राष्ट्रीय/ उत्तर प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | अयोध्या | 27 सितंबर 2026
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की रकम से जुड़ा मामला अब सिर्फ 8 आरोपियों और कथित नकदी चोरी तक सीमित नहीं रह गया है। SIT की चार्जशीट सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों के पास ट्रस्ट की जिम्मेदारियां थीं और जिनसे जांच के दौरान पूछताछ भी हुई, उन्हें आरोपी बनाने के बजाय गवाह क्यों बनाया गया? पूर्व महासचिव चंपत राय, पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा और गोपाल राव को 133 गवाहों की सूची में रखा गया है, जबकि चार्जशीट में 8 लोगों को आरोपी बनाया गया है। यह कानूनी फैसला जांच एजेंसी का है, लेकिन इसी फैसले ने कई सवालों को जन्म दे दिया है।
अब सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ जांच की सामान्य प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति भी हो सकती है? यह बात फिलहाल साबित नहीं हुई है कि किसी बड़े व्यक्ति को बचाने के लिए चंपत राय या अनिल मिश्रा को गवाह बनाया गया। लेकिन किसी भी गंभीर जांच में यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि जिन लोगों की भूमिका और जिम्मेदारियां जांच के दायरे में थीं, उनकी स्थिति आरोपी से गवाह कैसे बदल गई? अदालत में यही देखा जाना है कि जांच एजेंसी ने किन सबूतों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि इन लोगों के खिलाफ आरोपी के रूप में कार्रवाई जरूरी नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस ने उन्हें ट्रस्ट के पदाधिकारी रहने के कारण मामले की जानकारी रखने वाले गवाह के रूप में शामिल किया है।
और यहीं से इस मामले की सबसे बड़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरी जन्म लेती है—अगर चंपत राय और अनिल मिश्रा सिर्फ गवाह हैं, तो क्या उनके पास ऐसी जानकारी है जो आगे की सुनवाई में किसी और की भूमिका को सामने ला सकती है? क्या वे मंदिर में चढ़ावे की गिनती, नकदी के रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी ऐसी कड़ियां जोड़ सकते हैं, जो अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं? या फिर पुलिस ने जांच में उनकी कोई आपराधिक भूमिका नहीं पाई और इसलिए उन्हें गवाह बनाना कानूनी रूप से स्वाभाविक कदम है? इन दोनों संभावनाओं में से किसी एक को सच मानने का आधार फिलहाल सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है। लेकिन यही वह बिंदु है जिस पर पारदर्शिता की सबसे ज्यादा जरूरत है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि जांच में मंदिर परिसर में नकदी की गिनती के दौरान CCTV में कथित रूप से चोरी या नकदी निकालने की 105 घटनाएं सामने आने की बात SIT ने कही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को भी बताया था कि CCTV फुटेज में ऐसी घटनाएं दर्ज हुईं। दूसरी ओर, जांच में बैंक तक रकम पहुंचाने की प्रक्रिया के दौरान चोरी का सबूत नहीं मिलने की बात भी सामने आई है। यानी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा उस जगह पर केंद्रित है जहां श्रद्धालुओं से मिली नकदी की गिनती की जाती थी।
पुलिस के मुताबिक 8 आरोपियों से जुड़ी जांच में करीब ₹79.85 लाख की नकदी बरामद हुई। चार्जशीट में CCTV फुटेज, मोबाइल चैट, नकदी की बरामदगी, बैंक जमा और वित्तीय लेनदेन जैसे सबूतों का भी उल्लेख है। कुछ रिपोर्टों में CCTV से जुड़ी घटनाओं की संख्या 105 से अधिक बताई गई है, क्योंकि अलग-अलग फुटेज और गतिविधियों को अलग तरीके से गिना गया है। इसलिए संख्या को लेकर भी जांच दस्तावेजों और अदालत के रिकॉर्ड को देखना महत्वपूर्ण होगा।
लेकिन असली सवाल फिर वही है—अगर सिस्टम के भीतर इतनी बड़ी संख्या में अनियमितताएं हुईं, तो जिम्मेदारी केवल उन 8 लोगों तक कैसे तय हुई? क्या पूरी व्यवस्था में सिर्फ वही लोग जिम्मेदार थे? क्या उस समय की निगरानी व्यवस्था की भी जांच हुई? क्या नकदी की गिनती, रिकॉर्ड बनाने, सुरक्षा और बैंक तक रकम पहुंचाने की पूरी श्रृंखला की जवाबदेही तय हुई? और अगर किसी अधिकारी या पदाधिकारी की आपराधिक भूमिका नहीं मिली, तो क्या जांच रिपोर्ट में उसका कारण स्पष्ट रूप से दर्ज है? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब सार्वजनिक होने से संदेह और अटकलों की गुंजाइश कम होगी।
इस मामले में एक और दिलचस्प पहलू है। चंपत राय और अनिल मिश्रा के साथ गोपाल राव को भी आरोपी नहीं बनाया गया और गवाहों की सूची में रखा गया है। वहीं ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन, जिन्होंने मूल शिकायत दर्ज कराई थी, भी गवाह हैं। यानी जांच एजेंसी ने ट्रस्ट से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोगों को अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में रखा है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि जांच एजेंसी इन लोगों को मामले की घटनाओं और व्यवस्था के बारे में जानकारी रखने वाला मानती है। लेकिन अदालत में यह भी परखा जाएगा कि इन गवाहों के बयान और दूसरे सबूत एक-दूसरे से किस तरह मेल खाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ वकीलों ने इसी मुद्दे पर आपत्ति भी उठाई है। अदालत में अधिवक्ताओं के एक समूह ने चंपत राय, अनिल मिश्रा, गोपाल राव और कृष्ण मोहन के खिलाफ भी FIR और कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। उनका तर्क था कि इन लोगों को गवाह के बजाय आरोपी के तौर पर देखा जाना चाहिए। अदालत ने हालांकि पुलिस की ओर से दाखिल 8 आरोपियों वाली चार्जशीट पर संज्ञान लिया। इसका मतलब यह है कि आरोपी बनाने की मांग और पुलिस की जांच का निष्कर्ष एक ही नहीं था। यह अंतर आगे की कानूनी बहस में महत्वपूर्ण हो सकता है।
तो क्या सचमुच किसी बड़े नाम को बचाने की रणनीति है? इसका जवाब अभी हां या ना में देना जल्दबाजी होगी। अगर ऐसा कोई आरोप लगाया जाता है तो उसके लिए ठोस सबूत चाहिए—जैसे जांच में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका के संकेत, किसी आरोपी या गवाह का बयान, वित्तीय लेनदेन, निर्देशों के रिकॉर्ड या ऐसा दस्तावेज जो किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करे। अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी इतनी नहीं है कि यह कहा जा सके कि किसी बड़े व्यक्ति को बचाने के लिए चंपत राय या अनिल मिश्रा को गवाह बनाया गया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गवाह बनाए जाने का फैसला अपने आप में सवाल पूछने से रोकता नहीं है।
अब असली परीक्षा अदालत में होगी। 133 गवाह, CCTV फुटेज, बरामद नकदी, मोबाइल रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और हजारों पन्नों के दस्तावेज—इन सबको अदालत के सामने परखा जाएगा। अगर जांच पूरी तरह पारदर्शी है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि चंपत राय और अनिल मिश्रा को आरोपी नहीं बनाने के पीछे कौन-से ठोस तथ्य थे और उनकी गवाही से जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है। और अगर आगे चलकर कोई नया सबूत सामने आता है, तो सवाल यह भी रहेगा कि क्या जांच का दायरा और बढ़ेगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—8 आरोपी, 133 गवाह और मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी की पूरी कहानी में क्या अदालत के सामने अभी सिर्फ पहला अध्याय खुला है?



