राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | रांची/नई दिल्ली | 11 अगस्त 2026
झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे छात्रों का गुस्सा अब सड़क से विधानसभा तक पहुंच चुका है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे युवाओं ने 10 अगस्त को रांची में विधानसभा घेराव का प्रयास किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की, पानी की बौछार और आंसू गैस का इस्तेमाल किया और इसके बाद लाठीचार्ज की स्थिति बनी। कई प्रदर्शनकारी घायल हुए और कुछ को अस्पताल में भर्ती कराया गया। घटना के अगले दिन बीजेपी ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया, जबकि सत्तारूढ़ झामुमो ने इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया।
छात्रों का सवाल: हमारी मेहनत का हिसाब कौन देगा?
इस पूरे विवाद की जड़ राजनीति नहीं, बल्कि युवाओं का भविष्य है। झारखंड के छात्र लंबे समय से जेपीएससी और जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनकी मांगों में कथित अनियमितताओं की जांच, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और कुछ परीक्षाओं को रद्द करने जैसी मांगें शामिल हैं। आंदोलन 25 जुलाई से चल रहा है और 10 अगस्त को विधानसभा घेराव के बाद मामला और गंभीर हो गया।
एक युवा जब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है तो उसके पीछे केवल उसकी अपनी मेहनत नहीं होती। परिवार की कमाई, कई वर्षों का समय और भविष्य की उम्मीद भी लगी होती है। परीक्षा के बाद अगर पेपर, परिणाम या भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठ जाएं तो सबसे बड़ा नुकसान उस छात्र का होता है। इसलिए सरकार को छात्रों की शिकायतों को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानने के बजाय भर्ती व्यवस्था में भरोसे का संकट समझना होगा।
विधानसभा मार्च में बिगड़े हालात, बल प्रयोग पर उठे सवाल
10 अगस्त को रांची में बड़ी संख्या में छात्र विधानसभा की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए कई स्तरों पर बैरिकेड लगाए। हालात बिगड़ने के बाद पानी की बौछार और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया तथा बाद में लाठीचार्ज हुआ। प्रशासन और विपक्ष इस घटनाक्रम को अलग-अलग नजर से देख रहे हैं, लेकिन छात्रों के घायल होने और अस्पताल पहुंचने की बात सामने आने के बाद बल प्रयोग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब सरकार को साफ करना चाहिए कि पुलिस कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई, किस स्तर पर निर्णय लिया गया और क्या उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल पहले किया गया था। यदि प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा हुई थी तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कानून तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं; और प्रशासन को भी आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग की छूट नहीं दी जा सकती।
अस्पताल पहुंचे छात्र नेता, बढ़ा विवाद
छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो के अस्पताल में भर्ती होने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया। सीजेपी नेता अभिजीत डिपके ने अस्पताल में उनसे वीडियो कॉल पर बातचीत की और पुलिस कार्रवाई की निंदा की। सीजेपी का दावा है कि महतो पहले से नौ दिन की भूख हड़ताल पर थे और घटना के बाद उनकी हालत बिगड़ी। संगठन ने स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इन दावों की पुष्टि के लिए आधिकारिक मेडिकल और जांच रिपोर्ट का इंतजार जरूरी है।
बंद से गरमाई राजनीति, विधानसभा में भी हंगामा
पुलिस कार्रवाई के विरोध में बीजेपी ने 11 अगस्त को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया। कई स्थानों पर स्कूल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे और वाहनों की आवाजाही प्रभावित हुई। विधानसभा में भी विपक्षी बीजेपी विधायकों ने प्रदर्शन किया, जिसके कारण सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। सरकार की ओर से कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव ने प्रदर्शन के दौरान बीजेपी समर्थित तत्वों पर हिंसा का आरोप लगाया।
यानी छात्रों का आंदोलन अब पूरी तरह राजनीतिक टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। यही वह स्थिति है जिसमें असली मुद्दा पीछे छूटने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
राहुल गांधी और केजरीवाल का समर्थन, मुद्दा हुआ राष्ट्रीय
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ हिंसा की निंदा की और उनकी मांगों का समर्थन किया। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी छात्रों के समर्थन में सरकार से तत्काल समाधान निकालने की अपील की। इससे झारखंड का छात्र आंदोलन अब राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है।
लेकिन राजनीतिक समर्थन तभी सार्थक होगा जब वह छात्रों को वास्तविक समाधान दिलाने तक पहुंचे। केवल बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट युवाओं की समस्या हल नहीं कर सकते।
सरकार को अब तीन सवालों का जवाब देना चाहिए
पहला सवाल—भर्ती परीक्षाओं में जिन अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं, उनकी निष्पक्ष जांच कब होगी?
दूसरा—अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी और छात्रों को न्याय कब मिलेगा?
तीसरा—10 अगस्त की पुलिस कार्रवाई में बल प्रयोग की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच क्यों न कराई जाए?
इन सवालों के जवाब स्पष्ट और समयबद्ध तरीके से दिए जाने चाहिए। सरकार को यह समझना होगा कि युवाओं के बीच सबसे ज्यादा गुस्सा केवल एक घटना को लेकर नहीं है। गुस्सा उस अनिश्चितता को लेकर है जिसमें परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र यह नहीं जानता कि उसकी मेहनत का परिणाम आखिर कब और किस रूप में सामने आएगा।
CBI जांच की मांग पर भी सरकार को स्पष्ट रुख रखना होगा
छात्रों की ओर से भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच CBI से कराने की मांग उठ रही है। सरकार इस मांग को स्वीकार करती है या राज्य स्तर पर किसी स्वतंत्र जांच तंत्र को जिम्मेदारी देती है—इस पर स्पष्ट निर्णय होना चाहिए। लगातार जांच की मांग को टालते रहने से अविश्वास और बढ़ेगा।
जरूरत पड़ने पर परीक्षा से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड, प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों के CCTV, सर्वर लॉग, परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया और शिकायतों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जा सकती है। इससे आरोप और तथ्य अलग-अलग किए जा सकेंगे।
भर्ती कैलेंडर बने, तारीखें तय हों
झारखंड में युवाओं के लिए सबसे बड़ा सुधार यह हो सकता है कि सरकार एक वार्षिक भर्ती कैलेंडर जारी करे। किस पद की परीक्षा कब होगी, आवेदन कब होंगे, परीक्षा कब होगी, परिणाम कब आएगा और नियुक्ति कब तक होगी—इन सभी की समयसीमा पहले से घोषित होनी चाहिए।
अगर किसी कारण से तारीख बदलती है तो उसका कारण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे छात्रों को वर्षों तक परीक्षा और परिणाम के इंतजार में रहने की स्थिति से राहत मिलेगी।
पुलिस कार्रवाई की भी निष्पक्ष जांच जरूरी
10 अगस्त की घटना की जांच केवल यह तय करने के लिए नहीं होनी चाहिए कि छात्रों ने क्या किया। जांच में पुलिस की कार्रवाई भी उतनी ही निष्पक्षता से देखी जानी चाहिए। कौन-से आदेश दिए गए? भीड़ का व्यवहार कैसा था? क्या बल प्रयोग से पहले बातचीत और दूसरे विकल्प इस्तेमाल किए गए? कितने लोग घायल हुए? क्या किसी छात्र को गंभीर चोट आई?
अगर किसी पुलिसकर्मी या अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो कार्रवाई होनी चाहिए। अगर प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की है तो उसकी भी कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच होनी चाहिए।
न्याय तभी भरोसेमंद लगेगा जब जांच दोनों पक्षों को एक ही कसौटी पर रखे।
छात्रों को भी अपनी लड़ाई शांतिपूर्ण रखनी होगी
सरकार की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन छात्रों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। लोकतांत्रिक विरोध उनकी ताकत है। उसे हिंसा, तोड़फोड़ या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
छात्रों की सबसे बड़ी ताकत उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनकी वैध मांग और शांतिपूर्ण संघर्ष होना चाहिए। अगर आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा तो सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव भी ज्यादा प्रभावी होगा।
राजनीतिक दल छात्रों की आवाज को अपना हथियार न बनाएं
बीजेपी हो, कांग्रेस हो, झामुमो हो या कोई दूसरा दल—सभी राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि बेरोजगार और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं की परेशानी किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं है।
आज विपक्ष सरकार पर हमला करेगा, कल सत्ता बदल सकती है। लेकिन परीक्षा व्यवस्था और युवाओं का भविष्य लंबे समय तक चलता है। इसलिए इस मुद्दे को केवल सत्ता परिवर्तन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना छात्रों के साथ न्याय नहीं होगा।
अब सरकार के पास भरोसा लौटाने का मौका है
झारखंड सरकार चाहे तो इस संकट को टकराव से समाधान की दिशा में मोड़ सकती है। छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ तत्काल बैठक, भर्ती परीक्षाओं की स्वतंत्र समीक्षा, 10 अगस्त की घटना की निष्पक्ष जांच और समयबद्ध भर्ती कैलेंडर—इन चार कदमों से बातचीत की शुरुआत हो सकती है।
सरकार को यह संदेश देना होगा कि सवाल पूछने वाला छात्र सरकार का दुश्मन नहीं है। वह उसी व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए संघर्ष कर रहा है जिसे सरकार चलाती है।
सबसे बड़ा सवाल: लाठी से नहीं, भरोसे से चलेगा लोकतंत्र
झारखंड की सड़कों पर आज सिर्फ छात्र नहीं हैं। वहां उन परिवारों की उम्मीद भी है जिन्होंने अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए सालों तक सहारा दिया है। वहां उन युवाओं की बेचैनी है जिन्होंने रोजगार के लिए अपनी उम्र और समय लगाया है।
इसलिए इस पूरे विवाद का समाधान राजनीतिक नारों से नहीं निकलेगा। सरकार को जांच करनी होगी, दोषी मिले तो कार्रवाई करनी होगी और छात्रों की वास्तविक शिकायतों का समयबद्ध समाधान देना होगा।
लोकतंत्र में सरकार की ताकत पुलिस और प्रशासन से आती है, लेकिन उसकी असली मजबूती जनता के भरोसे से आती है।
झारखंड के युवाओं को लाठी नहीं—निष्पक्ष परीक्षा, समय पर भर्ती और अपने भविष्य का भरोसा चाहिए। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और सबसे जरूरी सच है।




