ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अगस्त 2026
कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के मनुस्मृति को लेकर दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति को उस सवाल के सामने खड़ा कर दिया है, जिससे बचने के बजाय उस पर खुलकर बहस होनी चाहिए—क्या आधुनिक भारत में महिला की पहचान उसके रिश्तों से तय होगी या उसकी अपनी स्वतंत्र पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी? पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर कही गई बातों का संदर्भ देते हुए इसी सवाल को उठाया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल बेटी, पत्नी या मां के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इन रिश्तों का अपना महत्व है, लेकिन किसी महिला की पूरी पहचान केवल इन्हीं रिश्तों में समेट देना उसकी स्वतंत्र व्यक्तित्व और नागरिक पहचान को सीमित करता है। राहुल गांधी का मूल सवाल इसलिए केवल मनुस्मृति का सवाल नहीं है; यह उस सामाजिक सोच का सवाल है जो सदियों से महिला को किसी पुरुष—पिता, पति या पुत्र—के संदर्भ में परिभाषित करती रही है। आधुनिक लोकतंत्र में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब पुरुष को उसके अपने नाम, काम, विचार और फैसलों से पहचाना जाता है, तो महिला की स्वतंत्र पहचान को लेकर अब भी संकोच क्यों होना चाहिए?
राहुल गांधी के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने मां, पत्नी या बेटी होने का विरोध नहीं किया, बल्कि यह कहा कि महिला की पहचान केवल इन्हीं भूमिकाओं तक सीमित नहीं हो सकती। यह अंतर समझना जरूरी है। एक महिला मां है, तो यह उसके जीवन की महत्वपूर्ण पहचान है; वह पत्नी है, तो यह भी उसके जीवन का महत्वपूर्ण संबंध है; वह बेटी है, तो यह भी भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण रिश्ता है। लेकिन इन रिश्तों के साथ-साथ वह स्वयं भी एक व्यक्ति है—उसकी अपनी इच्छाएं हैं, अपने सपने हैं, अपनी प्रतिभा है, अपने फैसले हैं और अपने अधिकार हैं। यही वह विचार है जिसे राहुल गांधी ने राजनीतिक बहस में सामने रखा। सवाल यह नहीं कि परिवार महत्वपूर्ण है या नहीं; सवाल यह है कि क्या परिवार के भीतर महिला की अपनी स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है? यदि आधुनिक भारत संविधान को अपना सर्वोच्च कानूनी आधार मानता है, तो इस प्रश्न पर बहस होना बिल्कुल स्वाभाविक है।
मनुस्मृति का संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसके कुछ श्लोक महिलाओं की स्वतंत्रता और संरक्षण को लेकर ऐसे विचार प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें आज के समानता आधारित संवैधानिक मूल्यों के साथ आसानी से नहीं जोड़ा जा सकता। मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक का प्रचलित अनुवाद महिला के जीवन को पिता, पति और पुत्र के संरक्षण से जोड़ता है और महिला की स्वतंत्रता को नकारता हुआ दिखाई देता है। इसी विचार को राहुल गांधी ने आधुनिक महिला की स्वतंत्र पहचान के सवाल से जोड़ा। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी प्राचीन ग्रंथ में लिखे विचार का उल्लेख करना और उस ग्रंथ से जुड़े हर व्यक्ति या पूरी परंपरा को खारिज कर देना एक ही बात नहीं है। राहुल गांधी का तर्क उस विशेष विचार की आलोचना के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिला की स्वतंत्रता को सीमित करता है। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी ऐतिहासिक विचार की आलोचनात्मक समीक्षा करना न तो असामान्य है और न ही किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ होना अपने आप में साबित करता है।
मनुस्मृति पर बहस सदियों पुरानी है और इसके अर्थ, प्रभाव तथा ऐतिहासिक भूमिका को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद भी रहे हैं। बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि मनुस्मृति में 12 अध्याय हैं और अलग-अलग संस्करणों में श्लोकों की संख्या अलग मिलती है। इसमें सामाजिक व्यवस्था, विवाह, परिवार, राजा के कर्तव्य, अपराध, न्याय, संपत्ति और वर्ण व्यवस्था सहित अनेक विषयों पर चर्चा की गई है। इसलिए इसे केवल महिलाओं से संबंधित पुस्तक मानना भी सही नहीं होगा। लेकिन इसी व्यापक ग्रंथ में महिलाओं और सामाजिक वर्गों को लेकर ऐसे प्रावधान और विचार भी मिलते हैं, जिनकी आधुनिक समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के आधार पर आलोचना होती रही है। यही कारण है कि मनुस्मृति भारतीय सामाजिक इतिहास और सामाजिक सुधार की बहस में एक विवादित और महत्वपूर्ण संदर्भ बनी हुई है।
इस बहस में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम सामने आना स्वाभाविक है। 25 दिसंबर 1927 को महाड में आंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था। आंबेडकर का संघर्ष केवल किसी ग्रंथ के विरोध तक सीमित नहीं था। उनका पूरा सार्वजनिक जीवन सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव के अंत और वंचित वर्गों को समान अधिकार दिलाने की लड़ाई से जुड़ा था। उन्होंने ऐसी सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की जिसमें जन्म के आधार पर व्यक्ति की स्थिति तय होती है और सामाजिक गतिशीलता सीमित हो जाती है। इसलिए आज जब राहुल गांधी मनुस्मृति के संदर्भ में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता की बात करते हैं, तो उनकी टिप्पणी को भारत के लंबे सामाजिक सुधार आंदोलन की पृष्ठभूमि में भी समझा जा सकता है। यह बहस परंपरा बनाम आधुनिकता से कहीं अधिक असमानता बनाम समानता की बहस है।
मनुस्मृति की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर एक दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आता है। बीबीसी की रिपोर्ट में इतिहासकार राजीव लोचन के हवाले से कहा गया है कि ब्रिटिश शासन से पहले मनुस्मृति को पूरे भारत में आधुनिक अर्थों में एक समान कानून की किताब के रूप में इस्तेमाल किए जाने का प्रमाण नहीं मिलता। ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज और कानून को समझने की कोशिश में संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया गया और मनुस्मृति को विशेष महत्व मिला। इस प्रक्रिया ने आगे चलकर इसकी सार्वजनिक पहचान को और मजबूत किया। इसलिए आज जब मनुस्मृति का नाम लिया जाता है, तो उसके ऐतिहासिक उपयोग, सामाजिक प्रभाव और आधुनिक राजनीतिक व्याख्याओं—तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी ग्रंथ को लेकर बहस करते समय न तो उसे बिना संदर्भ के महिमामंडित करना उचित है और न ही उसके पूरे ऐतिहासिक संदर्भ को एक ही रंग में देखना।
लेकिन राहुल गांधी के बयान की असली ताकत इतिहास की इस बहस से आगे है। उन्होंने सवाल उठाया है कि आज के भारत में हम महिलाओं को किस नजर से देखते हैं? संविधान ने नागरिकों को समानता का अधिकार दिया है। आधुनिक भारत में महिला डॉक्टर है, वैज्ञानिक है, सैनिक है, पायलट है, शिक्षक है, उद्यमी है, पत्रकार है, न्यायाधीश है, सांसद है और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंच चुकी है। ऐसे भारत में महिला की पहचान को केवल किसी पुरुष से उसके संबंध के आधार पर देखना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है। यदि एक महिला अपने जीवन के फैसले खुद लेने में सक्षम है, अपने करियर का चुनाव कर सकती है, अपनी संपत्ति पर अधिकार रखती है और देश के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में समान भागीदारी कर सकती है, तो उसकी स्वतंत्रता को किसी पुराने सामाजिक ढांचे की सीमाओं में क्यों बांधा जाए?
राहुल गांधी की बात का यही संवैधानिक पक्ष सबसे मजबूत है। भारतीय संविधान की मूल भावना व्यक्ति की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता पर आधारित है। आधुनिक लोकतंत्र में किसी नागरिक की पहचान उसके जन्म या लिंग से उसके अधिकारों को कम नहीं करती। इसलिए जब राहुल गांधी महिला को केवल बेटी, पत्नी या मां की भूमिका में सीमित करने वाली सोच पर सवाल उठाते हैं, तो उनकी बात को संविधान की उस भावना के साथ जोड़कर देखना चाहिए जिसमें हर व्यक्ति को समान नागरिक माना गया है। यह किसी धर्म के खिलाफ लड़ाई नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के पक्ष में खड़े होने का सवाल है।
यह भी समझना जरूरी है कि किसी प्राचीन ग्रंथ पर सवाल उठाना पूरी भारतीय संस्कृति या परंपरा को खारिज करना नहीं है। भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बहस और आत्मालोचना की परंपरा रही है। यहां अलग-अलग दार्शनिक विचारधाराएं एक-दूसरे से असहमति जताती रही हैं। सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी परंपराओं के भीतर मौजूद असमानताओं पर सवाल उठाए और समाज को बदलने की कोशिश की। राजा राममोहन राय से लेकर ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और आंबेडकर तक सामाजिक सुधार की परंपरा का एक बड़ा हिस्सा उन व्यवस्थाओं को चुनौती देने से जुड़ा रहा, जिन्हें वे अन्यायपूर्ण मानते थे। इसलिए राहुल गांधी का सवाल भी इसी व्यापक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है।
राहुल गांधी के आलोचक यह कह सकते हैं कि प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। लेकिन फिर यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या इतिहास केवल इसलिए आलोचना से बाहर हो जाना चाहिए क्योंकि वह पुराना है? यदि किसी पुराने विचार से आज असमानता पैदा होती है या किसी नागरिक के अधिकार सीमित होते हैं, तो उस पर सवाल उठाना समाज के विकास का हिस्सा है। आधुनिक भारत ने अनेक पुराने सामाजिक नियमों और प्रथाओं को पीछे छोड़ा है। बाल विवाह, अस्पृश्यता, महिलाओं की शिक्षा पर रोक और अनेक प्रकार के भेदभाव को चुनौती दी गई। समाज इसलिए आगे बढ़ा क्योंकि लोगों ने यह पूछने का साहस किया कि जो हमेशा से होता आया है, क्या वह हमेशा सही भी है?
राहुल गांधी की टिप्पणी को इसी सवाल की निरंतरता के रूप में देखना चाहिए। वह बहस को मनुस्मृति की किताब से उठाकर महिला की वास्तविक जिंदगी तक ले आते हैं। आज भी किसी लड़की की शिक्षा का फैसला कई बार परिवार करता है, नौकरी करने या न करने का फैसला कई बार सामाजिक दबाव तय करता है, विवाह के मामले में उसकी इच्छा पर सवाल उठते हैं और कई जगह महिलाओं की स्वतंत्रता को परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है। ऐसे माहौल में महिला को एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखने की बात केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की मांग भी है।
आखिरकार मनुस्मृति और राहुल गांधी की इस बहस का केंद्र किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार नहीं होना चाहिए। केंद्र में होना चाहिए—भारत की महिला। क्या वह अपने नाम से पहचानी जाएगी? क्या उसे अपने जीवन के फैसले लेने की स्वतंत्रता होगी? क्या उसकी शिक्षा, करियर, विवाह और जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण फैसलों में उसकी अपनी इच्छा को समान महत्व मिलेगा? क्या उसे केवल किसी की बेटी, पत्नी या मां के रूप में नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और आकांक्षाओं वाली नागरिक के रूप में देखा जाएगा? अगर इन सवालों का जवाब ‘हां’ है, तो राहुल गांधी द्वारा उठाया गया मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का अर्थ ही यही है कि समाज समय के साथ अपने पुराने विचारों की समीक्षा करता रहे। परंपरा का सम्मान तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता के साथ टकराव पैदा न करे। और जहां टकराव हो, वहां सवाल पूछने से डरना नहीं चाहिए। राहुल गांधी ने मनुस्मृति के बहाने जिस सवाल को सामने रखा है, वह वास्तव में महिलाओं की स्वतंत्र पहचान का सवाल है। इस बहस को नारे, आरोप और राजनीतिक शोर में दबाने के बजाय गंभीरता से सुना जाना चाहिए। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह अपने सबसे बुनियादी सवालों से कितनी ईमानदारी से सामना करता है—और महिला की समानता तथा स्वतंत्रता से बड़ा बुनियादी सवाल शायद ही कोई हो।




