राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026
नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी है। नेपाल में मृतकों की संख्या बढ़कर 359 हो गई है, जबकि भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 288 भारतीय अब भी लापता हैं। करीब 200 भारतीय चीन की ओर फंसे हुए हैं और उन्हें सुरक्षित निकालने की कोशिशें जारी हैं। इस बीच सबसे बड़ी चिंता यह है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में एक नई झील बन गई है, जिसके टूटने पर निचले इलाकों में दोबारा बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
नेपाल के रासुवा जिले से शुरू हुई तबाही ने देखते ही देखते कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। तेज पानी, मलबे और चट्टानों के बहाव ने सड़कें, पुल, घर और दूसरी बुनियादी सुविधाएं तबाह कर दीं। प्रारंभिक आकलनों के मुताबिक इस आपदा के पीछे हिमनद या बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से पैदा हुआ मलबे का प्रवाह हो सकता है। इससे नदियों का बहाव अचानक बेहद खतरनाक हो गया और पानी ने अपने रास्ते में आने वाली बस्तियों तथा ढांचों को भारी नुकसान पहुंचाया।
288 भारतीय लापता, 21 सुरक्षित निकाले गए
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता नेपाल में मौजूद भारतीय नागरिकों को लेकर है। विदेश मंत्रालय ने बताया है कि 288 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पाया है। वहीं तमिलनाडु के 21 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के मुताबिक चीन की ओर भी करीब 200 भारतीय मदद और सुरक्षित निकासी का इंतजार कर रहे हैं।
भारत सरकार ने स्थिति पर नजर रखने और प्रभावित भारतीयों के परिवारों की मदद के लिए विदेश मंत्रालय में 24 घंटे चलने वाला कंट्रोल रूम स्थापित किया है। भारतीय दूतावास, काठमांडू और बीजिंग में भी 24×7 हेल्पलाइन सक्रिय की गई हैं। सरकार नेपाल और चीन के अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में है ताकि फंसे हुए भारतीयों तक सहायता पहुंचाई जा सके।
फिर मंडरा रहा है बाढ़ का खतरा
सबसे गंभीर चिंता अभी खत्म नहीं हुई है। नेपाल के भोटे कोशी नदी के स्रोत के पास एक नई झील बनने की सूचना है। नदी के रास्ते में मलबे के जमा होने से पानी रुकने के कारण यह झील बनी है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्राकृतिक बांध टूटता है तो नीचे की ओर अचानक तेज बाढ़ आ सकती है। इसी वजह से नदी किनारे रहने वाले लोगों और राहत-बचाव दलों को सतर्क रहने को कहा गया है।
भारत में भी अलर्ट
नेपाल की तबाही का असर भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी दिखाई देने लगा है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर में प्रशासन ने हाई अलर्ट जारी किया है और नेपाल से आने वाली नदियों के जलस्तर तथा संभावित खतरे की लगातार निगरानी की जा रही है। महाराजगंज में गांडक नदी से तीन शव भी बरामद किए गए हैं, जिनके नेपाल से बहकर आने की आशंका है।
कई भारतीय राज्यों ने भी अपने नागरिकों की जानकारी जुटाने और संभावित रूप से लापता लोगों की तलाश में सहायता के लिए कदम उठाए हैं। महाराष्ट्र के 114 पर्यटकों के नेपाल में फंसे होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें 53 के सुरक्षित होने की पुष्टि की गई है। गुजरात के 11 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। कर्नाटक के आठ लोगों के नेपाल में फंसे होने की जानकारी राज्य सरकार ने दी है।
सड़कें और पुल तबाह, राहत कार्य चुनौतीपूर्ण
बाढ़ ने नेपाल के कई हिस्सों में संपर्क व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। सड़कें और पुल बह जाने के कारण कई इलाकों तक जमीन के रास्ते पहुंचना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि राहत और बचाव अभियानों में हेलीकॉप्टरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। कई जगहों पर मलबे के बीच बचाव दल लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं।
दिल्ली सरकार ने भी नेपाल में हालात को देखते हुए 28 और 29 अगस्त की भारत-नेपाल मैत्री बस सेवा को अस्थायी रूप से रोक दिया है। दिल्ली-काठमांडू मार्ग पर सड़क संपर्क प्रभावित होने के कारण यह फैसला एहतियाती कदम के तौर पर लिया गया है।
दुनिया ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल की त्रासदी पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए राहत अभियान के लिए शुरुआती तौर पर 20 लाख डॉलर की सहायता जारी की है। ब्रिटेन ने भी नेपाल में राहत और आपातकालीन सेवाओं के लिए 50 लाख पाउंड की सहायता की घोषणा की है।
ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय ने भी नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई तबाही पर दुख जताते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। दुनिया के कई देशों के नागरिक भी इस आपदा में प्रभावित हुए हैं। बड़ी संख्या में पर्यटक और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालु भी प्रभावित क्षेत्र में मौजूद थे।
राहत से बड़ी चुनौती—लापता लोगों की तलाश
इस समय नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ तबाही का आकलन करना नहीं, बल्कि उन सैकड़ों लोगों तक पहुंचना है जिनका अभी कोई पता नहीं चल पाया है। परिवार अपने प्रियजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं और राहत दल बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में तलाश अभियान चला रहे हैं।
नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक संवेदनशीलता और ग्लेशियरों से जुड़े बढ़ते खतरों की ओर ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में ग्लेशियरों की अस्थिरता और बदलती जलवायु परिस्थितियां भविष्य में ऐसी घटनाओं के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
फिलहाल नेपाल और भारत दोनों के लिए प्राथमिकता एक ही है—जितनी ज्यादा जिंदगियां बचाई जा सकें, लापता लोगों को खोजा जा सके और प्रभावित लोगों तक तत्काल राहत पहुंचाई जा सके। लेकिन नई बनी झील और लगातार बने हुए बाढ़ के खतरे ने यह साफ कर दिया है कि राहत और बचाव अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है।




