राष्ट्रीय/ तमिलनाडु | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 27 सितंबर 2026
तमिलनाडु सरकार के एक नए आदेश ने सूचना के अधिकार यानी RTI को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सरकार ने Public (Law and Order) Department को RTI Act, 2005 के दायरे से बाहर कर दिया है। सरकार ने इसके लिए RTI Act की Section 24(4) का इस्तेमाल किया है और इस विभाग को Intelligence और Security Organisation के रूप में अधिसूचित किया है। आदेश Human Resources Management Department की ओर से जारी किया गया और इसे Government Gazette में भी प्रकाशित किया गया है।
इस फैसले का असर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि Public (Law and Order) Department से जुड़े विषय सीधे राज्य में कानून-व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और संवेदनशील घटनाओं से जुड़े होते हैं। सामने आई जानकारी के मुताबिक नए आदेश के बाद सांप्रदायिक और जातीय झड़पों, NSA के तहत हिरासत, पुलिस हिरासत में मौतों और छात्रों तथा किसानों के आंदोलनों से जुड़े कई मामलों की जानकारी RTI के सामान्य रास्ते से हासिल करना कठिन हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन विषयों में जनता सबसे ज्यादा पारदर्शिता चाहती है, उन्हीं से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड तक नागरिकों की पहुंच कितनी रह जाएगी।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी बात समझना जरूरी है। Section 24(4) राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि वह अपने द्वारा स्थापित Intelligence और Security Organisations को सरकारी अधिसूचना के जरिए RTI Act से बाहर रख सकती है। लेकिन यह छूट पूरी तरह से निरपेक्ष नहीं है। कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित सूचना इस छूट के दायरे से बाहर रहेगी। मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचना के मामले में State Information Commission की मंजूरी की व्यवस्था भी कानून में दी गई है।
यानी इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि कानून-व्यवस्था से जुड़े हर मामले की हर जानकारी हमेशा के लिए जनता से छिपाई जा सकती है। अगर किसी मामले में भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हैं, तो Section 24 की छूट के बावजूद कानून में सूचना उपलब्ध कराने का रास्ता मौजूद है। तमिलनाडु State Information Commission भी अपनी आधिकारिक जानकारी में साफ करता है कि राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित Intelligence और Security Organisations RTI से बाहर हो सकते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचनाओं पर यह छूट लागू नहीं होती।
यह पहली बार नहीं है जब तमिलनाडु में Section 24(4) का इस्तेमाल किसी सरकारी संगठन को RTI से बाहर रखने के लिए किया गया हो। मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले में 2005 की तमिलनाडु सरकार की अधिसूचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनके जरिए Special Branch CID, Q Branch CID, Special Division और Security Branch जैसे संगठनों को RTI Act से बाहर रखा गया था। उसी दौर में Crime Branch CID, Special Investigation Team और Video Piracy Cell तथा Home Department के कुछ हिस्सों को भी अधिसूचनाओं के जरिए छूट दी गई थी।
लेकिन मौजूदा फैसले में सवाल इसलिए ज्यादा गंभीर दिखाई देता है क्योंकि Public (Law and Order) Department का दायरा नाम से ही काफी व्यापक है। यह सामान्य अर्थों में किसी एक खुफिया एजेंसी का नाम नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार ने पूरे विभाग को Intelligence और Security Organisation की श्रेणी में रखने का आधार क्या माना है? क्या विभाग का हर काम संवेदनशील है या केवल कुछ खास सूचनाओं को ही गोपनीय रखने की जरूरत है? और अगर किसी नागरिक को किसी कानून-व्यवस्था से जुड़े मामले में सरकारी निर्णय, रिपोर्ट या कार्रवाई का रिकॉर्ड चाहिए, तो उसे अब किस प्रक्रिया से वह जानकारी मिलेगी?
यहां पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल भी सामने आता है। सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक करने से वास्तविक नुकसान हो सकता है और RTI Act में ऐसी सूचनाओं के लिए अलग-अलग छूट पहले से मौजूद हैं। लेकिन RTI का मूल उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार को सूचना रोकने का कानूनी अधिकार मिला या नहीं, बल्कि यह भी है कि उस अधिकार का इस्तेमाल किस सीमा तक और किन परिस्थितियों में किया जाएगा।
इस फैसले का एक व्यावहारिक असर उन नागरिकों पर पड़ सकता है जो किसी पुलिस कार्रवाई, आंदोलन, हिरासत या कानून-व्यवस्था की घटना के बाद सरकारी रिकॉर्ड हासिल करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए किसी प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने क्या रिपोर्ट तैयार की, किसी संवेदनशील घटना के बाद अधिकारियों के बीच क्या पत्राचार हुआ या किसी कार्रवाई के पीछे कौन-से सरकारी रिकॉर्ड मौजूद हैं—ऐसी सूचनाओं के लिए अब RTI आवेदन का रास्ता पहले जैसा सीधा नहीं रहेगा। हालांकि किसी विशेष सूचना के बारे में अंतिम स्थिति इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वह सूचना किस रिकॉर्ड में है और Section 24 की छूट तथा उसके अपवाद उस पर किस तरह लागू होते हैं।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि Section 24(4) के तहत जारी हर ऐसी अधिसूचना को State Legislature के सामने रखा जाना होता है। कानून में यह प्रक्रिया भी स्पष्ट है। इसलिए अब इस आदेश पर विधानसभा में सवाल उठना, इसके दायरे और आधार पर बहस होना तथा यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग को Intelligence और Security Organisation घोषित करने के लिए सरकार ने क्या कारण दर्ज किए हैं।
कुल मिलाकर तमिलनाडु सरकार का यह फैसला RTI बनाम सुरक्षा और गोपनीयता की पुरानी बहस को एक नए स्तर पर ले आया है। सरकार के पास Section 24(4) के तहत अधिसूचना जारी करने की कानूनी शक्ति है, लेकिन इस शक्ति के साथ भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचनाओं के लिए कानून में स्पष्ट अपवाद भी मौजूद हैं। अब असली सवाल यही रहेगा कि इस छूट की सीमा कहां तय होती है और आने वाले समय में नागरिकों, RTI कार्यकर्ताओं और अदालतों के सामने इसकी व्याख्या किस तरह होती है।



