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अमेरिका का दबाव: भारत ज्यादा वेनेजुएला तेल खरीदे, लेकिन राह आसान नहीं

मार्को रुबियो ने जामनगर रिफाइनरी में रिलायंस के अधिकारियों से की मुलाकात; भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की क्षमता के बावजूद आयात बढ़ाने में कीमत, अमेरिकी प्रतिबंध और ऊर्जा रणनीति बन सकते हैं बाधा

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026

अमेरिका चाहता है कि भारत वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात बढ़ाए, खासकर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के जरिए। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस के विशाल तेल रिफाइनिंग परिसर का दौरा किया। इस दौरान रिलायंस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वेनेजुएला के तेल की खरीद बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। अमेरिका की इस पहल के पीछे पश्चिमी गोलार्ध से ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने और वेनेजुएला के तेल व्यापार पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने की रणनीति देखी जा रही है। हालांकि, भारत के लिए ज्यादा तेल खरीदने का फैसला केवल कूटनीतिक आग्रह के आधार पर नहीं होगा। इसमें कीमत, उपलब्धता, भुगतान की शर्तें, अमेरिकी नियम और भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

रिलायंस की रिफाइनरी क्यों है खास?

रिलायंस का जामनगर परिसर दुनिया के सबसे बड़े एकल-स्थान रिफाइनिंग परिसरों में शामिल है। इसकी तकनीकी क्षमता इसे वेनेजुएला जैसे देशों से मिलने वाले अत्यधिक भारी और गाढ़े कच्चे तेल को संसाधित करने के लिए उपयुक्त बनाती है। वेनेजुएला का क्रूड सामान्य हल्के कच्चे तेल की तुलना में अधिक भारी होता है और इसे पेट्रोल, डीजल तथा अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने के लिए विशेष रिफाइनिंग तकनीक की जरूरत पड़ती है। जामनगर की जटिल रिफाइनिंग व्यवस्था इस लिहाज से रिलायंस को एक महत्वपूर्ण संभावित खरीदार बनाती है। भारत की कुछ अन्य रिफाइनरियां भी इस तरह के तेल को संसाधित कर सकती हैं, लेकिन सभी रिफाइनरियों की तकनीकी क्षमता और आर्थिक जरूरतें एक जैसी नहीं हैं।

अमेरिका क्यों चाहता है भारत बढ़ाए खरीद?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत को रिफाइनिंग क्षेत्र की बड़ी ताकत बताते हुए पश्चिमी गोलार्ध, विशेष रूप से वेनेजुएला से तेल खरीद बढ़ाने की पैरवी की है। भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरतों के लिए विभिन्न देशों से कच्चा तेल खरीदता है। अमेरिका के लिए भारतीय बाजार महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता वेनेजुएला के भारी तेल को संसाधित कर सकती है। इसके अलावा, वेनेजुएला के तेल व्यापार पर अमेरिकी निगरानी और नियमों के बीच भारत की खरीद अमेरिकी ऊर्जा नीति के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, अमेरिकी आग्रह अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि भारतीय कंपनियां बड़े पैमाने पर आयात बढ़ा देंगी।

आयात बढ़ाने में क्या हैं बाधाएं?

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती व्यावसायिक व्यवहार्यता की है। तेल की खरीद में केवल कच्चे तेल का घोषित मूल्य नहीं, बल्कि परिवहन, बीमा, भुगतान, रिफाइनिंग लागत और तैयार उत्पादों की बाजार कीमत भी देखी जाती है। यदि वेनेजुएला का भारी तेल अन्य उपलब्ध विकल्पों की तुलना में महंगा पड़ता है या उसकी आपूर्ति अनिश्चित रहती है, तो भारतीय रिफाइनरियां खरीद बढ़ाने से बच सकती हैं। इसके अलावा, अमेरिकी प्रतिबंधों और वेनेजुएला के तेल व्यापार पर लागू नियमों के कारण लेनदेन की शर्तें बदल सकती हैं। भारतीय कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी खरीद लागू नियमों के अनुरूप हो और भुगतान तथा आपूर्ति में अनावश्यक जोखिम न पैदा हों।

भारत की ऊर्जा रणनीति का सवाल

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल किसी एक देश से अधिक तेल खरीदना नहीं, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर आपूर्ति बनाए रखना है। रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य उत्पादक देशों से आयात का संतुलन भारत की ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा है। वेनेजुएला से खरीद बढ़ाने का अवसर मिलने पर भारतीय कंपनियां कीमत और तकनीकी जरूरतों के आधार पर इसका आकलन कर सकती हैं। लेकिन किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय विविध स्रोत बनाए रखना भारत के हित में रहेगा।

अब आगे क्या?

मार्को रुबियो की जामनगर यात्रा ने वेनेजुएला के तेल और भारत-अमेरिका ऊर्जा संबंधों को चर्चा में ला दिया है। रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमता इस व्यापार के लिए अवसर जरूर पैदा करती है, लेकिन आयात में वास्तविक बढ़ोतरी कीमत, उपलब्ध मात्रा, अमेरिकी नियमों और व्यावसायिक फैसलों पर निर्भर करेगी। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत के बाद भारत या रिलायंस वेनेजुएला से तेल की खरीद में कितनी वृद्धि करेंगे। आने वाले समय में आपूर्ति संबंधी समझौते और कंपनियों के फैसले ही बताएंगे कि अमेरिकी पहल का भारतीय ऊर्जा बाजार पर कितना असर पड़ता है।

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