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अजब देश, गजब फरमान! वोट चोरी पर सवाल उठाओ तो रोक, 14 करोड़ वोट कटने पर चुप्पी क्यों?

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, SIR के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों पर कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की परीक्षा—क्या अब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना भी गुनाह बनता जा रहा है?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026

अजब देश, गजब फरमान! यहां चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने को लेकर बहस हो रही है, विपक्ष चुनाव आयोग की भूमिका पर जवाब मांग रहा है और नागरिक संगठन विरोध दर्ज करा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब जनता अपने वोट, अपने अधिकार और अपने लोकतंत्र की बात करने के लिए सड़कों पर उतरती है, तो उसके सामने संवाद के दरवाजे खुलते हैं या पुलिस की कार्रवाई?

एक तरफ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ विरोध करने वालों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है या ऐसा करने पर उन्हें रोकने की कोशिश की जाएगी?

‘वोट चोर’ के नारे और 14 करोड़ वोटों का सवाल

विपक्ष और चुनावी प्रक्रिया की आलोचना करने वाले समूह मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक बहस में लगभग 14 करोड़ वोट काटे जाने का दावा भी सामने आया है। इस दावे की पुष्टि के लिए देशभर में हटाए गए नामों का आधिकारिक, राज्यवार और निर्वाचन क्षेत्रवार विवरण देखना जरूरी है। लेकिन एक बुनियादी बात स्पष्ट है—यदि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों हुआ, किस प्रक्रिया के तहत हुआ और प्रभावित नागरिकों को अपना नाम दोबारा जुड़वाने का कितना अवसर मिला।

मतदाता सूची में सुधार चुनावी व्यवस्था का जरूरी हिस्सा हो सकता है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियों को ठीक करना और गलत विवरणों को सुधारना किसी भी निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है। लेकिन इसी प्रक्रिया में यदि किसी योग्य मतदाता का नाम हट जाता है, तो उसका नुकसान केवल कागज पर दर्ज एक प्रविष्टि का नुकसान नहीं है। यह उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए सवाल केवल नाम काटने की संख्या का नहीं है। असली सवाल है कि नाम क्यों काटे गए, किन दस्तावेजों के आधार पर काटे गए, नागरिकों को इसकी सूचना कैसे मिली और शिकायत करने पर उनकी सुनवाई किस तरह हुई।

चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। पारदर्शिता से संस्था की विश्वसनीयता बढ़ती है, जबकि अस्पष्टता संदेह को जन्म देती है।

सवाल पूछने वालों को हिरासत में क्यों लिया जा रहा है?

23 अक्टूबर को दिल्ली में SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। ‘पीपल अगेंस्ट SIR’ की दिल्ली समन्वय समिति ने इस मार्च का आह्वान किया था। प्रदर्शन में माकपा नेता वृंदा करात, CPI के पी. संदोश और महिला तथा छात्र संगठनों के सदस्य भी शामिल हुए।

प्रदर्शनकारी गोल डाकखाना के पास एकत्र हुए। उनके हाथों में राष्ट्रीय ध्वज और बैनर थे। वे मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

अब सवाल है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों के साथ क्या व्यवहार किया गया? उन्हें हिरासत में लेने की क्या वजह बताई गई? क्या उन्हें अपना विरोध दर्ज कराने का उचित अवसर दिया गया? क्या पुलिस की कार्रवाई आवश्यक और अनुपातिक थी?

इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। केवल हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या बता देना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई और कानून के तहत उसका आधार क्या था।

लोकतंत्र में विरोध कोई असामान्य घटना नहीं है। सरकार की नीतियों, चुनाव आयोग के फैसलों और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज से असहमति जताना नागरिक जीवन का हिस्सा है। यदि किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन होता है, तो कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन शांतिपूर्ण असहमति को दबाने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।

नेहा बोरा का मामला और ‘पीस बॉन्ड’ का सवाल

इसी दिन दिल्ली हाईकोर्ट से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी राहत नहीं मिली। उन्होंने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी ‘पीस बॉन्ड’ नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में उनसे पूछा गया था कि जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उनसे बांड भरने को क्यों न कहा जाए।

हाईकोर्ट ने इस चरण पर उनकी याचिका खारिज कर दी। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में अदालत के विस्तृत आदेश और याचिका खारिज करने के कारणों का पूरा विवरण सामने नहीं आया है।

यहां भी मूल सवाल कानून और नागरिक स्वतंत्रता के संतुलन का है। शांति बनाए रखने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जाता है, यह उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ जारी नोटिस अनुचित है, तो उसे अदालत जाने का अधिकार है। अदालत का फैसला अपनी जगह है, लेकिन सार्वजनिक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल असहमति को अनावश्यक रूप से सीमित करने के लिए न हो।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं

लोकतंत्र का अर्थ केवल हर पांच साल में मतदान कराना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि मतदाता का नाम सूची में हो, उसका वोट सुरक्षित हो, चुनावी संस्थाएं निष्पक्ष दिखाई दें और नागरिक बिना भय के सवाल पूछ सकें।

चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी केवल चुनाव संपन्न कराना नहीं, बल्कि जनता का भरोसा बनाए रखना भी है। जब मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठते हैं, तो उन सवालों का जवाब आंकड़ों, दस्तावेजों और स्पष्ट प्रक्रिया के माध्यम से दिया जाना चाहिए। विपक्ष की हर बात को सही मान लेना जरूरी नहीं, लेकिन हर सवाल को राजनीतिक शोर कहकर खारिज करना भी उचित नहीं।

इसी तरह विपक्ष और प्रदर्शनकारी संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने दावों को प्रमाणों के साथ सामने रखें। यदि 14 करोड़ नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि आंकड़ा किस अवधि, किन राज्यों और किस तरह की प्रविष्टियों से संबंधित है। गलत या अधूरी जानकारी लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करती है। लेकिन दावे की जांच का जवाब दावे को दबाना नहीं, बल्कि सही आंकड़े सार्वजनिक करना है।

जनता को जवाब चाहिए, चुप्पी नहीं

आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या देश में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों का जवाब पारदर्शिता से दिया जाएगा या सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जाएगा?

यदि मतदाता सूची में सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो चुनाव आयोग को विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। यदि किसी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे सुधारने की सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है, तो कार्रवाई का आधार स्पष्ट होना चाहिए। और यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो उसे न्याय पाने का अवसर मिलना चाहिए।

‘अजब देश, गजब फरमान’ का सवाल इसी विरोधाभास से पैदा होता है—मतदाता अपने वोट की चिंता करे तो उसे जवाब मिले, न कि केवल आदेश; नागरिक सवाल पूछे तो उसे तर्क मिले, न कि केवल रोक; और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर संदेह उठे तो संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आगे आएं।

क्योंकि लोकतंत्र में वोट केवल एक निशान नहीं, नागरिक की आवाज है। मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं, नागरिक के राजनीतिक अस्तित्व का दस्तावेज है। और विरोध केवल नारों का शोर नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का एक संवैधानिक तरीका है।

अगर चुनाव निष्पक्ष हैं, तो सवालों से डर कैसा? अगर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो आंकड़े सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट कैसी? और अगर लोकतंत्र मजबूत है, तो शांतिपूर्ण विरोध को संदेह की नजर से देखने की जरूरत ही क्यों?

वोट की रक्षा करना लोकतंत्र की रक्षा करना है। सवालों का जवाब देना संस्थाओं की जिम्मेदारी है। और जनता की आवाज सुनना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली शर्त है।

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