अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार क्या है—शासन, जवाबदेही और कामकाज या फिर कैमरे, प्रचार और अपनी छवि का लगातार निर्माण? अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट की टिप्पणी और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के तीखे सवालों ने इसी बहस को फिर देश और दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है।
दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शामिल द इकोनॉमिस्ट ने अपने लेख Narendra Modi and the Battle for India में मोदी के सत्ता इस्तेमाल पर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। पत्रिका का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने किसी भी दूसरे भारतीय नेता की तुलना में अधिक निर्ममता से और अधिक लंबे समय तक अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है। यह टिप्पणी केवल मोदी की राजनीतिक शैली पर सवाल नहीं है, बल्कि उनके शासनकाल में सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक जवाबदेही को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी है।
मोदी की राजनीति: काम कम, छवि का शोर ज्यादा?
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने द इकोनॉमिस्ट की टिप्पणी साझा करते हुए मोदी की उस राजनीति पर सवाल उठाए, जिसमें उनके मुताबिक शासन के वास्तविक प्रदर्शन से ज्यादा महत्व प्रचार, फोटो खिंचवाने और खुद को विश्वगुरु साबित करने की मुहिम को दिया गया है।
खेड़ा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री को अपनी तस्वीरें चमकाने, भ्रामक प्रचार और अपनी छवि गढ़ने से विशेष लगाव है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सप्ताह प्रधानमंत्री के लिए असहज रहे होंगे, क्योंकि अब आलोचना की आवाज केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सुनाई दे रही है।
खेड़ा ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा का सवाल उठाते हुए कहा कि यह पद कभी देश की महान हस्तियों के पास रहा है, लेकिन आज इसे लेकर जिस तरह की टिप्पणियां हो रही हैं, वह पूरे पद की प्रतिष्ठा के लिए चिंता का विषय है।
विश्वगुरु के प्रचार के पीछे कौन-से सवाल छिपे हैं?
मोदी की राजनीति में छवि निर्माण हमेशा केंद्रीय भूमिका में रहा है। बड़े-बड़े आयोजन, विदेशी दौरों की तस्वीरें, कैमरों के सामने तैयार किए गए दृश्य और हर उपलब्धि का व्यक्तिगत प्रचार—इन सबके बीच देश के असली सवाल लगातार जवाब मांग रहे हैं।
बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, युवाओं का भविष्य, सामाजिक तनाव, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछना जरूरी है। देश केवल भाषणों, नारों और प्रचार अभियानों से नहीं चलता। उसे ठोस नीतियां, परिणाम और जवाबदेह नेतृत्व चाहिए।
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री आलोचना से ऊपर नहीं
द इकोनॉमिस्ट की टिप्पणी ने मोदी के सत्ता इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं, जबकि पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री की प्रचार-केंद्रित राजनीति और पद की गरिमा को निशाने पर लिया है। इन दोनों के बीच एक साझा सवाल साफ दिखाई देता है—क्या प्रधानमंत्री की चमकती हुई सार्वजनिक छवि के पीछे सत्ता के कामकाज की निष्पक्ष समीक्षा हो रही है?
मोदी की आलोचना करना भारत की आलोचना नहीं है। प्रधानमंत्री कोई राजा नहीं, जनता के प्रति जवाबदेह पद पर बैठे जनप्रतिनिधि हैं। उनकी नीतियों, फैसलों और कार्यशैली पर सवाल उठेंगे और उठने भी चाहिए।
देश को ऐसा प्रधानमंत्री नहीं चाहिए जिसकी हर गतिविधि कैमरे के लिए हो और हर सवाल का जवाब प्रचार से दिया जाए। देश को जवाबदेही चाहिए, संस्थाओं की स्वतंत्रता चाहिए और जनता के सवालों का सीधा जवाब चाहिए।
मोदी की छवि चाहे जितनी चमकाई जाए, लोकतंत्र में सत्ता का हिसाब देना ही पड़ेगा।



