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मोदी-शाह पर बढ़ते दबाव के बीच ओम बिरला को आगे करने का आरोप, ज्ञानेश कुमार को बचाने में जुटी सरकार?

SIR में करोड़ों वोट कटने के सवाल पर चुनाव आयोग घिरा; विपक्ष का हमला तेज, ओम बिरला के बयान से बढ़ा सियासी घमासान

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026

‘वोट चोरी’ और SIR के मुद्दे पर बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच अब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के बयान को लेकर विवाद तेज हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में नामों की कटौती और चुनावी निष्पक्षता पर उठे सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार अपने बचाव में खड़ी दिखाई दे रही है। विपक्षी खेमे का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर बढ़ते दबाव के बीच ओम बिरला के बयान को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव के तौर पर देखा जा रहा है।

विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है कि SIR के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही और प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों का समाधान कैसे किया गया। उसका कहना है कि लोकतंत्र में हर पात्र नागरिक को वोट देने का अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा करना चुनाव आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि किसी योग्य मतदाता का नाम सूची से हटाया गया है, तो उसके कारणों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए और शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा किया जाना चाहिए।

SIR पर सवाल, ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही की मांग

मतदाता सूची में नामों की कटौती को लेकर विपक्ष का हमला लगातार तेज हो रहा है। विपक्ष का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया ने चुनावी निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाब मांग रहा है और चाहता है कि नाम हटाने की प्रक्रिया, उसके आधार और शिकायतों के निपटारे का पूरा ब्योरा सामने आए।

विपक्ष का सवाल है कि जब करोड़ों मतदाताओं के नाम कटने को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, तो सरकार और चुनाव आयोग इस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब क्यों नहीं देते? मतदाता सूची में किसी भी बदलाव का असर सीधे नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार पर पड़ सकता है। इसलिए इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

ओम बिरला के बयान पर विपक्ष का निशाना

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव से जुड़ी चर्चा के बीच ओम बिरला ने कहा है कि कोई नया प्रस्ताव आने पर उस पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। विपक्ष का कहना है कि संसदीय प्रक्रिया का पालन अपनी जगह जरूरी है, लेकिन इससे SIR और मतदाता सूची से जुड़े सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

विपक्षी दल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई और चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले 2023 के कानून में बदलाव की मांग उठा चुके हैं। इस पूरे विवाद ने सरकार, चुनाव आयोग और संसद की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।

मोदी-शाह पर दबाव, सरकार की भूमिका पर सवाल

विपक्ष बीजेपी पर चुनावी व्यवस्था का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगा रहा है। उसका कहना है कि यदि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी है, तो मतदाता सूची में नामों की कटौती और शिकायतों के निपटारे से जुड़ी जानकारी विस्तार से सार्वजनिक की जानी चाहिए। विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग के बीच सरकार और संसद का रुख क्या है।

ओम बिरला के बयान को लेकर विपक्षी हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या संसदीय प्रक्रिया का हवाला देकर राजनीतिक विवाद को टालने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, सरकार की मंशा या किसी व्यक्ति की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर उठे सवालों का समाधान जरूरी है।

लोकतंत्र में वोट का अधिकार सर्वोपरि

वोट चोरी के मुद्दे ने चुनावी पारदर्शिता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब चुनाव आयोग को SIR, नामों की कटौती और शिकायतों के निपटारे पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रहे।

लोकतंत्र में जनता का वोट सत्ता की बुनियाद है। इसलिए मतदाता सूची पर उठे सवालों को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और जवाबदेही ही जनता का भरोसा कायम कर सकती है।

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