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चेन्नई टेस्ट की वो शाम… सचिन रोए तो पूरा देश रोया, 12 रन से हारकर भी अमर हुई 136 रन की पारी

खेल | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 25 सितंबर 2026

कुछ क्रिकेट मैच सिर्फ स्कोरकार्ड में दर्ज होते हैं, लेकिन कुछ मैच लोगों की यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। चेन्नई का वह टेस्ट भी ऐसा ही था। सामने पाकिस्तान था, दांव पर मुकाबला था और क्रीज पर सचिन तेंदुलकर। भारत को जीत के लिए 271 रन चाहिए थे। शुरुआत ऐसी हुई कि सिर्फ 7 रन पर 2 विकेट गिर गए। सदगोपन रमेश और VVS लक्ष्मण जल्दी पवेलियन लौट चुके थे। इसके बाद सचिन क्रीज पर आए और करोड़ों भारतीयों की उम्मीद एक बार फिर उनके बल्ले से जुड़ गई। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ घंटे भारतीय क्रिकेट की सबसे भावुक यादों में बदलने वाले हैं।

पाकिस्तान के पास वसीम अकरम, वकार यूनिस और सकलैन मुश्ताक जैसे गेंदबाज थे। चेन्नई की पिच पर चौथी पारी में 271 रन का लक्ष्य अपने आप में बड़ी चुनौती था। सचिन ने संभलकर शुरुआत की, लेकिन दूसरे छोर से विकेट गिरते रहे। राहुल द्रविड़, मोहम्मद अजहरुद्दीन और सौरव गांगुली भी ज्यादा देर उनका साथ नहीं दे सके। भारत 82 रन पर 5 विकेट गंवा चुका था। जो लक्ष्य शुरुआत में मुश्किल लग रहा था, अब लगभग असंभव दिखाई देने लगा था। लेकिन एक आदमी अब भी क्रीज पर खड़ा था—सचिन तेंदुलकर।

इसके बाद विकेटकीपर बल्लेबाज नयन मोंगिया क्रीज पर आए। उस दिन मोंगिया ने सचिन का ऐसा साथ दिया, जिसे भारतीय क्रिकेट कभी नहीं भूल सकता। दोनों ने मिलकर पारी को संभाला और भारत के स्कोर को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। सचिन ने भी अपना अंदाज बदला। जहां जरूरत थी वहां गेंद को सम्मान दिया और मौका मिलते ही गेंद को सीमा रेखा के पार पहुंचाया। मोंगिया ने भी पूरी हिम्मत से उनका साथ दिया। दोनों की साझेदारी ने मैच में फिर से भारत की उम्मीद जगा दी। 82 रन पर 5 विकेट से शुरू हुई पारी 200 के पार पहुंच चुकी थी और अब वह जीत, जो कुछ देर पहले असंभव लग रही थी, आंखों के सामने दिखाई देने लगी थी।

लेकिन क्रिकेट में उम्मीद और दर्द के बीच कभी-कभी सिर्फ एक गेंद का फासला होता है। मोंगिया 50 रन के आसपास पहुंचने के बाद आउट हो गए और भारत को एक बार फिर बड़ा झटका लगा। दूसरी तरफ सचिन की हालत भी खराब हो चुकी थी। कमर का दर्द इतना बढ़ गया था कि मैदान पर खड़े रहना मुश्किल हो रहा था। दर्द की दवा लेने और चिकित्सकीय मदद के बाद उनकी कमर पर कसकर एक सपोर्ट बेल्ट बांधी गई। वह बेल्ट उनकी कमर के चारों तरफ इतनी मजबूती से बंधी थी कि देखने वालों को वह टायर की तरह जकड़ी हुई लग रही थी। दर्द में भी सचिन ने मैदान छोड़ने के बजाय दोबारा क्रीज पर लौटने का फैसला किया। स्टेडियम में बैठे दर्शकों ने उन्हें इस हालत में फिर बल्लेबाजी करते देखा तो पूरा माहौल भावुक हो गया।

सचिन ने इसके बाद जैसे दर्द को ही अपने बल्ले से जवाब देना शुरू कर दिया। शरीर साथ नहीं दे रहा था, लेकिन बल्ला लगातार भारत की उम्मीद बचाए हुए था। एक-एक रन के साथ जीत करीब आती जा रही थी। चेन्नई के स्टेडियम में बैठे दर्शकों को लगने लगा था कि सचिन आज फिर इतिहास लिखने वाले हैं। रेडियो से कमेंट्री सुन रहे करोड़ों भारतीय भी अपनी जगह से हिलना नहीं चाहते थे। उस वक्त हर किसी की नजर सिर्फ एक नाम पर थी—सचिन।

भारत और जीत के बीच अब सिर्फ 17 रन का फासला रह गया था। सचिन ने लगातार दो चौके लगाए और अचानक पूरा माहौल भारत की जीत के भरोसे से भर गया। लेकिन अगली गेंद पर सकलैन मुश्ताक के खिलाफ बड़ा शॉट खेलने की कोशिश में सचिन 136 रन बनाकर आउट हो गए। जिस स्टेडियम में कुछ सेकंड पहले जीत की उम्मीद से आवाजें गूंज रही थीं, वहां अचानक सन्नाटा छा गया। पाकिस्तान के खिलाड़ियों का जश्न सुनाई दे रहा था और दूसरी तरफ सचिन भारी कदमों से पवेलियन की ओर लौट रहे थे।

वह सिर्फ एक बल्लेबाज के आउट होने का पल नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे करोड़ों भारतीयों की उम्मीद उसी गेंद के साथ मैदान पर गिर गई हो। सचिन की आंखों में दर्द था। स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की आंखें भी नम थीं। रेडियो पर कमेंट्री सुन रहे लोगों के लिए भी वह पल आसान नहीं था। जो खिलाड़ी वर्षों से अपने बल्ले से भारतीयों के चेहरे पर मुस्कान लाता आया था, उस दिन वही खिलाड़ी करोड़ों लोगों की आंखों में आंसू छोड़कर पवेलियन लौट रहा था।

भारत आखिरकार यह मुकाबला 12 रन से हार गया। पाकिस्तान ने मैच जीत लिया, लेकिन सचिन की 136 रन की पारी हारकर भी भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे यादगार पारियों में शामिल हो गई। इस पारी की खासियत सिर्फ रन नहीं थे। इसमें लगातार गिरते विकेटों के बीच संघर्ष था, नयन मोंगिया के साथ साझेदारी थी, कमर के असहनीय दर्द के बावजूद क्रीज पर लौटने का साहस था और आखिरी समय तक भारत को जीत के करीब ले जाने की कोशिश थी।

सचिन के मैन ऑफ द मैच पुरस्कार को लेकर भी इस मुकाबले से जुड़ी एक भावुक कहानी लंबे समय से क्रिकेट प्रेमियों के बीच सुनाई जाती है। कहा जाता है कि पुरस्कार की घोषणा के समय सचिन ड्रेसिंग रूम में बेहद भावुक थे और खुद को इस हार के लिए जिम्मेदार मान रहे थे। उन्हें मैदान पर जाकर पुरस्कार लेने के लिए मनाने की कोशिश की गई। इस किस्से के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं, इसलिए इसे एक प्रचलित क्रिकेट स्मृति के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन सचिन की उस पारी का दर्द और मैच हारने के बाद उनकी निराशा क्रिकेट इतिहास का दर्ज हिस्सा है।

चेन्नई की वह शाम इसलिए याद नहीं है कि भारत 12 रन से हार गया था। वह इसलिए याद है क्योंकि उस दिन सचिन ने दिखाया कि महान पारी हमेशा जीत के साथ खत्म नहीं होती। कभी-कभी एक बल्लेबाज हारकर भी लोगों के दिलों में जीत जाता है। 136 रन स्कोरकार्ड पर सिर्फ एक आंकड़ा है, लेकिन उन 136 रनों में दर्द था, संघर्ष था, उम्मीद थी और आखिरी गेंद तक देश को जीत दिलाने की कोशिश थी। सचिन उस दिन पवेलियन लौटे तो उनकी आंखों में आंसू थे… स्टेडियम में बैठे लोगों की आंखों में भी… और रेडियो से उनकी कहानी सुन रहे करोड़ों भारतीयों के दिल भी भारी थे। शायद यही वजह है कि चेन्नई टेस्ट की वह पारी आज भी सचिन के करियर की सबसे भावुक और यादगार पारियों में गिनी जाती है।

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