तक

1970 का दशक आया और हेमा मालिनी ने ‘ड्रीम गर्ल’ के रूप में दर्शकों के दिलों पर राज किया। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ खूबसूरती तक सीमित नहीं रही। लंबे करियर में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाओं के जरिए यह साबित किया कि लोकप्रियता और अभिनय क्षमता साथ-साथ चल सकती हैं।

फिर आईं रेखा, जिनका सफर खुद को लगातार दोबारा गढ़ने की कहानी है। शुरुआती दौर से लेकर उमराव जान जैसे यादगार अभिनय तक रेखा ने अपने व्यक्तित्व को इस तरह बदला कि वह हिंदी सिनेमा की सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। उन्होंने साबित किया कि अभिनेत्री सिर्फ निर्देशक या निर्माता की बनाई हुई छवि नहीं होती—वह अपनी छवि खुद भी गढ़ सकती है।

श्रीदेवी: जब नायिका खुद फिल्म की ‘हीरो’ बन गई

हिंदी सिनेमा में अभिनेत्री के स्टारडम का सबसे बड़ा मोड़ श्रीदेवी के दौर में दिखाई देता है। मिस्टर इंडिया, चांदनी, चालबाज, सदमा और लम्हे जैसी फिल्मों में उन्होंने कॉमेडी, रोमांस, भावनाओं और गंभीर अभिनय—हर रंग में अपनी क्षमता साबित की।

श्रीदेवी ने एक बहुत महत्वपूर्ण दीवार तोड़ी। उन्होंने दिखाया कि दर्शक किसी फिल्म को केवल पुरुष नायक के लिए नहीं, बल्कि नायिका के लिए भी देखने आ सकते हैं। वह दौर था जब अभिनेत्री को पहली बार बड़े पैमाने पर अपने दम पर फिल्म की व्यावसायिक ताकत माना जाने लगा।

माधुरी दीक्षित: नृत्य और अभिनय का जादू

1990 का दशक माधुरी दीक्षित के नाम के बिना अधूरा है। तेजाब, दिल, बेटा, हम आपके हैं कौन, दिल तो पागल है और देवदास जैसी फिल्मों ने उन्हें अभिनय और नृत्य दोनों का सुपरस्टार बना दिया।

‘एक दो तीन’ से लेकर ‘धक-धक’ तक उनके गीतों ने लोकप्रिय संस्कृति को प्रभावित किया। लेकिन माधुरी की असली ताकत यह थी कि ग्लैमर के साथ अभिनय की विश्वसनीयता भी बनी रही। वह उस दौर की ऐसी अभिनेत्री बनीं जिन्हें दर्शक सिर्फ पर्दे पर देखना नहीं चाहते थे, बल्कि उनके अभिनय और नृत्य का इंतजार करते थे।

काजोल, करिश्मा और ऐश्वर्या: नई सदी की दस्तक

इसके बाद महिला स्टारडम का नया दौर आया। काजोल ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ कुछ होता है और बाद की फिल्मों में भावनात्मक और मजबूत महिला पात्रों को लोकप्रिय बनाया। करिश्मा कपूर ने अपने दौर में ग्लैमर के साथ अभिनय की अलग पहचान बनाई।

और फिर ऐश्वर्या राय ने भारतीय अभिनेत्री की खूबसूरती और लोकप्रियता को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। यहां से एक महत्वपूर्ण बदलाव शुरू हुआ—भारतीय अभिनेत्री की पहचान अब सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं रही। दुनिया भारतीय अभिनेत्रियों को वैश्विक मनोरंजन और फैशन मंच पर देखने लगी।

तब्बू: जब अभिनय ने स्टारडम को पीछे छोड़ दिया

अगर लोकप्रिय स्टारडम के बीच अभिनय की गहराई को सबसे मजबूती से किसी ने आगे बढ़ाया तो उनमें तब्बू का नाम प्रमुख है। मकबूल, चांदनी बार, मकड़ी और दृश्यम जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने साबित किया कि अभिनेत्री की ताकत केवल ग्लैमर या बॉक्स ऑफिस नहीं होती।

तब्बू ने ऐसी भूमिकाएं चुनीं जिनमें किरदार खुद कहानी बन जाता है। उन्होंने हिंदी सिनेमा में चरित्र-केंद्रित महिला भूमिकाओं के लिए जगह और मजबूत की।

प्रियंका चोपड़ा: बॉलीवुड की सीमा टूटी

फिर वह समय आया जब भारतीय अभिनेत्री ने सचमुच वैश्विक मनोरंजन उद्योग में अपनी जगह बनानी शुरू की। प्रियंका चोपड़ा ने बॉलीवुड में सफलता के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में काम किया और हॉलीवुड में भी अपनी पहचान बनाई।

उनका सफर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह धारणा मजबूत हुई कि भारतीय अभिनेत्री केवल भारतीय फिल्मों की सीमा तक सीमित नहीं है। वह दुनिया के किसी भी मंच पर अपनी प्रतिभा के बल पर पहचान बना सकती है।

दीपिका पादुकोण: ग्लोबल स्टारडम की नई तस्वीर

दीपिका पादुकोण ने ओम शांति ओम से शुरुआत कर कुछ ही वर्षों में हिंदी सिनेमा की शीर्ष अभिनेत्रियों में जगह बनाई। पीकू, राम-लीला, बाजीराव मस्तानी और पद्मावत जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए।

उनकी यात्रा उस नई अभिनेत्री की तस्वीर पेश करती है जो अभिनेत्री होने के साथ-साथ ब्रांड, वैश्विक सेलिब्रिटी और सार्वजनिक व्यक्तित्व भी है। भारतीय अभिनेत्री अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ भारत की प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक मनोरंजन उद्योग की महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में दिखाई देने लगी।

आलिया भट्ट: छोटी उम्र, बड़े किरदार

नई पीढ़ी की बात हो तो आलिया भट्ट का सफर खास तौर पर उल्लेखनीय है। हाईवे, उड़ता पंजाब, राजी, गली बॉय और गंगूबाई काठियावाड़ी जैसी फिल्मों ने दिखाया कि युवा अभिनेत्री भी बेहद जटिल किरदारों को पूरी ताकत के साथ निभा सकती है।

आज की अभिनेत्री के लिए ‘हीरोइन’ शब्द का अर्थ बदल चुका है। वह सिर्फ नायक के साथ रोमांस करने वाला किरदार नहीं है। वह कहानी का विषय भी है, कहानी की आवाज भी और कई बार कहानी की सबसे बड़ी ताकत भी।

आज की अभिनेत्री: कैमरे के सामने भी, पीछे भी

आज की पीढ़ी ने अभिनेत्री की भूमिका को और व्यापक बना दिया है। विद्या बालन, कंगना रनौत, तापसी पन्नू, करीना कपूर, अनुष्का शर्मा, भूमि पेडनेकर, रश्मिका मंदाना, साई पल्लवी, नयनतारा और अनेक नई कलाकार अलग-अलग तरह की कहानियों और किरदारों के साथ सामने आ रही हैं।

OTT ने इस बदलाव को और गति दी है। अब अभिनेत्री के लिए सफलता का रास्ता केवल बड़े पर्दे और बॉक्स ऑफिस से होकर नहीं गुजरता। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने उम्र, भाषा, बजट और स्टारडम की कई पुरानी सीमाएं तोड़ी हैं। आज अभिनेत्री पुलिस अधिकारी, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, सैनिक, वकील, पत्रकार, मां, राजनेता, अपराधी, उद्यमी या विद्रोही—कुछ भी हो सकती है।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि वह अब केवल किसी पुरुष किरदार की कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी कहानी की मुख्य पात्र हो सकती है।

घूंघट से ग्लोबल रेड कार्पेट तक

करीब एक सदी की इस यात्रा को देखें तो तस्वीर बेहद दिलचस्प है। फातिमा बेगम के दौर में कैमरे के सामने खड़ा होना साहस था। देविका रानी के दौर में अभिनेत्री की पहचान मजबूत हुई। नरगिस ने महिला किरदार को सामाजिक और राष्ट्रीय अर्थ दिया। मधुबाला ने स्टारडम की चमक बढ़ाई। मीना कुमारी और वहीदा रहमान ने अभिनय को भावनात्मक गहराई दी। हेमा मालिनी और रेखा ने ग्लैमर और व्यक्तित्व की नई परिभाषा गढ़ी। श्रीदेवी ने साबित किया कि नायिका अकेले फिल्म की कमान संभाल सकती है। माधुरी ने उसे सुपरस्टार बनाया। काजोल और तब्बू ने किरदार की ताकत को आगे बढ़ाया। प्रियंका और दीपिका ने सीमाएं पार कीं और आलिया समेत नई पीढ़ी ने अभिनेत्री को कहानी, व्यवसाय और वैश्विक पहचान—तीनों का केंद्र बना दिया।

यही हिंदी सिनेमा के सफर की सबसे खूबसूरत कहानी है। कभी अभिनेत्री को पर्दे पर आने के लिए समाज से लड़ना पड़ा था। आज वह अपनी भूमिका, अपनी फीस, अपने प्रोजेक्ट और अपने करियर की दिशा पर बातचीत करने की ताकत रखती है। कभी उसका परिचय किसी अभिनेता की नायिका के रूप में दिया जाता था; आज कई अभिनेत्रियों के नाम पर फिल्में बिकती हैं और दर्शक उनके किरदारों को देखने सिनेमाघरों तक पहुंचते हैं।

इसलिए हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री का सफर सिर्फ ग्लैमर की कहानी नहीं है। यह आत्मविश्वास की कहानी है, बदलाव की कहानी है और उस भारतीय महिला की कहानी है जिसने धीरे-धीरे पर्दे पर अपनी जगह बनाई और आखिरकार कहानी की दिशा तय करने लगी। घूंघट से ग्लोबल रेड कार्पेट तक का यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है—बल्कि शायद भारतीय अभिनेत्री की सबसे रोमांचक कहानी अब शुरू हुई है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted