Home » International » कनाडा ने ट्रंप को दिखाई ‘आर्थिक ताकत’, अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार

कनाडा ने ट्रंप को दिखाई ‘आर्थिक ताकत’, अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | ओटावा/वॉशिंगटन | 27 अगस्त 2026

अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक रिश्तों में बढ़ता तनाव अब सिर्फ टैरिफ की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति अमेरिका के सामने उसके पड़ोसी और लंबे समय से सहयोगी रहे देश कितनी मजबूती से खड़े हो सकते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘दबाव डालो और समझौता कराओ’ वाली रणनीति को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस बार चुनौती दी है। दोनों देशों के बीच नए व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत अचानक टूट गई, कनाडा ने अमेरिकी सामान पर जवाबी शुल्क लगाने का रास्ता चुना और अब दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर के व्यापार पर असर पड़ने की आशंका है। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और कनाडा हर साल करीब 872 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार करते हैं। ऐसे में कनाडा का पीछे हटना ट्रंप प्रशासन की उस रणनीति की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका अपने आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल सहयोगियों से भी अपनी शर्तें मनवाने के लिए कर रहा है।

ट्रंप की रणनीति के सामने कनाडा का ‘ना’

कनाडा और अमेरिका के बीच मौजूदा विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है। इसकी जड़ें ट्रंप के पहले कार्यकाल तक जाती हैं, जब दोनों देशों के बीच पुराने NAFTA समझौते को बदलकर USMCA बनाया गया था। ट्रंप ने कनाडा के साथ व्यापार असंतुलन और अमेरिकी बाजार पर उसकी निर्भरता को लगातार निशाना बनाया। बाद में उन्होंने कनाडा को अमेरिका का संभावित ‘51वां राज्य’ तक कह दिया। ट्रंप प्रशासन का मूल तर्क यह रहा है कि कनाडा अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था से लाभ उठाता है, लेकिन व्यापार और रक्षा के मामले में अमेरिका को पर्याप्त फायदा नहीं देता। इसी सोच के तहत आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कनाडा और मैक्सिको को अमेरिकी दबाव के शुरुआती प्रमुख निशानों में रखा गया। लेकिन इस बार कनाडा ने संकेत दिया है कि वह केवल अमेरिकी दबाव के कारण अपनी शर्तें बदलने को तैयार नहीं है।

बातचीत टूटी, टैरिफ की नई लड़ाई शुरू

व्यापार समझौते के लिए चल रही बातचीत में उस समय बड़ा मोड़ आया जब कनाडा ने वार्ता से पीछे हटने का फैसला किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच नए दौर के टैरिफ की शुरुआत हुई। कनाडा ने अमेरिकी शुल्क के जवाब में ‘डॉलर-फॉर-डॉलर’ जवाब देने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत कनाडा आने वाले समय में अमेरिकी वस्तुओं पर जवाबी शुल्क बढ़ा सकता है। दूसरी ओर अमेरिका ने कनाडा में निर्मित वाहनों और ऑटो पार्ट्स पर 50 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने की धमकी दी है, हालांकि इसका सबसे बड़ा हिस्सा 2027 की शुरुआत तक प्रभावी नहीं होगा। यही समय दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगले कुछ महीनों में बातचीत दोबारा शुरू करने और टकराव को नियंत्रित करने की गुंजाइश बनी हुई है।

कनाडा के लिए यह फैसला आसान नहीं है। उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिकी बाजार से गहराई से जुड़ी हुई है और उसके लगभग 70 प्रतिशत निर्यात अमेरिका जाते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का तर्क है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में कनाडा को अपनी आर्थिक और रणनीतिक निर्भरता को कम करना होगा। उनका यह रुख सिर्फ तत्काल व्यापार विवाद तक सीमित नहीं है। कनाडा अब यूरोप और एशिया सहित दूसरे बाजारों के साथ अपने संबंध मजबूत करने और अपनी आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए करने की कोशिश कर सकता है।

ट्रंप के सामने कनाडा की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

कनाडा अमेरिका से सैन्य और आर्थिक रूप से छोटा देश है, लेकिन उसके पास ऐसे संसाधन हैं जिनका इस्तेमाल वह दबाव बनाने के लिए कर सकता है। इनमें ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और अमेरिका से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाएं शामिल हैं। कनाडा अगर इन क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों और बाजार तक पहुंच को सीमित करता है तो इसका असर अमेरिकी उद्योगों पर भी पड़ सकता है। यही वह बिंदु है जहां व्यापार युद्ध एकतरफा नहीं रह जाता।

विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी देश की ताकत केवल उसकी कुल GDP या सैन्य क्षमता से तय नहीं होती। असली ताकत उन महत्वपूर्ण संसाधनों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी होती है, जिन पर दूसरे देश निर्भर करते हैं। कनाडा के पास अमेरिका के खिलाफ इसी तरह के कई ‘लीवरेज’ मौजूद हैं। यही वजह है कि कनाडा का प्रतिरोध ट्रंप प्रशासन के लिए सामान्य व्यापार विवाद से अधिक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है।

JD वेंस की टिप्पणी से और बढ़ा तनाव

विवाद के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD वेंस की कथित निजी टिप्पणी ने भी कनाडा में नाराजगी बढ़ा दी। एक निजी फंडरेजर की लीक हुई ऑडियो रिकॉर्डिंग के अनुसार वेंस ने मार्क कार्नी को ‘बहुत प्यारा व्यक्ति’ कहने के बाद कथित तौर पर यह टिप्पणी की कि कार्नी डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा सख्त दिखने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः कई मुद्दों पर कनाडा पीछे हट जाता है। यह टिप्पणी कनाडा में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बनी। भले ही यह स्पष्ट नहीं है कि इसी टिप्पणी के कारण बातचीत टूटी, लेकिन इसने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा जरूर किया।

कनाडा के ओंटारियो प्रीमियर डग फोर्ड ने भी ट्रंप के खिलाफ बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें जवाब देने से पीछे नहीं हटे। यह संकेत है कि कनाडा में अमेरिकी दबाव के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर प्रतिरोध बढ़ रहा है।

अमेरिका की ताकत के सामने एक नई परीक्षा

ट्रंप की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करके दूसरे देशों को अपने हितों के अनुरूप फैसले लेने के लिए मजबूर कर सकता है। लेकिन कनाडा का मौजूदा रुख इस रणनीति की सीमा की परीक्षा ले रहा है। अमेरिका की तुलना में कनाडा छोटा है, लेकिन उसके पास जवाब देने की पर्याप्त क्षमता है। यही बात ईरान के मामले में भी अलग रूप में दिखाई देती है, जहां अमेरिका के मुकाबले कम ताकत रखने वाला देश भी समुद्री मार्गों और अमेरिकी सहयोगियों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

कनाडा के मामले में यह लड़ाई बंदूक और मिसाइलों की नहीं, बल्कि टैरिफ, ऊर्जा, खनिज, बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाओं की है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं इतनी जुड़ी हुई हैं कि लंबे समय तक चलने वाला व्यापार युद्ध अमेरिका और कनाडा दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है।

नवंबर के चुनाव भी बन सकते हैं अहम मोड़

इस पूरे विवाद के बीच अमेरिका में नवंबर के मध्यावधि चुनाव भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। यदि डेमोक्रेट्स को कांग्रेस में बड़ी सफलता मिलती है तो ट्रंप की नीतियों को आगे बढ़ाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी की मजबूत जीत ट्रंप को और आक्रामक आर्थिक नीति अपनाने के लिए राजनीतिक ताकत दे सकती है।

कनाडा संभवतः इसी राजनीतिक समयसीमा को भी ध्यान में रख रहा है। यदि उसे लगता है कि अमेरिकी घरेलू राजनीति आने वाले महीनों में ट्रंप की व्यापार नीति को प्रभावित कर सकती है तो ओटावा के पास बातचीत में अधिक समय लेने की गुंजाइश होगी।

क्या अमेरिका-कनाडा के रिश्ते स्थायी रूप से बदलेंगे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह विवाद केवल कुछ महीनों की व्यापारिक लड़ाई है या फिर अमेरिका और कनाडा के रिश्तों में लंबे समय का बदलाव शुरू हो चुका है। दोनों देश भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं और दशकों से उनकी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए पूरी तरह अलग होना आसान नहीं होगा। लेकिन मार्क कार्नी का यह संकेत कि बदली हुई परिस्थितियों में कनाडा पारंपरिक गठबंधनों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता, आने वाले वर्षों की दिशा का संकेत जरूर देता है।

अगर कनाडा अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी स्थिति बनाए रखता है और वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारों की तलाश तेज करता है, तो दूसरे अमेरिकी सहयोगी भी यह देखेंगे कि वॉशिंगटन की आर्थिक ताकत के सामने कितनी स्वतंत्र नीति अपनाई जा सकती है। यही कारण है कि कनाडा का मौजूदा प्रतिरोध केवल ओटावा और वॉशिंगटन के बीच व्यापार विवाद नहीं है। यह उस बड़े सवाल की परीक्षा है कि बदलती दुनिया में अमेरिका की शक्ति कितनी दूर तक दूसरे देशों को अपनी शर्तों पर चलने के लिए मजबूर कर सकती है।

कनाडा शायद अमेरिका से ज्यादा शक्तिशाली नहीं है, लेकिन उसने यह संदेश जरूर दिया है कि आर्थिक निर्भरता का मतलब राजनीतिक आत्मसमर्पण नहीं होता।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted