अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली / ग्रेट निकोबार | 4 जून 2026
हिंद महासागर में भारत की नई रणनीतिक महत्वाकांक्षा
भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक भू-राजनीति और पर्यावरणीय चिंताओं के केंद्र में आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार यहां लगभग 11 अरब डॉलर की लागत से एक विशाल विकास परियोजना पर काम कर रही है, जिसके तहत ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक-सैन्य हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र, पर्यटन अवसंरचना और लगभग साढ़े तीन लाख लोगों के लिए नया शहर बसाने की योजना बनाई गई है। सरकार का दावा है कि यह परियोजना भारत की समुद्री शक्ति, आर्थिक क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई ऊंचाई देगी।
मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर भारत की चौकी
ग्रेट निकोबार द्वीप भौगोलिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के बेहद करीब है, जहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति गुजरती है। चीन के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात और दो-तिहाई समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है। यही कारण है कि कई रणनीतिक विशेषज्ञ ग्रेट निकोबार को भारत के लिए वही महत्व देते हैं जो ईरान के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का है।
चीन पर नजर रखने का सामरिक अवसर
पूर्व नौसेना उपप्रमुख एडमिरल शेखर सिन्हा सहित कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार भारत को हिंद महासागर और मलक्का क्षेत्र में गतिविधियों की निगरानी करने की महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान कर सकता है। यहां विकसित बंदरगाह और सैन्य सुविधाएं भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को मजबूत करेंगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को बढ़ाएंगी। सरकार भी अब खुलकर स्वीकार कर रही है कि यह परियोजना केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।
आर्थिक परियोजना से सामरिक परियोजना तक का सफर
दिलचस्प बात यह है कि जब इस परियोजना की शुरुआत हुई थी, तब इसे मुख्य रूप से सिंगापुर, कोलंबो और हांगकांग जैसे वैश्विक समुद्री व्यापार केंद्रों की तर्ज पर विकसित करने की योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन बढ़ते पर्यावरणीय विरोध और स्थानीय समुदायों की नाराजगी के बाद सरकार ने इसके सामरिक महत्व को अधिक प्रमुखता से सामने रखना शुरू कर दिया। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर चल रही बहस ने भी ग्रेट निकोबार की रणनीतिक प्रासंगिकता को नई मजबूती दी है।
आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर संकट
परियोजना का सबसे बड़ा विरोध स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरणविदों की ओर से हो रहा है। ग्रेट निकोबार में शोंपेन और निकोबारी जैसे अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समुदाय निवास करते हैं, जिनकी जीवनशैली और संस्कृति सदियों से इस द्वीप के प्राकृतिक परिवेश से जुड़ी रही है। प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग 166 वर्ग किलोमीटर भूमि अधिग्रहित की जानी है, जिसमें आदिवासी आरक्षित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा शामिल है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह परियोजना शोंपेन जनजाति के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
पर्यावरण पर अभूतपूर्व प्रभाव की आशंका
भारत सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि इस परियोजना के लिए लगभग 9.64 लाख पेड़ों की कटाई करनी पड़ेगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। विशाल बंदरगाह, हवाई अड्डे और शहरीकरण के कारण समुद्री जीवन, वन्यजीव और स्थानीय पारिस्थितिकी पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। आलोचकों का कहना है कि विकास के नाम पर प्रकृति और स्थानीय समुदायों की कीमत चुकाई जा रही है।
भूकंप और सुनामी का भी बड़ा खतरा
ग्रेट निकोबार भूकंपीय क्षेत्र-5 में स्थित है, जिसे भारत का सबसे संवेदनशील भूकंप क्षेत्र माना जाता है। 2004 की विनाशकारी सुनामी में इस द्वीप के कई हिस्से स्थायी रूप से समुद्र में धंस गए थे। इंदिरा प्वाइंट लाइटहाउस के आसपास का क्षेत्र लगभग 4.25 मीटर नीचे चला गया था। ऐसे में आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के समय कितना सुरक्षित रहेगा।
राहुल गांधी ने बताया ‘विकास के नाम पर विनाश’
हाल ही में ग्रेट निकोबार का दौरा करने वाले विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना को देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़े अपराधों में से एक बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विकास की भाषा में विनाश को छिपाने की कोशिश कर रही है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी कहना है कि उन्हें पर्याप्त परामर्श के बिना उनकी जमीनों और संसाधनों से वंचित किया जा रहा है।
क्या भारत मलक्का को नियंत्रित कर सकता है?
कुछ रणनीतिक विश्लेषकों ने यह तर्क दिया है कि भविष्य में यदि चीन के साथ तनाव बढ़ता है तो भारत ग्रेट निकोबार की स्थिति का उपयोग मलक्का जलडमरूमध्य पर प्रभाव बढ़ाने के लिए कर सकता है। हालांकि नौसैनिक विशेषज्ञ इस धारणा को अतिरंजित मानते हैं। उनका कहना है कि मलक्का जलडमरूमध्य इंडोनेशिया के अधिकार क्षेत्र में आता है और किसी भी देश के लिए वहां स्थायी नाकाबंदी कायम रखना बेहद कठिन होगा। फिर भी यह द्वीप भारत को समुद्री गतिविधियों पर निगरानी और रणनीतिक बढ़त अवश्य प्रदान कर सकता है।
विकास बनाम संरक्षण की नई बहस
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के सामने खड़े उस बड़े प्रश्न का प्रतीक बन गई है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकार एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। सरकार इसे भारत के भविष्य का सामरिक निवेश मानती है, जबकि विरोधी इसे पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से विनाशकारी परियोजना बता रहे हैं।
भारत का सामरिक सपना या पर्यावरणीय जोखिम?
ग्रेट निकोबार द्वीप आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यह परियोजना भारत को हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नई शक्ति दे सकती है। लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण, स्थानीय समुदायों और जैव-विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं भी बनी हुई हैं। इसलिए यह केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की विकास और सुरक्षा नीति की दिशा तय करने वाला बड़ा परीक्षण भी बन चुकी है।




