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मक्का समझौते ने खोली अरब एकजुटता की कमजोरी

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान की सैन्य साझेदारी पर C. राजा मोहन का विश्लेषण—बदले क्षेत्रीय समीकरणों के बीच अरब-मुस्लिम एकता पर सवाल

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त को हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के बदलते रणनीतिक समीकरणों पर बहस तेज कर दी है। द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने विश्लेषण में वरिष्ठ रणनीतिक विशेषज्ञ सी. राजा मोहन ने इस समझौते को अरब और मुस्लिम देशों की एकजुटता की सीमाओं के संदर्भ में देखा है। उनका तर्क है कि दशकों से जिस अरब-मुस्लिम एकता की बात होती रही है, वास्तविक रणनीतिक हितों के सामने उसकी सीमाएं बार-बार उजागर हुई हैं।

70 साल पुराना बयान फिर चर्चा में

राजा मोहन ने अपने विश्लेषण की शुरुआत पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के करीब सात दशक पुराने बयान से की है। 1956 के स्वेज संकट के दौरान सुहरावर्दी ने अरब और मुस्लिम एकजुटता की धारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “शून्य में शून्य जोड़ने से परिणाम शून्य ही रहता है।” उस समय इस बयान को राजनीतिक रूप से भारी विरोध का सामना करना पड़ा और सुहरावर्दी की सरकार भी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। लेकिन लेखक के अनुसार, आने वाले दशकों के घटनाक्रम ने उनके आकलन को एक अलग संदर्भ में प्रासंगिक बना दिया।

मक्का समझौता क्यों अहम?

7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता केवल तीन देशों की सैन्य साझेदारी तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा, बदलते गठबंधन और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दे जुड़े हैं। खास तौर पर सऊदी अरब और तुर्किये के बीच बढ़ती नजदीकी इस समझौते का महत्वपूर्ण पहलू है।

सऊदी-तुर्किये रिश्तों में बड़ा बदलाव

राजा मोहन के अनुसार, समझौते का सबसे महत्वपूर्ण संकेत सऊदी अरब का तुर्किये की ओर बढ़ता रणनीतिक झुकाव है। कुछ वर्ष पहले तक तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की कड़ी आलोचना करते थे। 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी कड़वाहट आ गई थी। अब वही रिश्ते रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

हितों के आगे बदलते गठबंधन

इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी से ज्यादा महत्व राष्ट्रीय हितों का होता है। पश्चिम एशिया की सुरक्षा परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और ऐसे में सऊदी अरब जैसे देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के मुताबिक नए साझेदारों के साथ संबंध मजबूत कर रहे हैं।

अरब एकता की वास्तविक परीक्षा

मक्का समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले से ही गंभीर सुरक्षा संकटों से गुजर रहा है। क्षेत्रीय देशों के बीच मतभेद, अलग-अलग सुरक्षा प्राथमिकताएं और बाहरी शक्तियों की भूमिका ने किसी साझा अरब रणनीति की राह मुश्किल बनाई है। यही वजह है कि समझौते को केवल सैन्य गठजोड़ के रूप में देखने के बजाय क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। तीनों देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं और उनकी रक्षा साझेदारी का असर पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए खाड़ी देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों पर करीबी नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

सात दशक पुरानी बहस, नए दौर में फिर सामने

मक्का समझौते ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या साझा धर्म या ऐतिहासिक संबंध किसी स्थायी रणनीतिक एकता की गारंटी दे सकते हैं। राजा मोहन के विश्लेषण का केंद्रीय संदेश यही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भावनात्मक एकता से ज्यादा निर्णायक भूमिका राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और शक्ति संतुलन की होती है। सुहरावर्दी का करीब 70 वर्ष पुराना आकलन इसी बदलती दुनिया में नए संदर्भ के साथ फिर चर्चा में आ गया है।

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