राष्ट्रीय/मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 28 अगस्त 2026
रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक और भावनात्मक त्योहार के बहाने महिलाओं के पहनावे पर सवाल उठाना उस पुरानी सोच को सामने लाता है, जिसमें महिला की गरिमा को उसके कपड़ों से जोड़ दिया जाता है। अभिनेत्री कृति सेनन के एक विज्ञापन को लेकर उठी आपत्तियों के बीच असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने क्या पहना, बल्कि यह होना चाहिए कि हम आज भी महिलाओं के कपड़ों को उनके चरित्र और सम्मान का पैमाना क्यों मानते हैं?
यह विज्ञापन भाई-बहन के रिश्ते और परिवार के बदलते स्वरूप को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाता है। इसमें एक महिला अपने छोटे भाई को राखी बांधने के लिए तैयार होती है। इसी दौरान परिवार का पालतू कुत्ता भी कहानी का हिस्सा बनता है और उसे भी राखी बांधी जाती है। कुछ ही सेकंड के इस विज्ञापन में पारिवारिक स्नेह और रिश्तों की बदलती परिभाषा को सामने रखने की कोशिश की गई है।
लेकिन विज्ञापन सामने आने के बाद चर्चा उसके संदेश से ज्यादा अभिनेत्री की पोशाक पर केंद्रित हो गई। यहीं समाज को अपने नजरिए पर ठहरकर विचार करने की जरूरत है।
किसी महिला ने क्या पहना है, यह उसके निजी चुनाव का हिस्सा है। केवल कपड़ों के आधार पर उसके चरित्र, संस्कार या पारिवारिक मूल्यों का फैसला करना उचित नहीं है। खासकर तब, जब यही समाज महिलाओं से शिक्षा, रोजगार, आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक जीवन में बराबरी की भागीदारी की अपेक्षा करता है।
परंपरा भी कोई जड़ व्यवस्था नहीं है। समय के साथ समाज बदलता है और उसके साथ पहनावे, रिश्तों और पारिवारिक जीवन की समझ भी बदलती है। कभी साड़ी को ही महिलाओं की पारंपरिक पहचान माना जाता था, फिर सलवार-कमीज आम हुआ और बाद में जींस, ट्राउजर तथा दूसरे आधुनिक परिधान भी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए। कपड़े बदले, लेकिन परिवार और रिश्तों की भावनाएं खत्म नहीं हुईं।
असल सवाल परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का है। किसी त्योहार की गरिमा बनाए रखना अच्छी बात है, लेकिन उसकी पूरी जिम्मेदारी महिला के कपड़ों पर डाल देना सही नहीं। त्योहारों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना और रिश्तों को मजबूत करना है, न कि किसी व्यक्ति की पसंद को नैतिक कसौटी पर कसना।
विज्ञापन में पालतू कुत्ते को राखी बांधने का दृश्य भी परिवार की बदलती परिभाषा को दर्शाता है। आज बहुत से लोग अपने पालतू जानवरों को परिवार का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। हर व्यक्ति इस विचार से सहमत हो, यह जरूरी नहीं है। किसी विज्ञापन के विचार से असहमति भी पूरी तरह जायज है। लेकिन असहमति को व्यक्तिगत अपमान या महिला के चरित्र पर टिप्पणी में बदल देना उचित नहीं कहा जा सकता।
महिलाओं के पहनावे को लेकर समाज में दोहरे मापदंड भी दिखाई देते हैं। पुरुष क्या पहनता है, उससे आम तौर पर उसके चरित्र का फैसला नहीं किया जाता। लेकिन महिला के कपड़े अक्सर उसके संस्कार और चरित्र से जोड़ दिए जाते हैं। यही सोच बदलने की जरूरत है।
इसका अर्थ यह नहीं कि विज्ञापनों, फिल्मों या सार्वजनिक प्रस्तुतियों की आलोचना नहीं होनी चाहिए। आलोचना लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन आलोचना का केंद्र विज्ञापन का विचार, उसकी प्रस्तुति या उसका संदेश होना चाहिए, न कि किसी महिला की व्यक्तिगत गरिमा।
रक्षाबंधन का मूल भाव भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रिश्ते की मजबूती से जुड़ा है। ऐसे त्योहार को केवल कपड़ों की बहस तक सीमित कर देना उसके भावनात्मक और सामाजिक महत्व को छोटा कर देता है।
समाज की वास्तविक आधुनिकता इस बात से तय नहीं होगी कि महिलाएं कितने आधुनिक या पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। आधुनिकता का असली पैमाना यह है कि महिलाओं को अपनी पहचान, पसंद और जीवन के फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता है और समाज उन फैसलों का सम्मान कितना करता है।
कृति सेनन के विज्ञापन पर हुई बहस हमें एक जरूरी सवाल देती है—क्या किसी महिला की मर्यादा उसके कपड़ों से तय होगी या उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से?
जवाब शायद बहुत स्पष्ट है। मर्यादा कपड़ों में नहीं, व्यवहार और सोच में होती है। अगर समाज को वास्तव में आगे बढ़ना है, तो महिलाओं के कपड़े बदलने से ज्यादा जरूरी है कि महिलाओं को देखने वाली अपनी नजर बदली जाए।




