राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026
वोट चोरी के खिलाफ रामलीला मैदान में आयोजित INDIA bloc की विशाल रैली में CJP (कॉकroach जनता पार्टी) के प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी अब चर्चा का विषय बन गई है। सवाल उठाने वालों को अभिजीत दीपके ने जवाब दिया कि CJP अपनी अलग और निष्पक्ष पहचान बनाए रखना चाहता था। संगठन नहीं चाहता था कि उसे किसी राजनीतिक दल के नेताओं के साथ खड़ा हुआ देखा जाए।
लेकिन इस सफाई के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—जब लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हों, जब युवा सड़कों पर संघर्ष कर रहे हों और विपक्षी दल एकजुट होकर विरोध दर्ज करा रहे हों, तब निष्पक्षता के नाम पर दूरी बनाए रखना कितना उचित है?
निष्पक्षता या आंदोलन से दूरी?
इस पूरे विवाद पर टिप्पणी करते हुए लेखक ने सवाल उठाया है कि संकट के समय तटस्थ बने रहने की कोशिश कहीं अन्याय के सामने मूक दर्शक बने रहने जैसी तो नहीं है। उनका तर्क है कि जब किसी के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर चोट हो रही हो, तब केवल अपनी छवि को राजनीतिक रूप से निष्पक्ष बनाए रखने के लिए चुप रहना भी सवालों के घेरे में आता है।
हालांकि, उन्होंने CJP से जुड़े युवाओं के प्रति कुछ नरमी बरतने की बात भी कही। उनका कहना है कि जेन-जी का प्रतिनिधित्व करने वाले इन युवाओं को पूरी तरह कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।
रैली से एक दिन पहले फार्महाउस में दिवाली पार्टी
विवाद को नया संदर्भ 31 अक्टूबर की दिवाली पार्टी की तस्वीरों से मिला है। लेखक के अनुसार, रामलीला मैदान की रैली से ठीक एक दिन पहले CJP से जुड़े कुछ युवा दक्षिण दिल्ली स्थित सौरव दास के फार्महाउस पर आयोजित दिवाली पार्टी में शामिल हुए थे।
पार्टी की तस्वीरों में युवा ‘देसी गर्ल, माय देसी गर्ल’ गाने पर नाचते और जश्न मनाते दिखाई दिए। लेखक ने पार्टी की तस्वीरों और फार्महाउस को लेकर भी टिप्पणी की है। उनके मुताबिक, तस्वीरों में दिख रहे कुछ लोग अगले दिन INDIA bloc की रैली में पहुंचे भी थे।
लेखक ने व्यंग्य करते हुए कहा कि पार्टी की मेजबानी के बाद आयोजकों और कुछ अन्य लोगों की थकान इतनी रही होगी कि वे अगले दिन रैली के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट तक नहीं कर सके, जबकि कई ऐसे लोग भी थे जो रैली में नहीं पहुंच पाए, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन को समर्थन दे रहे थे।
निजी जश्न पर नहीं, सार्वजनिक संदेश पर सवाल
लेखक ने साफ किया है कि सवाल किसी के दिवाली मनाने या निजी पार्टी आयोजित करने के अधिकार पर नहीं है। सवाल उस समय और उस सार्वजनिक संदेश का है, जब देश में वोट चोरी के आरोपों के खिलाफ आंदोलन चल रहा हो, युवा विरोध प्रदर्शन कर रहे हों और विपक्षी दल एकजुट होकर लोकतांत्रिक अधिकारों की बात उठा रहे हों।
उन्होंने इसकी तुलना कोविड लॉकडाउन के दौर से भी की, जब एक तरफ प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटने को मजबूर थे और दूसरी तरफ शहरी संपन्न तबके के कुछ लोग अपनी बालकनी में शराब के गिलास के साथ तस्वीरें साझा कर रहे थे और उसे ‘मच नीडेड ब्रेक’ तथा ‘#LockdownGoals’ बता रहे थे।
लेखक के मुताबिक, उस दौर और आज की स्थिति में एक फर्क जरूर है—उस समय ऐसे संपन्न लोग खुद को वंचित प्रवासी मजदूरों का प्रतिनिधि बताने का दावा नहीं कर रहे थे। लेकिन आज सवाल उन युवाओं से है जो खुद को जेन-जी की आवाज और प्रतिनिधि के रूप में पेश करते हैं।
राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने से ही निष्पक्षता क्यों खतरे में पड़ती है?
लेखक ने अभिजीत दीपके के निष्पक्ष पहचान वाले तर्क पर सबसे तीखा सवाल उठाया है। उनका कहना है कि किसी एक राजनीतिक दल के नेताओं के साथ मेलजोल रखने से अगर निष्पक्षता प्रभावित नहीं होती, तो राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने पर ही यह पहचान कैसे खतरे में पड़ जाती है?
क्या निष्पक्षता का पैमाना सभी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए एक जैसा है? क्या लोकतंत्र और मताधिकार से जुड़े मुद्दों पर समर्थन जताने के लिए भी राजनीतिक पहचान का डर जरूरी है?
बहस CJP की भूमिका और जवाबदेही पर
रामलीला मैदान की रैली में CJP के प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी ने संगठन की भूमिका, उसकी प्राथमिकताओं और उसकी घोषित निष्पक्षता को लेकर बहस छेड़ दी है। यह सही है कि जेन-जी की पूरी पीढ़ी को कुछ प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति के आधार पर नहीं आंका जा सकता। युवा बड़ी संख्या में रैली में मौजूद थे।
लेकिन जो संगठन युवाओं की आवाज बनने का दावा करता है, उससे यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि लोकतांत्रिक संकट के समय उसकी भूमिका क्या है। निष्पक्षता का अर्थ हर राजनीतिक दल से समान दूरी हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ अन्याय, अधिकारों के हनन या लोकतांत्रिक सवालों पर खामोशी नहीं होना चाहिए।
आखिर सवाल यही है—जब देश के युवा अपने मताधिकार और लोकतंत्र के लिए सड़कों पर उतर रहे हों, तब उनके प्रतिनिधि अपनी निष्पक्ष पहचान बचाने में व्यस्त रहें, तो उनकी जवाबदेही किसके प्रति है?



