मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 26 अक्टूबर 2026
बॉलीवुड में कई सितारे अपनी फिल्मों और किरदारों के लिए पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी निजी जिंदगी के फैसले समाज की सोच पर सवाल खड़े कर देते हैं। अभिनेत्री रवीना टंडन की कहानी भी ऐसी ही है। 1990 के दशक में बड़े पर्दे पर अपनी लोकप्रियता का शिखर छूने वाली रवीना ने महज 21 साल की उम्र में ऐसा फैसला लिया, जिसने उस दौर में लोगों को चौंका दिया। उन्होंने शादी से पहले दो बच्चियों को गोद लेकर उन्हें अपना परिवार बनाया। उस समय जब समाज में महिलाओं की जिंदगी को लेकर कई तरह की पारंपरिक धारणाएं हावी थीं, रवीना ने अपने फैसले को प्राथमिकता दी।
आज रवीना चार बच्चों की मां हैं और उनके परिवार की कहानी मातृत्व, जिम्मेदारी और सामाजिक सोच से जुड़े कई सवालों को सामने लाती है। अभिनेत्री के जन्मदिन के मौके पर उनकी जिंदगी के उस पहलू पर चर्चा फिर प्रासंगिक हो जाती है, जिसमें उन्होंने रिश्तों को सामाजिक मान्यताओं से ऊपर रखा।
21 साल की उम्र में लिया बड़ा फैसला
रवीना टंडन ने अपनी रिश्तेदार की दो बेटियों पूजा और छाया को गोद लिया था। उस समय पूजा की उम्र आठ साल और छाया की उम्र 11 साल थी। इतनी कम उम्र में दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाने का उनका निर्णय असामान्य माना गया। फिल्मी करियर के शुरुआती दौर में, जब अधिकांश युवा कलाकार अपने काम और लोकप्रियता को आगे बढ़ाने पर ध्यान देते हैं, रवीना ने दो बच्चियों के भविष्य को अपने जीवन का अहम हिस्सा बनाया।
उनका यह कदम केवल बच्चों को अपने घर में जगह देने तक सीमित नहीं था। गोद लेने का अर्थ उनके लिए उन बच्चियों को परिवार, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा देना भी था। हालांकि, उस दौर में शादी से पहले मां बनने के उनके फैसले को लेकर सवाल भी उठे। रवीना ने बाद में अलग-अलग मौकों पर बताया कि उन्हें अपने इस निर्णय के बाद मीडिया की अटकलों और सामाजिक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।
‘इससे शादी कौन करेगा?’—समाज की सोच पर सवाल
रवीना के फैसले पर उठे सवाल उस मानसिकता को उजागर करते हैं, जिसमें किसी महिला की शादी को उसकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मान लिया जाता है। एक महिला यदि शादी से पहले बच्चों की जिम्मेदारी उठाती है, तो उसके निर्णय को लेकर उसकी अपनी पसंद और क्षमता के बजाय यह सवाल उठाया जाने लगता है कि इससे उसके विवाह की संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा।
रवीना ने बताया था कि उनके फैसले के बाद ऐसी बातें कही गईं कि उनसे शादी कौन करेगा। यह प्रतिक्रिया इस बात की ओर इशारा करती है कि समाज में महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णयों को आजादी से स्वीकार करने के बजाय उन्हें अक्सर पारंपरिक अपेक्षाओं की कसौटी पर परखा जाता है।
लेकिन रवीना ने अपने निर्णय को लेकर पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने पूजा और छाया के साथ अपने रिश्ते को समय दिया और उन्हें परिवार का हिस्सा बनाया। उनकी कहानी इस बात को सामने रखती है कि मातृत्व केवल जैविक संबंधों से तय नहीं होता, बल्कि देखभाल, जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव भी उसे आकार देते हैं।
46 की उम्र में बनीं दादी
रवीना की जिंदगी में एक और खास पड़ाव तब आया, जब 46 साल की उम्र में वह दादी बनीं। यह उनके परिवार के विस्तार और बच्चों के साथ उनके रिश्ते के नए चरण का प्रतीक था। जिस उम्र में उन्होंने दो बच्चियों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली थी, उसी जीवन यात्रा में आगे चलकर उन्होंने अगली पीढ़ी के साथ भी नया रिश्ता बनाया।
उनकी कहानी की खासियत यही है कि इसमें परिवार के बनने और बढ़ने का एक पारंपरिक ढांचा ही नहीं, बल्कि अलग-अलग रिश्तों को अपनाने की क्षमता भी दिखाई देती है। पूजा और छाया के अलावा रवीना के दो बच्चे रणबीर और राशा भी हैं। अभिनेत्री ने अपने चारों बच्चों के साथ रिश्ते को लेकर सार्वजनिक रूप से बात की है।
चारों बच्चों के साथ खास रिश्ता
रवीना के परिवार में चारों बच्चों की अपनी जगह है। पूजा और छाया को गोद लेने के उनके शुरुआती फैसले ने परिवार की नींव रखी, जबकि बाद में रणबीर और राशा के आने से परिवार का दायरा और बढ़ा। अभिनेत्री की जिंदगी का यह पक्ष बताता है कि परिवार केवल एक तय ढांचे का नाम नहीं है। उसमें अपनापन, भरोसा और जिम्मेदारी की भूमिका सबसे अहम होती है।
फिल्मी दुनिया में व्यस्त करियर के साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं होता। रवीना ने अपने जीवन में दोनों पहलुओं को जगह दी। उनके फैसले पर शुरुआती दौर में सवाल उठे, लेकिन समय के साथ उनकी पारिवारिक यात्रा भी उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बन गई।
एक फैसला, जो आज भी मायने रखता है
रवीना टंडन की कहानी को केवल एक अभिनेत्री के निजी जीवन की घटना मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस सामाजिक सोच पर भी सवाल उठाती है, जिसमें महिलाओं के फैसलों को अक्सर उनकी शादी, उम्र और पारंपरिक भूमिकाओं के आधार पर परखा जाता है।
21 साल की उम्र में दो बच्चियों को गोद लेना और बाद में चार बच्चों के साथ परिवार का सफर आगे बढ़ाना रवीना की जिंदगी के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनके अनुभव यह याद दिलाते हैं कि किसी महिला की जिंदगी का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि वह समाज की तय की हुई समय-सीमा के अनुसार शादी करती है या मां बनती है।
रवीना की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि परिवार रिश्तों को अपनाने, निभाने और जिम्मेदारी उठाने से बनता है। समाज सवाल पूछ सकता है, लेकिन किसी की जिंदगी का रास्ता चुनने का अधिकार आखिरकार उसी व्यक्ति के पास होना चाहिए।



