ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 नवंबर 2026
हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है, लेकिन हमारी सरकारें इन चेतावनियों को कितनी गंभीरता से ले रही हैं? पहाड़ों में होने वाली छोटी-सी हलचल कभी-कभी इतनी बड़ी तबाही बन जाती है कि नीचे बसे शहर, गांव और हजारों लोगों की जिंदगी प्रभावित हो जाती है। पहाड़ों से टूटकर गिरने वाली चट्टानें, ग्लेशियरों का खिसकना, अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन अब केवल प्राकृतिक घटनाएं नहीं रह गई हैं। इनके खतरे को समझना और उनसे बचने की तैयारी करना हमारी सबसे बड़ी जरूरत है।
अगस्त 2026 में तिब्बत-नेपाल क्षेत्र में लांगटांग लिरुंग के पास लगभग 5,000 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानों और बर्फ का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा। इसके बाद पानी, मलबे और चट्टानों का ऐसा सैलाब आया जिसने नीचे के नदी क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। हजारों लोगों के मारे जाने या लापता होने की खबरें सामने आईं।
इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि हिमालय में होने वाली प्राकृतिक हलचल का असर केवल उसी पहाड़ तक सीमित नहीं रहता। उसका पानी और मलबा सैकड़ों किलोमीटर दूर तक विनाश फैला सकता है।
ऐसे समय में भारत अरुणाचल प्रदेश में 11,200 मेगावाट क्षमता वाली विशाल सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (SUMP) बनाने की तैयारी कर रहा है। सरकार इसे चीन के तिब्बत में प्रस्तावित विशाल बांध का जवाब बता रही है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन के एक बड़े बांध का जवाब भारत को भी हिमालय में एक और विशाल बांध बनाकर देना चाहिए? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हम अपने ही पहाड़ों, नदियों और वहां रहने वाले लोगों का भविष्य खतरे में डाल सकते हैं?
चीन का बांध और भारत की चिंता
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन की प्रस्तावित मेदोग जलविद्युत परियोजना लगभग 60,000 मेगावाट क्षमता की बताई जा रही है। यह परियोजना नदी के उस विशाल मोड़ के पास प्रस्तावित है, जहां से यारलुंग त्सांगपो अरुणाचल प्रदेश की ओर बढ़ती है। भारत में यही नदी सियांग कहलाती है और आगे चलकर ब्रह्मपुत्र बन जाती है।
चीन का यह बांध भारत के लिए चिंता का विषय है। कारण साफ है। नदी का ऊपरी हिस्सा चीन के नियंत्रण में है। यदि चीन पानी रोकता है, अचानक छोड़ता है या नदी के बहाव में बड़ा बदलाव करता है, तो उसका असर भारत के निचले इलाकों पर पड़ सकता है।
पानी केवल जीवन और खेती का साधन नहीं है। आज के दौर में यह रणनीतिक ताकत भी बन चुका है। जिस देश के हाथ में नदी के ऊपरी हिस्से का नियंत्रण होता है, उसके पास नीचे रहने वाले देशों को प्रभावित करने की क्षमता भी होती है।
भारत इसी चिंता के जवाब में अरुणाचल प्रदेश में सियांग परियोजना को आगे बढ़ाना चाहता है। प्रस्तावित परियोजना की क्षमता 11,200 मेगावाट है और इसमें लगभग 9.2 अरब घन मीटर पानी जमा करने की योजना है।
सरकार का तर्क है कि इतना बड़ा जलाशय चीन की ओर से अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति में भारत को सुरक्षा दे सकता है। इससे बाढ़ को नियंत्रित करने और बिजली पैदा करने में भी मदद मिलेगी।
लेकिन क्या इतना बड़ा जलाशय हर खतरे को रोक सकता है? इसका जवाब इतना आसान नहीं है।
क्या बड़ा बांध हर बाढ़ को रोक सकता है?
किसी भी बांध की सुरक्षा और उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें कितना पानी जमा है, कितना पानी आने वाला है और उसे खाली करने के लिए कितना समय उपलब्ध है।
मान लीजिए कि चीन अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ देता है। भारत को इसकी सूचना पहले मिल जाती है, तब भी बांध में पर्याप्त खाली जगह होनी चाहिए। यदि जलाशय पहले से भरा हुआ है, तो वह अतिरिक्त पानी रोकने में कितना सक्षम होगा?
इसके अलावा हिमालय में खतरा केवल पानी का नहीं है। पहाड़ों से टूटकर आने वाली बड़ी चट्टानें, बर्फ और मिट्टी भी नदी के साथ नीचे आती हैं। यदि पहाड़ का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर जलाशय में गिर जाए, तो पानी में अचानक तेज हलचल पैदा हो सकती है। इससे बांध और उसके आसपास के इलाकों पर भारी दबाव पड़ सकता है।
इसलिए यह मान लेना कि भारत का विशाल बांध चीन की हर चाल या हर प्राकृतिक आपदा को रोक देगा, सही नहीं होगा।
यदि हम चीन के बांध को खतरनाक मानते हैं, तो अपनी परियोजना के खतरों को भी उसी गंभीरता से समझना होगा।
हिमालय की जमीन कितनी मजबूत है?
सियांग परियोजना को लेकर सबसे गंभीर सवाल इसकी भौगोलिक स्थिति का है।
हिमालय दुनिया के सबसे युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत क्षेत्रों में से एक है। भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों के लगातार टकराने से यहां भूकंप आते हैं। पहाड़ों में दरारें, भूस्खलन और जमीन का खिसकना आम घटनाएं हैं। मानसून की भारी बारिश इन खतरों को और बढ़ा देती है।
ऐसे संवेदनशील इलाके में अरबों घन मीटर पानी जमा करने वाला जलाशय बनाना सामान्य निर्माण कार्य नहीं है।
विशाल जलाशय में जमा पानी आसपास की चट्टानों और जमीन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे जलाशय-प्रेरित भूकंपीय गतिविधि कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बड़ा जलाशय भूकंप पैदा करेगा, लेकिन ऐसी संभावना का गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
एक और खतरा भूस्खलन का है। यदि पहाड़ का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर जलाशय में गिरता है, तो पानी में अचानक ऊंची लहरें उठ सकती हैं। लगातार मिट्टी और पत्थर आने से जलाशय में गाद जमा होगी। इससे पानी जमा करने की क्षमता घट सकती है और बाढ़ नियंत्रण का उद्देश्य भी प्रभावित हो सकता है।
अक्टूबर 2023 में सिक्किम की तीस्ता नदी पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) ने तीस्ता-3 जलविद्युत परियोजना को भारी नुकसान पहुंचाया था। ग्लेशियर झील से अचानक निकले पानी ने दिखा दिया कि पहाड़ों में प्रकृति की ताकत के सामने महंगी इंजीनियरिंग भी कमजोर पड़ सकती है।
लांगटांग की घटना और सिक्किम की त्रासदी को देखते हुए सियांग परियोजना पर जल्दबाजी में फैसला करना बेहद खतरनाक हो सकता है।
आदि समुदाय के लिए सियांग केवल नदी नहीं, मां है
इस परियोजना का सबसे बड़ा विरोध अरुणाचल प्रदेश के आदि समुदाय की ओर से सामने आ रहा है। उनकी चिंता को केवल विकास का विरोध बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
आदि समुदाय सियांग नदी को ‘आने सियांग’ यानी मां सियांग के रूप में देखता है। यह नदी उनके लिए केवल पानी का स्रोत नहीं है। उनकी संस्कृति, परंपरा, पहचान, खेती, मछली पकड़ने और पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली का आधार है।
प्रस्तावित जलाशय के कारण लगभग 27 गांवों के डूबने की आशंका जताई जा रही है। कुछ अनुमानों में 32 या उससे अधिक गांवों के अलग-अलग स्तर पर प्रभावित होने की बात कही गई है। वास्तविक संख्या और प्रभावित परिवारों का पता स्वतंत्र और पारदर्शी सर्वेक्षण से ही चल सकता है।
लेकिन सवाल केवल गांवों की संख्या का नहीं है।
इन गांवों में लोगों के खेत हैं, जंगल हैं, मछली पकड़ने के स्थान हैं और पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं। उनके धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल हैं। कई परिवारों की पहचान उनकी जमीन और नदी से जुड़ी हुई है।
सरकार किसी परिवार को नया मकान दे सकती है। जमीन के बदले मुआवजा भी दे सकती है। लेकिन क्या वह किसी समुदाय को उसके पूर्वजों की जमीन, उसकी परंपराएं और उसकी सांस्कृतिक पहचान वापस दे सकती है?
क्या किसी गांव को दूसरी जगह बसाने से उसकी सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था भी वैसी ही बन जाएगी?
यही वह सवाल है जिसे विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
लोगों की सहमति के बिना विकास किस काम का?
सियांग क्षेत्र में स्थानीय संगठनों, विशेषकर सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम, ने परियोजना से जुड़े सर्वेक्षणों और गतिविधियों पर आपत्ति जताई है। उनकी मांग है कि गांवों की पारंपरिक संस्थाओं और परिषदों को विश्वास में लिया जाए। स्थानीय लोगों की सहमति और अधिकारों को प्राथमिकता दी जाए।
23 अक्टूबर को पासीघाट में हुई हिंसा और तनाव की घटना भी बेहद चिंताजनक है। किसी भी आंदोलन में हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन लोगों की समस्याओं का जवाब पुलिस कार्रवाई या दबाव से देना भी समाधान नहीं है।
यदि किसी समुदाय को लगता है कि उसकी जमीन, नदी और भविष्य खतरे में है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उनसे बातचीत करे। उन्हें परियोजना की पूरी जानकारी दे और उनके सवालों का जवाब दे।
लोकतंत्र में विकास लोगों के लिए होता है, लोगों के ऊपर थोपा नहीं जाता।
टिहरी बांध से क्या सबक मिला?
भारत में बड़े बांधों के कारण विस्थापन और पुनर्वास का अनुभव नया नहीं है। उत्तराखंड का टिहरी बांध इसका बड़ा उदाहरण है।
टिहरी बांध के निर्माण के कारण पुराना टिहरी शहर जलमग्न हो गया और हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लोगों को नई जगह बसाया गया, लेकिन पुनर्वास, रोजगार और आजीविका से जुड़े सवाल लंबे समय तक बने रहे।
बिजली और पानी का लाभ दूर के शहरों तक पहुंचा, लेकिन अपनी जमीन और घर छोड़ने वाले पहाड़ी परिवारों को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
सियांग के मामले में भी यह समझना जरूरी है कि परियोजना से मिलने वाली बिजली का लाभ किसे मिलेगा और उसका सबसे बड़ा सामाजिक तथा पर्यावरणीय बोझ कौन उठाएगा।
डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा खर्च का सवाल
सियांग परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1.13 लाख करोड़ से 1.5 लाख करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। यदि इससे जुड़ी सड़कें, दूसरी निर्माण सुविधाएं, पुनर्वास, पर्यावरण सुरक्षा और नीचे के इलाकों की सुरक्षा का खर्च भी जोड़ा जाए, तो कुल वित्तीय बोझ 1.75 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
ये संभावित लागत के अनुमान हैं, स्वीकृत अंतिम बजट नहीं।
इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद भी परियोजना का काम खत्म नहीं होगा। बांध की देखभाल, गाद हटाना, भूस्खलन से सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और आसपास के गांवों की सुरक्षा पर लगातार पैसा खर्च करना पड़ेगा।
ब्रह्मपुत्र का पानी आगे असम से होते हुए बांग्लादेश की ओर जाता है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी बाढ़ और नदी कटाव की समस्याएं गंभीर हैं। इसलिए नदी के बहाव में किसी बड़े बदलाव का असर केवल अरुणाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। इसके प्रभावों का व्यापक अध्ययन जरूरी है।
चीन का मुकाबला कूटनीति से भी होना चाहिए
भारत को चीन की मेदोग परियोजना को लेकर अपनी चिंता दुनिया के सामने मजबूती से रखनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह सवाल उठाना चाहिए कि किसी एक देश को ऐसी विशाल नदी पर एकतरफा फैसला लेने का अधिकार कैसे मिल सकता है, जिसका पानी दूसरे देशों के करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा है।
भारत को चीन के साथ नदी के आंकड़ों, पानी के बहाव और आपातकालीन सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने की मांग करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और पर्यावरण संगठनों को भी इस मुद्दे से जोड़ना चाहिए।
चीन की चुनौती का जवाब केवल एक और बड़ा बांध बनाकर देना जरूरी नहीं है। बेहतर निगरानी व्यवस्था, समय पर चेतावनी, वैज्ञानिक अध्ययन, आपदा प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी राष्ट्रीय सुरक्षा के मजबूत हथियार हैं।
विकास जरूरी है, लेकिन लोगों और प्रकृति की कीमत पर नहीं
सियांग परियोजना पर फैसला लेने से पहले कुछ सवालों के जवाब देश के सामने रखे जाने चाहिए।
क्या परियोजना का स्वतंत्र भूकंपीय और भूगर्भीय अध्ययन हुआ है? क्या पूरे नदी क्षेत्र पर इसके प्रभाव का आकलन किया गया है? क्या आदि समुदाय के अधिकारों और उनकी सहमति को महत्व दिया गया है? क्या विस्थापित परिवारों के लिए जमीन, रोजगार और आजीविका की ठोस व्यवस्था है? क्या बांध टूटने या अचानक बाढ़ आने की स्थिति में नीचे रहने वाले लोगों की सुरक्षा की पूरी योजना तैयार है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। केवल सरकारी रिपोर्ट और परियोजना की बड़ी क्षमता दिखाकर लोगों की आशंकाओं को खत्म नहीं किया जा सकता।
हिमालय कोई खाली जमीन नहीं है, जहां जब चाहें विशाल बांध, सुरंगें और सड़कें बना दी जाएं। यह करोड़ों लोगों की जिंदगी, नदियों, जंगलों और जैव विविधता का आधार है। यहां एक गलत फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।
चीन अपनी महत्वाकांक्षा में हिमालय के पर्यावरण की अनदेखी करे, तो भारत को भी वही रास्ता अपनाने की जरूरत नहीं है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का मतलब केवल कितने मेगावाट बिजली पैदा हुई या जलाशय में कितना पानी जमा हुआ, यह नहीं है। असली सुरक्षा यह है कि देश के नागरिक सुरक्षित रहें, नदियां जीवित रहें, पहाड़ों का संतुलन बना रहे और किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा को रोका जा सके।
सियांग नदी को बचाना भी राष्ट्रीय हित है। चीन से मुकाबला जरूरी है, लेकिन हिमालय को दांव पर लगाकर नहीं।


