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WATCH VIDEO — ओम बिरला का पक्षपाती रवैया: संसद को बना दिया तानाशाही का मंच, इतिहास का सबसे घटिया अध्यक्ष!!

एबीसी नेशनल न्यूज | 3 फरवरी 2026

संविधान की कुर्सी या सत्ता की ढाल?

नई दिल्ली। संसद वह जगह है जहाँ देश की नब्ज़ धड़कती है—जहाँ सवाल उठते हैं, सरकार जवाब देती है और लोकतंत्र सांस लेता है। मगर आज वही संसद किसी बंद कमरे जैसी लग रही है। आवाज़ उठते ही माइक कट, सवाल आते ही नियमों की दीवार, और असहमति दिखते ही सस्पेंशन का डंडा। इस पूरे माहौल की जिम्मेदारी जिस कुर्सी पर टिकती है, वही कुर्सी अब सवालों के घेरे में है। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla पर विपक्ष का सीधा आरोप है कि उन्होंने निष्पक्षता छोड़ दी है और सदन को सत्ता की ढाल में बदल दिया है। आज संसद में लोकतंत्र कम और डर ज़्यादा दिखता है—डर सवालों का, डर बहस का, डर सच का।

जब नेता विपक्ष Rahul Gandhi बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो बार-बार “NOOOO” की दीवार खड़ी कर दी जाती है। कभी समय का बहाना, कभी नियमों की आड़—लेकिन वही नियम सत्तापक्ष के लिए रुई की तरह नरम हो जाते हैं। यह दोहरा मापदंड किसी एक नेता को रोकने का खेल नहीं है; यह संसद की आत्मा को दबाने का तरीका है। सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी क्या कहेंगे—सवाल यह है कि उन्हें कहने से रोका क्यों जा रहा है? क्या सच से डर है, या उन सवालों से जिनके जवाब सरकार के पास नहीं?

विपक्ष का कहना है कि अध्यक्ष का काम सरकार को बचाना नहीं, सदन को चलाना होता है। लेकिन आज तस्वीर उलटी है। विरोध दर्ज कराओ तो सस्पेंशन, मुद्दा उठाओ तो माइक ऑफ, और बहस की मांग करो तो कार्यवाही स्थगित। यह वही संसद है जहाँ शहीदों, सीमाओं पर हालात, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दों पर खुली बहस होनी चाहिए थी। मगर बहस से भागने की आदत बन चुकी है। डर किस बात का है—कि सवालों के जवाब नहीं हैं, या जवाब देने की हिम्मत नहीं?

सरकार का साया इस पूरे खेल में साफ दिखता है। प्रधानमंत्री Narendra Modi पर जैसे ही सवाल तेज़ होते हैं, अध्यक्ष की कुर्सी अचानक सख़्त हो जाती है। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर अब “रेफरी” नहीं रहे, बल्कि “टीम मैनेजर” बन चुके हैं—जहाँ विपक्ष को आउट करना ही रणनीति बन गई है। लोकतंत्र के लिए इससे खतरनाक कुछ नहीं कि नियम किताब में रहें और अमल सत्ता की मर्ज़ी से हो।

संसद के बाहर और सोशल मीडिया पर गुस्सा उबल रहा है। विपक्षी दल कह रहे हैं कि यह दौर इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज होगा—जब स्पीकर की कुर्सी ने संविधान से ज़्यादा सरकार की हिफाज़त की। संसद का मतलब होता है बहस, असहमति और जवाबदेही। अगर यही छीना जाएगा, तो संसद सिर्फ तालियों और आदेशों का हॉल बनकर रह जाएगी—जहाँ जनता की आवाज़ नहीं, सत्ता का शोर गूंजेगा।

निंदा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का मामला नहीं, पूरी व्यवस्था का सवाल है। अध्यक्ष की कुर्सी किसी पार्टी की जागीर नहीं होती। आज अगर विपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है, तो कल किसी और की भी दबेगी। तानाशाही यूँ ही नहीं आती—वह धीरे-धीरे आती है: माइक बंद करके, नियम मोड़कर, और कुर्सी की गरिमा गिराकर। देश आज पूछ रहा है—क्या संसद सत्ता की चौकी बन चुकी है? अगर हाँ, तो इसका हिसाब इतिहास ज़रूर मांगेगा।

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