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पश्चिम का नया सहारा चीन: आर्थिक मजबूरियों ने पिघलाई ब्रिटेन-बीजिंग रिश्तों की बर्फ

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग / लंदन | 4 जून 2026

आर्थिक मजबूरियां, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बदलते वैश्विक समीकरण ब्रिटेन और चीन को फिर ला रहे हैं करीब, लेकिन अविश्वास की दीवारें अभी भी कायम हैं।

आठ साल बाद शुरू हुआ रिश्तों का नया अध्याय

करीब आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ब्रिटेन और चीन अपने संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की जनवरी 2026 की चीन यात्रा के बाद अब विदेश मंत्री यवेट कूपर भी बीजिंग पहुंची हैं। दोनों देशों के बीच वर्षों से चले आ रहे तनाव और अविश्वास को कम करने के लिए यह दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ब्रिटेन की लेबर सरकार चीन के साथ व्यापार, निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही है। हालिया दौर की बातचीत में दोनों देशों ने यह स्वीकार किया है कि वैश्विक चुनौतियों के बीच संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाना समय की आवश्यकता है।

यवेट कूपर का संदेश: मतभेद रहेंगे, संवाद भी रहेगा

बीजिंग में चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग और विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात के दौरान ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर ने स्पष्ट कहा कि दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन उन्हें सम्मान और स्पष्टता के साथ बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है। उन्होंने ईरान संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा और अफ्रीका में फैल रहे इबोला संक्रमण जैसे वैश्विक मुद्दों पर साझा सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। कूपर का मानना है कि एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रमुख शक्तियों के बीच सहयोग अनिवार्य है।

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पश्चिम की मजबूरी बनता जा रहा है चीन

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के प्रति पश्चिम का बदला हुआ रुख केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं बल्कि आर्थिक वास्तविकता का परिणाम है। आज दुनिया की अधिकांश सप्लाई चेन चीन से जुड़ी हुई हैं। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, चिकित्सा तकनीक, दुर्लभ खनिज और हरित ऊर्जा उपकरणों के उत्पादन में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है। ऐसे में ब्रिटेन समेत कई पश्चिमी देशों के लिए चीन से दूरी बनाकर रखना व्यावहारिक नहीं रह गया है। यही कारण है कि वैश्विक तनावों के बावजूद पश्चिमी देश बीजिंग के साथ रिश्तों को स्थिर और संतुलित बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रम्प युग ने बदल दिए वैश्विक समीकरण

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने भी ब्रिटेन और यूरोप को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर किया है। ट्रम्प प्रशासन की अप्रत्याशित विदेश नीति, व्यापारिक टकराव और सहयोगी देशों के प्रति सख्त रुख ने यूरोपीय देशों को वैकल्पिक साझेदारों की तलाश करने के लिए प्रेरित किया है। ब्रिटेन समझता है कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, ऊर्जा संकट और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के दौर में चीन के साथ व्यावहारिक सहयोग उसकी आर्थिक जरूरत भी है और रणनीतिक आवश्यकता भी।

व्यापार और निवेश के नए अवसर

जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री स्टार्मर की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई थी। उसी दौरान ब्रिटिश फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने चीन में लगभग 15 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। इसके अलावा दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रक्रियाओं को आसान बनाने और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई नए समझौते भी हुए। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ब्रिटेन इसे अपने आर्थिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देख रहा है।

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हरित ऊर्जा और AI सहयोग बना नया केंद्र

ब्रिटेन की रणनीति केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं है। चीन आज हरित ऊर्जा, सौर तकनीक, बैटरी उत्पादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में दुनिया के सबसे अग्रणी देशों में गिना जाता है। विदेश मंत्री कूपर का शेनझेन दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है, जहां विज्ञान, नवाचार और तकनीकी सहयोग पर विशेष चर्चा हो रही है। ब्रिटेन का मानना है कि चीन की तकनीकी क्षमता उसके हरित ऊर्जा परिवर्तन और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकती है।

विश्वास की कमी अभी भी बड़ी चुनौती

हालांकि आर्थिक सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ब्रिटेन में चीनी जासूसी को लेकर कई बार गंभीर आरोप लगे हैं। हाल के वर्षों में कुछ व्यक्तियों को चीन के लिए जासूसी करने के आरोप में दोषी भी ठहराया गया। इसी कारण ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरत रहा है। चीन द्वारा लंदन में विशाल दूतावास परिसर स्थापित करने की योजना को लेकर भी ब्रिटेन में सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

मानवाधिकार और यूक्रेन युद्ध पर मतभेद कायम

ब्रिटेन लगातार हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक नेता जिमी लाई के मामले और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों को उठाता रहा है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध में चीन के रुख को लेकर भी लंदन में चिंताएं बनी हुई हैं। ब्रिटिश नेतृत्व चाहता है कि चीन रूस पर अधिक प्रभाव डाले और संघर्ष समाप्त करने में रचनात्मक भूमिका निभाए। वहीं चीन इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए खुद को संतुलित और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।

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बदलती दुनिया में सहयोग की नई राजनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि आज की वैश्विक राजनीति में न तो पश्चिम चीन के बिना आगे बढ़ सकता है और न ही चीन पश्चिमी बाजारों और वित्तीय तंत्र से पूरी तरह अलग रह सकता है। यही कारण है कि दोनों पक्ष अपने मतभेदों को नियंत्रित रखते हुए सहयोग के नए रास्ते तलाश रहे हैं। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक अनिश्चितताओं और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रिटेन और चीन के रिश्तों में आ रही यह गर्माहट आने वाले वर्षों की विश्व राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष: बर्फ पिघल रही है, लेकिन पूरी तरह नहीं

ब्रिटेन और चीन के बीच शुरू हुई यह नई कूटनीतिक पहल केवल द्विपक्षीय संबंधों की कहानी नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक भी है। आर्थिक जरूरतें, तकनीकी सहयोग और भू-राजनीतिक चुनौतियां दोनों देशों को करीब ला रही हैं। हालांकि सुरक्षा, मानवाधिकार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे अब भी मौजूद हैं, लेकिन दोनों देशों ने यह समझ लिया है कि टकराव की तुलना में संवाद और सहयोग अधिक लाभकारी रास्ता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि दुनिया की बदलती राजनीति में चीन और पश्चिम दोनों एक-दूसरे को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं।

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