राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | लखनऊ | 22 अक्टूबर 2026
वोटर लिस्ट में गड़बड़ी को अब छोटी-मोटी तकनीकी गलती बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा मामला इतना गंभीर है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय को जांच करानी पड़ी, गड़बड़ी की पुष्टि करनी पड़ी और जिम्मेदार अधिकारियों तथा कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश देने पड़े। 21 अक्टूबर को जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में साफ कहा गया कि कुछ मतदाताओं के EPIC नंबर ऑनलाइन खोजने पर किसी दूसरे मतदाता का विवरण दिखाई दे रहा था।
सवाल सीधा है—जब मतदाता पहचान संख्या किसी व्यक्ति की है, तो उसके साथ किसी दूसरे व्यक्ति का विवरण क्यों दिखाई दे रहा था? मतदाता सूची तैयार करने और उसकी जांच करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, वे इस गड़बड़ी को समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाए? और यदि ऐसे मामले एक से अधिक हैं, तो क्या इसकी जड़ तक पहुंचने के लिए पर्याप्त जांच हुई है?
वोट के अधिकार से खिलवाड़ कोई मामूली मामला नहीं
मतदाता सूची में नाम और पहचान का सही मिलान चुनावी व्यवस्था की बुनियादी शर्त है। वोट केवल एक संख्या नहीं, नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि किसी मतदाता की पहचान से जुड़ा रिकॉर्ड गलत दिखाई देता है, तो मतदान के समय उसके सामने परेशानी खड़ी हो सकती है। इसलिए ऐसी गड़बड़ी को मामूली मानकर छोड़ देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा होगा।
राजनीतिक रूप से इसे वोट के अधिकार पर डाका कहकर सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन इस मामले में जानबूझकर वोट चुराने या किसी बड़ी साजिश का निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है, जब जांच में उसके प्रमाण सामने आएं। फिलहाल आधिकारिक तौर पर गड़बड़ी की पुष्टि हुई है; अब जरूरत है कि उसके कारणों और जिम्मेदार लोगों की पूरी पड़ताल हो।
कार्रवाई का आदेश, लेकिन क्या जवाबदेही भी तय होगी?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और वीआरसी ऑपरेटर को मतदाता सूची के काम से तत्काल हटाने तथा उनके खिलाफ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी स्पष्ट रिपोर्ट मांगी गई है।
यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जांच यहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि गलत विवरण किस चरण में दर्ज हुआ, किसने उसकी जांच की, अंतिम सूची में वह कैसे पहुंचा और निगरानी की व्यवस्था कहां विफल रही। यदि जिम्मेदारी उच्च स्तर तक जाती है, तो वहां भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके पूरे मामले को बंद कर देना पर्याप्त नहीं होगा।
दो दिन में पूरे उत्तर प्रदेश की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए पीलीभीत जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की इसी बिंदु पर जांच कर दो दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। उत्तर प्रदेश के सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को भी अपने-अपने जिलों के सभी विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की गहन जांच कर दो दिनों में रिपोर्ट देने को कहा गया है।
अब यह जांच निर्णायक होगी। यदि अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी त्रुटियां मिलती हैं, तो उनकी संख्या, कारण और प्रभावित मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। हर गलत रिकॉर्ड को ठीक किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी पात्र मतदाता को अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करने में बाधा न आए।
देश के साथ गद्दारी का सवाल भावनाओं से नहीं, प्रमाणों से तय होगा
मतदाता के अधिकार को नुकसान पहुंचाने वाली जानबूझकर की गई गड़बड़ी बेहद गंभीर अपराध हो सकती है। लेकिन किसी अधिकारी या व्यक्ति को देश का गद्दार घोषित करना जांच और प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। देश के प्रति जिम्मेदारी का अर्थ है कि मतदाता सूची में हुई गड़बड़ी को पूरी गंभीरता से लिया जाए, दोषी पाए जाने वालों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और किसी भी स्तर पर जिम्मेदार व्यक्ति को बचाया न जाए।
अब चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का भरोसा बहाल करने की है। कितने EPIC नंबर प्रभावित हुए? कितने मतदाताओं का विवरण गलत मिला? कितने रिकॉर्ड सुधारे गए? क्या किसी पात्र मतदाता को मतदान में परेशानी हुई? और जांच में किन अधिकारियों की भूमिका सामने आई? इन सभी सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
वोट की सुरक्षा पर समझौता नहीं
पीलीभीत का मामला चेतावनी है कि मतदाता सूची की शुद्धता को केवल कागजी प्रक्रिया समझकर नहीं चलाया जा सकता। चुनावी व्यवस्था में गलती हो तो उसे स्वीकार करना पहला कदम है; उसे सुधारना, कारणों की जांच करना और जवाबदेही तय करना अगला कदम है।
वोट के अधिकार पर डाका डालने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। लेकिन दोष तय करने का आधार राजनीतिक नारा नहीं, निष्पक्ष जांच और ठोस प्रमाण होने चाहिए। जनता को आधे-अधूरे जवाब नहीं, पूरी सच्चाई चाहिए।



