अंतरराष्ट्रीय/टेक्नोलॉजी | एबीसी नेशनल न्यूज़ | नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर मेटा की घेराबंदी
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों पर लगातार बढ़ते दबाव के बीच फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा ने एक बेहद बड़ा समझौता किया है। कंपनी ने बच्चों को नुकसान पहुंचाने और उनकी ऑनलाइन गोपनीयता से जुड़े दावों को निपटाने के लिए 18 अरब डॉलर यानी करीब ₹1.5 लाख करोड़ तक के समझौते पर सहमति जताई है। यह मामला अमेरिका के 29 राज्यों से जुड़ा है और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही के लिहाज से इसे एक बड़े मोड़ के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, मेटा ने इस समझौते के तहत किसी तरह की गलती या गलत काम करने की बात स्वीकार नहीं की है। फिर भी इतनी बड़ी रकम और बच्चों की सुरक्षा को लेकर किए गए नए बदलाव यह संकेत जरूर देते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों पर अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं।
मामला सिर्फ निजता का नहीं, बच्चों की सुरक्षा का भी बना
कानूनी तौर पर यह मामला अमेरिका के करीब 30 साल पुराने चिल्ड्रन्स ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट, यानी सीओपीपीए, से जुड़ा था। यह कानून 13 साल से कम उम्र के बच्चों की ऑनलाइन जानकारी और निजी डेटा की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। दिलचस्प बात यह है कि जब यह कानून बनाया गया था, तब आज के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी मौजूद नहीं थे। आरोपों का एक बड़ा हिस्सा मेटा द्वारा वर्षों तक बच्चों से जुड़ा डेटा जुटाने और उसके इस्तेमाल को लेकर था। लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, बहस केवल ऑनलाइन निजता तक सीमित नहीं रही। बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने, सोशल मीडिया के उनके व्यवहार पर असर और कंपनियों की जिम्मेदारी जैसे सवाल भी केंद्र में आ गए। यानी अदालत में मामला डेटा का था, लेकिन बहस धीरे-धीरे बच्चों की पूरी ऑनलाइन सुरक्षा तक पहुंच गई।
पांच दिन की सुनवाई और फिर समझौते का रास्ता
इस मामले की सुनवाई करीब पांच दिन चली और इसके बाद मेटा ने समझौते का रास्ता चुन लिया। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग को अदालत में गवाही देने के लिए पेश होना था, लेकिन उससे पहले ही सुनवाई समाप्त हो गई। मेटा के लिए यह पूरा घटनाक्रम आसान नहीं रहा। कंपनी लंबे समय से अलग-अलग मुकदमों में यह बताती रही है कि उसने बच्चों और किशोरों की सुरक्षा के लिए कई उपाय किए हैं। कंपनी ने पत्रकारों और विशेषज्ञों को भी अपने सुरक्षा उपकरणों और व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी दी है। लेकिन दूसरी ओर कई अभिभावकों का अनुभव अलग रहा है। उनका कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले सुरक्षा विकल्पों की संख्या इतनी ज्यादा है कि बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना खुद माता-पिता के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी बन गया है। मेटा के पास केवल इंस्टाग्राम पर ही 60 से अधिक सुरक्षा उपाय होने की बात सामने आई है और इनमें से कई अब अपने आप चालू भी रहते हैं।
व्हिसलब्लोअर आर्टुरो बेहार ने उठाए गंभीर सवाल
मामले में आर्टुरो बेहार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। वह पहले इंस्टाग्राम के साथ काम कर चुके हैं और बाद में व्हिसलब्लोअर के रूप में सामने आए। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही बताया था कि प्लेटफॉर्म पर बच्चों के साथ हानिकारक चीजें हो रही हैं, लेकिन उनके अनुसार उस समय पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई। सुनवाई के दौरान कंपनी के एक अन्य अधिकारी से एक प्रस्तुति को लेकर भी सवाल किए गए। उस प्रस्तुति में कथित तौर पर ऐसी बात लिखी थी कि कुछ परिस्थितियों में नियमों का पालन करने के लिए बदलाव करने के बजाय जुर्माना भरना कंपनी के लिए आसान विकल्प हो सकता है। हालांकि इन दावों, दस्तावेजों और उनके कानूनी अर्थ को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी दलीलें हैं, लेकिन इस पूरी सुनवाई ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया—क्या सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों की सुरक्षा को वास्तव में अपनी पहली प्राथमिकता मानती हैं या सुरक्षा उपायों का बड़ा हिस्सा केवल दबाव के जवाब में तैयार किया जाता है?
हारती तो सैकड़ों अरब डॉलर का खतरा था
इस मुकदमे में मेटा के सामने संभावित आर्थिक नुकसान बेहद बड़ा हो सकता था। सबसे खराब स्थिति की गणना में संभावित जुर्माना 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक बताया गया था। यह अधिकतम संभावित गणना थी और वास्तव में इतनी बड़ी राशि लगाए जाने की संभावना बेहद कम मानी जा रही थी। फिर भी वास्तविक खतरा सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच सकता था। इसके मुकाबले 18 अरब डॉलर तक का समझौता काफी कम है, लेकिन किसी सोशल मीडिया कंपनी के लिए यह फिर भी बहुत बड़ी रकम है। यह राशि करीब 10 वर्षों की अवधि में दी जानी है। इसलिए समझौते ने मेटा को एक संभावित बहुत बड़े कानूनी जोखिम से बाहर निकलने का रास्ता दिया है, लेकिन साथ ही कंपनी को बच्चों की सुरक्षा के लिए अपने प्लेटफॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़े हैं।
मेटा ने गलती नहीं मानी, लेकिन बदलावों पर सहमति दी
इस पूरे समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेटा ने किसी गलत काम को स्वीकार नहीं किया है। लेकिन इसके बावजूद कंपनी ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कम उम्र के यूजर्स की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कई नए उपायों पर सहमति जताई है। इसका मतलब यह है कि मामला केवल पैसे देकर खत्म करने तक सीमित नहीं है। प्लेटफॉर्म पर किशोरों के इस्तेमाल के तरीके में भी बदलाव किए जाएंगे। उद्देश्य यह है कि बच्चे और किशोर लगातार स्क्रीन पर चिपके न रहें, रात के समय सोशल मीडिया से आने वाली सूचनाओं के कारण उनकी नींद प्रभावित न हो और लाइक्स तथा ऑनलाइन लोकप्रियता का दबाव कुछ कम किया जा सके। यही वजह है कि इस समझौते को सोशल मीडिया उद्योग के लिए केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किशोरों के लिए दो घंटे की समय सीमा
नए सुरक्षा उपायों के तहत पहचाने गए किशोर यूजर्स के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम पर दो घंटे की दैनिक समय सीमा डिफॉल्ट रूप से लागू की जाएगी। हालांकि सीधे संदेश भेजने और प्राप्त करने में बिताया गया समय इस दो घंटे की सीमा में शामिल नहीं होगा। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करते रहने की आदत बच्चों और किशोरों के रोजमर्रा के जीवन का बड़ा हिस्सा बनती जा रही है। एक वीडियो के बाद दूसरा वीडियो, फिर नई पोस्ट और उसके बाद लगातार आने वाली सूचनाएं यूजर को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखती हैं। ऐसे में समय सीमा लगाने का उद्देश्य कम से कम किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को एक तय दायरे में रखना है।
आधी रात से सुबह तक बंद रहेंगी सूचनाएं
मेटा ने रात और स्कूल के समय बच्चों को सोशल मीडिया से थोड़ी दूरी देने के लिए नोटिफिकेशन से जुड़े बदलावों पर भी सहमति जताई है। किशोरों को रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक नोटिफिकेशन नहीं मिलेंगे। इसके अलावा स्कूल के दिनों में सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक भी नोटिफिकेशन को म्यूट किया जाएगा। इसका उद्देश्य साफ है—बच्चों का ध्यान पढ़ाई, नींद और वास्तविक जीवन की गतिविधियों से बार-बार सोशल मीडिया की ओर न खिंचे। लगातार बजती या दिखाई देती सूचनाएं किसी भी यूजर को फोन उठाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। ऐसे में नोटिफिकेशन पर रोक बच्चों को सोशल मीडिया से मिलने वाले लगातार डिजिटल दबाव से कुछ राहत दे सकती है।
किशोरों के पोस्ट पर लाइक्स भी होंगे छिपे
सोशल मीडिया पर लोकप्रियता का दबाव कम करने के लिए किशोरों के पोस्ट और सामग्री पर मिलने वाले लाइक्स को पूरी तरह छिपाने की व्यवस्था भी की जाएगी। आज सोशल मीडिया पर कई बच्चे और किशोर इस बात को लेकर बेहद चिंतित रहते हैं कि उनके पोस्ट को कितने लोगों ने पसंद किया, किसे कितने लाइक्स मिले और उनकी तुलना दूसरों से कैसी हो रही है। लाइक्स दिखाई न देने से इस तरह की तुलना और लोकप्रियता की होड़ कुछ कम हो सकती है। मेटा का यह कदम सोशल मीडिया को किशोरों के लिए कम प्रतिस्पर्धी और कम दबाव वाला बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा।
छह महीने में कई बदलाव लागू करने की तैयारी
मेटा के अनुसार इन नए सुरक्षा उपायों में से अधिकांश को अगले छह महीनों के भीतर डिफॉल्ट रूप से लागू किया जाएगा या किशोर यूजर्स के लिए विकल्प के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन बच्चों की सही पहचान करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्लेटफॉर्म को यह पता लगाना होगा कि कौन बच्चा है और कौन वयस्क, ताकि सुरक्षा उपाय सही यूजर्स पर लागू किए जा सकें। मेटा की नई कोशिशों के तहत बच्चों की पहचान और उम्र का पता लगाने वाली व्यवस्थाओं को लागू करने में करीब एक साल तक का समय लग सकता है। यही व्यवस्था इस पूरे बदलाव की सफलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि अगर कंपनी यह ठीक से पहचान ही नहीं पाती कि यूजर की उम्र कितनी है, तो सुरक्षा नियमों का फायदा भी सीमित रह जाएगा।
सवाल यह भी—क्या असर अमेरिका से बाहर पहुंचेगा?
इस समझौते का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने की संभावना कम मानी जा रही है। दुनिया के कई देशों में बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर पहले से चिंता बढ़ रही है। माता-पिता, शिक्षक, विशेषज्ञ और सरकारें लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा के लिए कितनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ऐसे में अमेरिका में हुए इस बड़े समझौते के बाद दूसरे देश भी इसी तरह के सुरक्षा उपायों पर विचार कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो मेटा जैसी कंपनियों को अलग-अलग देशों में बच्चों के लिए अपनी सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है।
टिकटॉक और स्नैपचैट पर भी बढ़ सकता है दबाव
बच्चों की ऑनलाइन दुनिया केवल फेसबुक और इंस्टाग्राम तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में किशोर दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल करते हैं। इसलिए अगर मेटा किशोरों के लिए समय सीमा, नोटिफिकेशन नियंत्रण और लाइक्स छिपाने जैसी व्यवस्था लागू करती है, तो टिकटॉक और स्नैपचैट जैसी कंपनियों पर भी इसी तरह के कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है। अगर बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां एक जैसी सुरक्षा व्यवस्था अपनाती हैं तो बच्चों और किशोरों के लिए पूरा डिजिटल माहौल बदल सकता है। इसके साथ ही कंपनियों के सामने एक मुश्किल सवाल भी होगा—सुरक्षा बढ़ाते हुए प्लेटफॉर्म को इतना आकर्षक कैसे रखा जाए कि यूजर्स उससे पूरी तरह दूर न चले जाएं?
क्या सोशल मीडिया का आकर्षण कम हो जाएगा?
अब सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किशोरों के लिए समय सीमा लगा दें, रात में नोटिफिकेशन बंद कर दें और लाइक्स छिपा दें, तो क्या बच्चे पहले की तरह इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना चाहेंगे? सोशल मीडिया की लोकप्रियता का बड़ा हिस्सा लगातार आने वाली सूचनाओं, लाइक्स, प्रतिक्रियाओं और बिना रुके नई सामग्री देखने की आदत पर टिका हुआ है। अगर इन्हीं चीजों को जानबूझकर सीमित किया जाता है तो संभव है कि सोशल मीडिया किशोरों के लिए पहले की तुलना में कम आकर्षक हो जाए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी संभव है कि बच्चे और किशोर नए तरीके खोज लें या दूसरे प्लेटफॉर्म की ओर चले जाएं। इसलिए असली चुनौती केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि यह देखना है कि बच्चे वास्तव में इन बदलावों के बाद किस तरह व्यवहार करते हैं।
असली परीक्षा अब शुरू होगी
पूर्व इंस्टाग्राम कर्मचारी और व्हिसलब्लोअर आर्टुरो बेहार ने भी इसी सवाल को सबसे महत्वपूर्ण माना है। उनका तर्क है कि असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कंपनियां कितने सुरक्षा उपाय लागू करती हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि इन उपायों से बच्चों को वास्तव में कितना फायदा होता है। यही इस पूरे समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। कागज पर नियम बनाना और ऐप में नए बटन जोड़ना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन बच्चों को हानिकारक सामग्री, ऑनलाइन दबाव, अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल और दूसरी डिजिटल परेशानियों से वास्तविक सुरक्षा देना कहीं बड़ी चुनौती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेटा के नए उपाय वास्तव में बच्चों की जिंदगी में कोई सकारात्मक बदलाव ला पाते हैं या नहीं।
सोशल मीडिया की दुनिया के लिए बड़ा संकेत
मेटा का यह समझौता केवल एक कंपनी और अमेरिका के 29 राज्यों के बीच कानूनी विवाद का अंत नहीं है। यह उस बदलती सोच का भी संकेत है जिसमें दुनिया अब सोशल मीडिया कंपनियों से केवल नई सुविधाएं, ज्यादा यूजर्स और ज्यादा कमाई नहीं, बल्कि जवाबदेही और सुरक्षा भी मांग रही है। बच्चों की ऑनलाइन दुनिया जितनी तेजी से बड़ी हो रही है, उनके सामने मौजूद खतरे भी उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं। अब सवाल यह नहीं है कि बच्चे सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं या नहीं। सवाल यह है कि जब वे सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं, तो कंपनियां उन्हें कितना सुरक्षित माहौल देती हैं और किसी नुकसान की स्थिति में उनकी जिम्मेदारी कितनी तय होती है।
मुनाफे से आगे अब बच्चों की सुरक्षा का सवाल
फेसबुक और इंस्टाग्राम मेटा के लिए अरबों डॉलर की कमाई का बड़ा जरिया हैं। कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अपना ध्यान तेजी से बढ़ा रही है, लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से होने वाली भारी कमाई अभी भी उसके कारोबार का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुकदमे और दुनिया भर में बढ़ता दबाव कंपनी के लिए केवल कानूनी चुनौती नहीं, बल्कि उसके पूरे कारोबारी मॉडल से जुड़ा सवाल भी बनते जा रहे हैं। अगर बच्चों की सुरक्षा के लिए प्लेटफॉर्म को कम व्यस्त रखने वाले और कम आकर्षक बनाने वाले बदलाव करने पड़ते हैं, तो कंपनियों को सुरक्षा और मुनाफे के बीच एक नया संतुलन बनाना होगा।
18 अरब डॉलर का समझौता खत्म कर सकता है एक मुकदमा, बहस नहीं
18 अरब डॉलर का यह समझौता शायद एक बड़े कानूनी विवाद का रास्ता बंद कर दे, लेकिन बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर शुरू हुई बहस का अंत नहीं करता। असली बदलाव तब माना जाएगा जब सोशल मीडिया कंपनियों के सुरक्षा संबंधी दावे केवल कागज, ऐप के विकल्पों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों की वास्तविक जिंदगी में दिखाई दें। अगर बच्चे सुरक्षित हैं, माता-पिता का बोझ कम हुआ है और हानिकारक ऑनलाइन अनुभवों में वास्तविक कमी आती है, तभी इस समझौते को सार्थक माना जा सकेगा। आखिरकार, सोशल मीडिया की असली ताकत उसके अरबों यूजर्स में नहीं, बल्कि उस भरोसे में है जो लोग इन प्लेटफॉर्म पर करते हैं। और जब बात बच्चों की हो, तो यह भरोसा केवल सुविधा से नहीं, जिम्मेदारी और सुरक्षा से हासिल किया जा सकता है।




