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ट्रंप-शी शिखर वार्ता के बाद अमेरिका में चीन पर सियासी संग्राम, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ने ताइवान मुद्दे पर दिखाई सख्ती

अंतरराष्ट्रीय / अमेरिका-चीन संबंध / राजनीति | एजेंसी / ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 19 मई 2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता के बाद वॉशिंगटन में चीन नीति को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार केवल डेमोक्रेट ही नहीं बल्कि रिपब्लिकन नेताओं ने भी ट्रंप प्रशासन को ताइवान और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सतर्क रहने की चेतावनी दी है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका की चीन नीति अब केवल व्यापार या आर्थिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी वर्चस्व और सैन्य संतुलन का केंद्रीय मुद्दा बन चुकी है।

ट्रंप और शी जिनपिंग की बीजिंग बैठक के दौरान व्यापार, कृषि आयात, बोइंग विमान सौदे और आर्थिक संवाद तंत्र जैसे मुद्दों पर कुछ सहमतियां सामने आईं। व्हाइट हाउस ने दावा किया कि चीन ने हर साल कम से कम 17 अरब डॉलर के अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने पर सहमति जताई है। हालांकि बीजिंग ने अभी तक सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है। लेकिन इन आर्थिक समझौतों से ज्यादा चर्चा उस मुद्दे की हो रही है जिस पर ट्रंप ने स्पष्ट रुख नहीं अपनाया — ताइवान।

अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों के नेताओं ने ट्रंप के बयानों पर चिंता जताई है। डेमोक्रेट नेताओं ने आरोप लगाया कि ट्रंप चीन के साथ सीमित आर्थिक लाभ के बदले अमेरिका की रणनीतिक स्थिति कमजोर कर सकते हैं। सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी के डेमोक्रेट सदस्यों ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ताइवान के समर्थन को लेकर अस्पष्टता पैदा की है, जो अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए खतरनाक संकेत हो सकता है।

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डेमोक्रेट सांसद रो खन्ना ने साफ कहा कि ताइवान को अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति “कोई मोलभाव का मुद्दा नहीं हो सकती।” उनका कहना था कि चीन के साथ व्यापारिक समझौतों के लिए ताइवान की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने चीन के रेयर अर्थ मिनरल्स और महत्वपूर्ण तकनीकी संसाधनों पर नियंत्रण को भी अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती बताया।

दूसरी तरफ रिपब्लिकन नेताओं ने भी चीन को लेकर सख्त रुख अपनाया। हाउस सिलेक्ट कमेटी ऑन चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन जॉन मूलिनार ने कहा कि अमेरिका को चीन के साथ “ताकत की स्थिति” से बातचीत करनी चाहिए। रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन ने चेतावनी दी कि आर्थिक वार्ता के नाम पर अमेरिका एशिया में अपनी सैन्य स्थिति या ताइवान के समर्थन को कमजोर नहीं कर सकता।

विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम अमेरिका की चीन नीति में आए बड़े बदलाव को दर्शाता है। कुछ साल पहले तक वॉशिंगटन में चीन पर बहस मुख्य रूप से व्यापार घाटे, टैरिफ और बाजार पहुंच को लेकर होती थी। लेकिन अब चीन को राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और सैन्य चुनौती के नजरिए से देखा जा रहा है। यही कारण है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट — दोनों दलों में चीन के खिलाफ सख्त रुख पर व्यापक सहमति दिखाई दे रही है।

ट्रंप की बीजिंग यात्रा के दौरान ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना रहा। शी जिनपिंग ने ट्रंप को चेतावनी दी कि यदि ताइवान मुद्दे को “गलत तरीके से संभाला गया” तो यह संघर्ष का कारण बन सकता है। वहीं ट्रंप ने संकेत दिया कि वे ताइवान को प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर पुनर्विचार कर सकते हैं। इस बयान ने वॉशिंगटन में राजनीतिक हलकों को और बेचैन कर दिया।

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विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और चीन के बीच अब प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई बन चुकी है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, सेमीकंडक्टर तकनीक, रेयर अर्थ मिनरल्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ताइवान जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव को और बढ़ा सकते हैं।

फिलहाल ट्रंप-शी वार्ता ने एक बात स्पष्ट कर दी है — चाहे अमेरिका में कोई भी पार्टी सत्ता में हो, चीन को लेकर वॉशिंगटन का रुख अब पहले से कहीं ज्यादा कठोर और रणनीतिक होता जा रहा है।

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