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EC के जवाब की भी पड़ताल, 48 घंटे में फिर खुल गई पोल! 14 आपत्तियों के बाद 9 फैसले, लेकिन Form 6 और बंगाल पर जवाब अब भी गायब

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 सितंबर 2026

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों पर अब कहानी सिर्फ 14 आपत्तियों तक सीमित नहीं रही। 2 चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की ओर से 10 महीने में दर्ज की गई कम से कम 14 आपत्तियों पर विस्तृत रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा कि अलग-अलग राय किसी भी संस्थान में सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले एक साल के महत्वपूर्ण फैसले पूरी Commission की सर्वसम्मति से लिए गए। लेकिन अब उसी जवाब के 48 घंटे के भीतर सामने आई पत्रकार रितिका चोपड़ा की नई रिपोर्ट ने आयोग के स्पष्टीकरण पर ही नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

यही वह जगह है जहां खोजी पत्रकारिता की असली ताकत दिखाई देती है। रितिका चोपड़ा की नई रिपोर्ट बताती है कि आयोग ने शनिवार की बैठक के बाद 9 नए फैसलों की घोषणा की और इन फैसलों में उन कई चिंताओं को संबोधित किया गया, जिन्हें दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में रिकॉर्ड पर रखा था। बैठक के एजेंडे पहले से साझा करने, बैठक की कार्यवाही दर्ज करने, नए IT मॉड्यूल की समीक्षा, ECINet की जांच, स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल करने और फील्ड अधिकारियों को सिस्टम में अधिक सुविधा देने जैसे कदम उन्हीं मुद्दों से जुड़े दिखाई देते हैं जिन पर पहले सवाल उठाए गए थे।

सवाल यहीं से और बड़ा हो जाता है—अगर ये सब सिर्फ सामान्य “सुझाव” और “इनपुट” थे, तो फिर 48 घंटे के भीतर आयोग को उन्हीं चिंताओं के अनुरूप इतने महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव करने की जरूरत क्यों पड़ी? आयोग का अपना पक्ष है कि लिखित नोट, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-संतुलन सामान्य संस्थागत प्रक्रिया हैं। लेकिन रिपोर्ट में सामने आए घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इन आपत्तियों को महज नियमित बातचीत मानकर आगे बढ़ा देना पर्याप्त है, या इनके पीछे चुनावी व्यवस्था से जुड़े गंभीर प्रशासनिक प्रश्न थे?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल Form 6 को लेकर बना हुआ है। नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले इस Form में ECINet पर SIR से जुड़े सवाल जोड़े जाने पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए इसे हटाने की मांग की गई थी। आयोग के नए फैसले में कहा गया कि SIR अवधि के बाहर निर्धारित Form 6 लागू होगा, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार ऑनलाइन Form में जो अतिरिक्त सवाल जोड़ा गया था, उसके बारे में स्पष्ट नहीं किया गया कि वह हटाया गया या नहीं, उसे किसने जोड़ा और वह क्यों बना रहा।

अब सवाल सिर्फ Form 6 का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसके जरिए यह तय होता है कि मतदाता सूची में कौन जुड़ेगा, किसका नाम हटेगा और हटाए गए नाम को वापस कौन दर्ज करेगा। पहले की खोजी रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, अपील की प्रक्रिया तथा मतदाता सूची से जुड़े IT सिस्टम पर गंभीर आपत्तियां रिकॉर्ड की थीं। एक मामले में ECINet की व्यवस्था को लेकर यह सवाल भी उठाया गया कि क्या स्थानीय स्तर के चुनाव अधिकारियों के अधिकार और पहुंच पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं।

गोवा का मामला भी इसी बहस को और गंभीर बनाता है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय अधिकारियों ने 97 मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया, लेकिन उस समय सॉफ्टवेयर में उनके नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। आयोग ने अब कहा है कि इनमें से 81 लोगों ने Form 6 दाखिल किया है और मुख्य निर्वाचन अधिकारी को उनके नाम शामिल कराने की प्रक्रिया आसान बनाने का निर्देश दिया गया है। यानी जिस तकनीकी समस्या पर पहले सवाल उठे थे, उस पर अब कार्रवाई का दावा सामने आया है।

लेकिन पश्चिम बंगाल का सवाल अभी भी खुला हुआ है। रिपोर्ट साफ कहती है कि उन मतदाताओं के खिलाफ दायर अपीलों को लेकर आयोग के नए नोट में कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया, जिनके नाम शामिल रखने का आदेश न्यायिक अधिकारियों ने दिया था। बड़ा सवाल यही है कि इन अपीलों को किसने अधिकृत किया, क्या वे ECI की ओर से दायर हुईं और अगर हुईं तो उन्हें मंजूरी किसने दी? यही वह सवाल है जिस पर अभी भी स्पष्टता का इंतजार है।

ECINet को लेकर भी मामला साधारण तकनीकी सुधार से आगे जाता है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने IT व्यवस्था, मतदाता डाटा तक पहुंच और अधिकारियों की भूमिका से जुड़े सवाल उठाए थे। अब आयोग ने ECINet की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त की अध्यक्षता में समिति बनाने और उसमें IIT या IIIT के स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल करने का फैसला किया है। यह कदम अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पहले कोई गैरकानूनी काम हुआ था, लेकिन इतना जरूर दिखाता है कि सिस्टम की स्वतंत्र समीक्षा अब आयोग के एजेंडे पर आ गई है।

और यहीं रितिका चोपड़ा की रिपोर्टिंग का महत्व सामने आता है। किसी संस्था के खिलाफ केवल आरोप लिख देना पत्रकारिता नहीं है। दस्तावेज जुटाना, अलग-अलग घटनाओं को जोड़ना, अधिकारियों की आपत्तियों को सामने रखना और फिर संस्था के जवाब को उन्हीं तथ्यों की कसौटी पर परखना खोजी पत्रकारिता का कठिन हिस्सा है। इस मामले में पहले 14 आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई, फिर आयोग का जवाब आया और अब उसी के बाद 9 फैसलों की पड़ताल सामने रखी गई है।

CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक दलों ने अलग-अलग आरोप और मांगें रखी हैं, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर किसी व्यक्ति को “बेईमान” या “धूर्त” घोषित करना तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं होगा। असली सवाल इससे ज्यादा गंभीर और संस्थागत है—क्या 3 सदस्यीय संवैधानिक Commission में निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी? क्या दोनों चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों पर समय रहते पर्याप्त कार्रवाई हुई? Form 6 में बदलाव किसके आदेश से हुआ? पश्चिम बंगाल की अपीलों को किसने मंजूरी दी? और मतदाता सूची के IT सिस्टम पर नियंत्रण की वास्तविक व्यवस्था क्या है?

यही सवाल आज की पत्रकारिता की असली परीक्षा हैं। रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट ने आरोपों को नारे में बदलने के बजाय दस्तावेजों, आपत्तियों और आयोग के फैसलों के बीच का अंतर सामने रखा है। चुनाव आयोग का जवाब भी सार्वजनिक है, लेकिन उस जवाब के बाद उठे नए सवाल भी उतने ही सार्वजनिक हैं। लोकतंत्र में सवाल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए होने चाहिए जिसके हाथ में देश की मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया की जिम्मेदारी है।

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