राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026
भारत में छात्र आंदोलन की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब विरोध सिर्फ विश्वविद्यालय परिसरों, परीक्षा केंद्रों या दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है। Gen Z के युवा परीक्षा, भर्ती और रोजगार में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, तो Gen Alpha के स्कूली बच्चे अपने स्कूल में शिक्षक, पानी, शौचालय, बिजली, सड़क और सुरक्षित भवन जैसी बेहद बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज उठा रहे हैं। 2026 में उत्तर प्रदेश से छत्तीसगढ़, राजस्थान से मध्य प्रदेश और उत्तराखंड तक सामने आए छात्र प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—जब बच्चे अपनी कक्षा की समस्या लेकर सड़क पर उतरने लगें, तो क्या यह सिर्फ विरोध है या व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की नई पीढ़ी की कोशिश?
छात्र आंदोलनों का यह नया रूप इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उम्र और मुद्दे दोनों बदलते दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर Gen Z के युवाओं में संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज हुई है, वहीं दूसरी तरफ स्कूली बच्चे किसी बड़ी राजनीतिक विचारधारा के बजाय अपने रोजमर्रा के अनुभवों को लेकर प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच रहे हैं। किसी स्कूल में गणित का शिक्षक नहीं है, कहीं शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं है, कहीं पीने का पानी नहीं, तो कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं है। इन बच्चों का सवाल सीधा है—अगर सरकार शिक्षा का अधिकार देती है, तो क्या उन्हें पढ़ने के लिए जरूरी बुनियादी व्यवस्था भी नहीं मिलनी चाहिए?
जंतर-मंतर से शुरू हुई बड़ी तस्वीर
2026 के सबसे चर्चित छात्र आंदोलनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ Cockroach Janta Party (CJP) के नेतृत्व वाला आंदोलन रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष ने इस आंदोलन को व्यापक युवा लामबंदी में बदल दिया। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र और युवा सड़कों पर उतरे। आंदोलन इतना राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बना कि तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे और हिंसा से जुड़े मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैनल गठित किए जाने की बात सामने आई।
लेकिन इस आंदोलन का महत्व सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। इसने छात्र आंदोलनों की भाषा ही बदल दी। मांग सिर्फ परीक्षा दोबारा कराने या किसी एक परीक्षा की गड़बड़ी ठीक करने तक नहीं रही। युवाओं ने संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शिता, बेरोजगारी, सार्वजनिक शिक्षा और सरकारी संस्थाओं पर भरोसे जैसे बड़े सवाल उठाने शुरू किए। यही वह बदलाव है जिसने 2026 के छात्र आंदोलन को पहले के आंदोलनों से अलग बनाया।
अब बच्चे भी पूछ रहे हैं—हमारे स्कूल में शिक्षक कहां हैं?
Gen Alpha की कहानी इससे अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। 14 साल का बच्चा आम तौर पर सरकारी नीति के किसी दस्तावेज के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़क पर नहीं उतरता। लेकिन अगर उसकी कक्षा में गणित का शिक्षक महीनों से नहीं है, स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क खराब है या शौचालय नहीं है, तो उसके पास सवाल करने की ठोस वजह है।
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूल तक सड़क न होने का मामला इतना गंभीर हुआ कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और वन विभाग को सड़क के एक महत्वपूर्ण हिस्से के लिए आवश्यक मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया। यानी जिस समस्या को स्थानीय स्तर पर सुना जाना चाहिए था, वह आखिरकार अदालत तक पहुंची।
उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को लेकर हुए विरोध के बाद नई नीति तैयार करने और रिक्त पदों को भरने की दिशा में कदम उठाए गए। यह दिखाता है कि बच्चों और छात्रों की आवाज केवल खबर बनने तक सीमित नहीं रही; कुछ मामलों में उसने प्रशासनिक फैसलों को भी प्रभावित किया।
छत्तीसगढ़ में सड़क पर बैठ गए करीब 400 छात्र
छत्तीसगढ़ के पेंड्रावन में शिक्षकों की कमी को लेकर छात्रों का विरोध भी इसी बदलती तस्वीर का उदाहरण है। करीब 400 छात्रों ने खैरागढ़-दुर्ग मार्ग को जाम कर दिया। छात्रों की शिकायत थी कि पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के कारण उनकी पढ़ाई और भविष्य प्रभावित हो रहा है। छात्रों का कहना था कि वे अपनी कक्षाएं छोड़कर सड़क पर बैठना नहीं चाहते, लेकिन जब पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं होंगे तो वे आखिर करें क्या?
इस विरोध के बाद शिक्षा विभाग ने अतिरिक्त शिक्षकों को मंजूरी दी और स्कूल के प्राचार्य को भी बदला गया। यानी बच्चों का सवाल केवल सड़क तक पहुंचा ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई तक भी गया।
छत्तीसगढ़ के ही एक अन्य स्कूल में छात्रों ने शौचालय और बाउंड्री वॉल की कमी को लेकर स्कूल का गेट बंद कर विरोध किया। रायपुर में छात्रों ने गणित के शिक्षक की अनुपस्थिति को लेकर शिकायत की कि इसकी वजह से कुछ छात्र गणित विषय तक नहीं चुन पा रहे थे। यह सिर्फ एक शिक्षक की कमी नहीं, बल्कि किसी बच्चे के भविष्य के विकल्प सीमित होने का मामला बन जाता है।
रूड़की में बच्चों ने प्रशासन के दफ्तर में ही लगा दी क्लास
रूड़की में छात्रों और शिक्षकों ने लगातार जलभराव की समस्या को लेकर नगर निगम कार्यालय का रुख किया। वहां उन्होंने नगर निकाय परिसर में ही कक्षा लगा दी।
इस विरोध का संदेश बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली था—अगर प्रशासन हमें स्कूल तक पहुंचने लायक रास्ता नहीं दे सकता, तो हम अपनी कक्षा प्रशासन के पास ही ले आएंगे।
यही 2026 के छात्र विरोध की नई शैली है। लंबे भाषणों और बड़े राजनीतिक नारों की जगह बच्चे अपनी समस्या को सीधे उस जगह ले जा रहे हैं जहां उसका समाधान होना चाहिए।
राजस्थान में पशु बाड़े में पढ़ाई बनी आंदोलन की वजह
राजस्थान में छात्रों के पशु बाड़े में पढ़ने की तस्वीर ने भी सवाल खड़े किए। वहां विद्यार्थियों की स्थिति सामने आने के बाद सरकार ने नए स्कूल भवन के निर्माण की दिशा में कदम उठाया। दूसरी ओर अजमेर में छात्राओं ने प्राचार्य के खिलाफ गंभीर आरोपों को लेकर विरोध किया। जयपुर में सुनने और बोलने में अक्षम विद्यार्थियों ने गंदे शौचालय, पीने के पानी की कमी और जर्जर स्कूल भवन जैसी समस्याओं को लेकर आवाज उठाई। इसके बाद शिक्षा विभाग ने प्राचार्य को हटा दिया।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 50-60 छात्र अपने अभिभावकों और ग्रामीणों के साथ करीब 100 किलोमीटर की दूरी तय कर वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचे। छात्रों ने दो अतिथि शिक्षकों के कथित व्यवहार को लेकर शिकायत की, जिसे वे अपनी पढ़ाई को प्रभावित करने वाला बता रहे थे। इसके बाद दोनों शिक्षकों को हटा दिया गया और भविष्य की नियुक्तियों के लिए उन्हें अयोग्य घोषित किया गया, जबकि प्राचार्य के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू हुई।
बड़वानी में करीब 120 छात्राओं ने अपनी शिकायतों पर कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए लगभग 18 किलोमीटर की यात्रा की। बाद में अधिकारियों ने उनकी शिकायतों की जांच के लिए समिति गठित की।
इन घटनाओं में एक साझा पैटर्न दिखाई देता है—शिकायत, फिर आवेदन; आवेदन के बाद प्रदर्शन; प्रदर्शन के बाद प्रशासन; और जरूरत पड़ने पर मीडिया, सोशल मीडिया या अदालत का दरवाजा।
आंकड़े भी बता रहे हैं कि शिकायतें पूरी तरह बेबुनियाद नहीं
छात्रों के हाथों में उठे पोस्टर और नारे केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं हैं। शिक्षा व्यवस्था के आंकड़े भी कई जगह मौजूद कमियों की तस्वीर दिखाते हैं। UDISE+ की NE-26 रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 24.7 करोड़ विद्यार्थियों और करीब एक करोड़ शिक्षकों का डेटा दर्ज है तथा राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात करीब 24 है।
रिपोर्ट के मुताबिक केवल 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट और 63.1 प्रतिशत स्कूलों में काम करने वाले कंप्यूटर उपलब्ध हैं। डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा केवल 7.1 प्रतिशत स्कूलों में दर्ज की गई है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त शौचालय की सुविधा करीब 40.1 प्रतिशत स्कूलों में है।
कुछ राज्यों की स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। झारखंड में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 36 बताया गया है। पश्चिम बंगाल के केवल 19.7 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट सुविधा दर्ज है। मेघालय में विशेष जरूरत वाले विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त शौचालयों की उपलब्धता बेहद कम है। कर्नाटक में 8,042 एकल-शिक्षक स्कूल दर्ज किए गए हैं।
देशभर में एक लाख से अधिक ऐसे स्कूलों में 29 लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ रहे हैं जहां केवल एक शिक्षक है। दूसरी तरफ 5,663 स्कूल ऐसे भी हैं जहां कोई विद्यार्थी नामांकित नहीं है, लेकिन वहां 20,667 शिक्षक तैनात हैं। यह आंकड़ा शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों के असमान वितरण और प्रशासनिक विसंगतियों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सोशल मीडिया ने बदल दिया विरोध का पूरा खेल
Gen Z और Gen Alpha के आंदोलन को समझने के लिए सोशल मीडिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहले किसी छात्र आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाने के लिए छात्र संगठनों, पोस्टरों, पर्चों, अखबारों और टेलीविजन की जरूरत होती थी। अब एक स्मार्टफोन काफी है।
किसी स्कूल का टूटा शौचालय, जलभराव में डूबा स्कूल का रास्ता या बच्चों का जर्जर भवन में पढ़ना—एक वीडियो के रूप में सामने आते ही स्थानीय समस्या कुछ घंटों में बड़े सार्वजनिक मुद्दे में बदल सकती है।
2026 के Gen Z आंदोलनों में छात्रों ने खुद पुलिस कार्रवाई, भाषण, प्रदर्शन और घटनाओं के वीडियो रिकॉर्ड किए और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा किया। इंस्टाग्राम, एक्स और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने प्रदर्शनकारियों को अपनी कहानी खुद बताने का मौका दिया।
यानी विरोध अब केवल broadcast protest नहीं रहा; यह networked protest बन चुका है। पहले मीडिया तय करता था कि किस आंदोलन को कितनी जगह मिलेगी। अब छात्र खुद अपना कैमरा लेकर घटनास्थल पर मौजूद हैं और अपनी कहानी सीधे जनता तक पहुंचा सकते हैं।
CJP ने दिखाया—मेमे भी बन सकते हैं आंदोलन की भाषा
CJP आंदोलन की एक दिलचस्प विशेषता उसका हास्य और मीम संस्कृति का इस्तेमाल रहा। “Cockroach Janta Party” जैसे नाम ने युवाओं के डिजिटल संसार की भाषा को राजनीतिक विरोध से जोड़ दिया। मीम, मास्क, रील और व्यंग्य ने ऐसे युवाओं को भी आंदोलन से जोड़ने में मदद की जो पारंपरिक राजनीतिक सभाओं में शायद दिलचस्पी न लेते।
आज एक नारा मीम बन सकता है, मीम रील में बदल सकता है और वही रील लोगों को सड़क पर प्रदर्शन तक पहुंचा सकती है।
यही Gen Z की राजनीति का नया चेहरा है—गंभीर मुद्दा, लेकिन भाषा नई।
छात्र आंदोलन भारत में नया नहीं है
हालांकि छात्र विरोध कोई नई घटना नहीं है। 1974 में गुजरात में महंगाई, हॉस्टल फीस और भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों का आंदोलन आगे चलकर नव निर्माण आंदोलन में बदल गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के इस्तीफे तक पहुंचा। बिहार का छात्र आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यापक भ्रष्टाचार-विरोधी और राजनीतिक आंदोलन में बदल गया।
1990 के मंडल विरोधी आंदोलन ने भी दिखाया कि छात्र राष्ट्रीय नीति से जुड़े बेहद विवादित मुद्दों पर देशव्यापी आंदोलन का चेहरा बन सकते हैं। इसके बाद नागरिकता, विश्वविद्यालय स्वायत्तता और कैंपस अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में भी छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
फर्क केवल इतना है कि 1970 के दशक में किसी आंदोलन को देशभर में फैलने में महीनों लग सकते थे। 2026 में किसी स्कूल के गेट से निकला वीडियो कुछ घंटों में राष्ट्रीय बहस बन सकता है।
राजनीतिक दल भी समझ रहे हैं युवाओं की बदलती ताकत
इस बदलते छात्र माहौल पर राजनीतिक दलों की नजर भी है। विभिन्न दलों और उनके छात्र संगठनों ने कैंपस में सदस्यता और युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश तेज की है। लेकिन युवा अब केवल किसी एक राजनीतिक दल के स्थायी समर्थक के रूप में दिखाई नहीं देते।
एक मुद्दे पर कोई छात्र किसी पार्टी का समर्थन कर सकता है और दूसरे मुद्दे पर उसी पार्टी का विरोध भी कर सकता है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में युवा राजनीति अधिक मुद्दा-आधारित और गतिशील हो सकती है।
सरकारों पर भी बढ़ रहा है दबाव
छात्र आंदोलनों के बीच सरकारों का रुख भी बदलता दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्रियों से विश्वविद्यालयों में समय बिताने और अपने क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों का दौरा कर सुविधाओं का जायजा लेने तथा युवाओं से संवाद करने को कहा है।
महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों ने हॉस्टल, भत्ते, आरक्षण, छात्रवृत्ति, चिकित्सा सुविधाओं और प्रशासनिक नीतियों से जुड़े मुद्दों पर विरोध जारी रखा है। छात्रों का कहना है कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है; उन्हें लिखित आदेश, तय समयसीमा और जमीन पर दिखाई देने वाला काम चाहिए।
यही शायद इस पूरी छात्र लहर की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए
आज का छात्र केवल यह सुनना नहीं चाहता कि “मामला देखा जाएगा।” वह पूछ रहा है—शिक्षक कब आएगा? सड़क कब बनेगी? शौचालय कब ठीक होगा? छात्रवृत्ति कब मिलेगी? नियुक्ति कब होगी?
यह बदलाव मामूली नहीं है। इसका अर्थ है कि नई पीढ़ी लोकतंत्र को केवल चुनाव और मतदान के रूप में नहीं, बल्कि जवाब मांगने के अधिकार के रूप में भी समझ रही है।
शिक्षाविद और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रभु मोहापात्रा ने इन आंदोलनों को शिक्षा व्यवस्था में छात्रों को पर्याप्त हितधारक न मानने की गहरी समस्या से जोड़कर देखा है। उनके मुताबिक शिक्षा लंबे समय तक ऊपर से नीचे आने वाली नीति की तरह देखी गई, जिसमें छात्रों के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनके अनुसार शिक्षा की प्राथमिकता में कमी का असर केवल भवनों और बुनियादी ढांचे में नहीं, बल्कि शिक्षकों की उपलब्धता और पढ़ाई की गुणवत्ता में भी दिखाई देता है।
असली परीक्षा सरकारों की है
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि छात्र कितने प्रदर्शन करेंगे। असली सवाल यह है कि क्या सरकारें बच्चों और युवाओं को सड़क पर उतरने से पहले ही सुनेंगी?
अगर किसी बच्चे को शिक्षक पाने के लिए सड़क पर बैठना पड़े, किसी छात्रा को शिकायत सुनाने के लिए 18 किलोमीटर चलना पड़े या विद्यार्थियों को स्कूल की समस्या लेकर अदालत जाना पड़े, तो यह सिर्फ छात्रों के विरोध की कहानी नहीं है। यह व्यवस्था के सामने खड़ा आईना भी है।
Gen Z अब परीक्षा, भर्ती और रोजगार की पारदर्शिता मांग रही है। Gen Alpha अपने स्कूल में शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं मांग रही है। दोनों की मांगों के बीच एक साझा धागा है—हमें सुना जाए और व्यवस्था जवाब दे।
शायद 2026 के छात्र आंदोलनों की सबसे बड़ी विरासत यही होगी। स्मार्टफोन वाली पीढ़ी अब सिर्फ कंटेंट नहीं बना रही; वह सवाल भी पूछ रही है। स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अब यह समझ रहा है कि उसकी आवाज सिर्फ कक्षा के अंदर हाथ उठाने तक सीमित नहीं है। और सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उस हाथ को सड़क पर उठने से पहले ही उसकी बात सुनी जाए।




