राष्ट्रीय/ मीडिया | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अक्टूबर 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के डिजिटल निजता कानून को अब मीडिया संस्थानों की कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के स्वामित्व वाली कंपनियों से जुड़े मीडिया संस्थानों सहित 21 समाचार प्रकाशकों ने इस कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। प्रकाशकों का कहना है कि कानून के मौजूदा प्रावधान खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं और पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा कर सकते हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 6 अक्टूबर को दायर की गई यह याचिका 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। यह मामला सरकार के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून को लेकर प्रेस की स्वतंत्रता और निजता की सुरक्षा के बीच टकराव को सामने लाता है।
निजता कानून पर मीडिया संस्थानों की आपत्ति
केंद्र सरकार ने डिजिटल दुनिया में लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा के उद्देश्य से डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून लागू करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इस कानून के तहत डिजिटल मंचों और संबंधित संस्थाओं पर व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल और सुरक्षा को लेकर अनुपालन की जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं।
लेकिन याचिकाकर्ता मीडिया संस्थानों की आपत्ति है कि समाचार संगठनों को पर्याप्त छूट नहीं दी गई है। उनका तर्क है कि पत्रकारिता के काम पर भी ऐसे नियम लागू होने से समाचार जुटाने, दस्तावेजों की जांच करने और संवेदनशील मामलों की पड़ताल करने में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
पत्रकारों के सूत्रों की गोपनीयता पर चिंता
खोजी पत्रकारिता में कई बार पत्रकार ऐसे लोगों से जानकारी प्राप्त करते हैं, जिनकी पहचान सार्वजनिक होने पर उनकी सुरक्षा या नौकरी खतरे में पड़ सकती है। भ्रष्टाचार, सरकारी कामकाज में अनियमितताओं और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की जांच में गोपनीय स्रोतों की भूमिका अहम होती है।
याचिकाकर्ताओं की चिंता है कि डेटा कानून के प्रावधानों के जरिए सरकार पत्रकारों के स्रोतों तक पहुंच सकती है। उनके अनुसार, इससे स्रोतों की गोपनीयता प्रभावित होने और भविष्य में लोग पत्रकारों से जानकारी साझा करने में हिचकने का खतरा है।
हालांकि, यह याचिकाकर्ताओं की दलील है। अदालत में इन आशंकाओं पर सुनवाई होनी बाकी है और कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर अंतिम फैसला नहीं आया है।
अंबानी और अडानी से जुड़े मीडिया संस्थान भी शामिल
इस मुकदमे में 21 समाचार प्रकाशक शामिल हैं। इनमें देश के दो बड़े कारोबारी समूहों—मुकेश अंबानी और गौतम अडानी—के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थानों से जुड़ी कंपनियां भी हैं।
यह तथ्य इस मामले को खास बनाता है, क्योंकि डिजिटल निजता कानून को लेकर अलग-अलग मीडिया संस्थानों ने एक साझा कानूनी चुनौती दी है। अब अदालत के सामने यह सवाल होगा कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों और स्वतंत्र पत्रकारिता की जरूरतों के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
निजता की सुरक्षा बनाम प्रेस की स्वतंत्रता
डिजिटल युग में नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण जरूरत है। सोशल मीडिया मंचों, तकनीकी कंपनियों और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग की आशंकाएं भी बढ़ी हैं। सरकार का कानून इसी तरह की चिंताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
दूसरी ओर, प्रेस की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। पत्रकारों को सार्वजनिक हित के मामलों की जांच करने और सत्ता से जुड़े सवाल पूछने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यदि किसी कानून के प्रावधानों से पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों या खोजी रिपोर्टिंग पर असर पड़ने की आशंका है, तो उसका न्यायिक परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।
27 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर
अब इस मामले में 27 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। अदालत में मीडिया संस्थानों की दलीलों, कानून के प्रावधानों और सरकार के पक्ष के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
इस मामले का नतीजा केवल मीडिया कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता। इससे यह तय करने में मदद मिल सकती है कि डिजिटल निजता की रक्षा करते हुए खोजी पत्रकारिता और पत्रकारों के स्रोतों की गोपनीयता को किस तरह सुरक्षित रखा जाए।
डिजिटल निजता और प्रेस की स्वतंत्रता, दोनों लोकतंत्र के लिए अहम हैं। चुनौती यह है कि नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित हो, लेकिन सार्वजनिक हित में सवाल पूछने और सच सामने लाने वाली पत्रकारिता भी अनावश्यक बाधाओं से मुक्त रहे।



