राष्ट्रीय/राजनीति/संसद | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 अगस्त 2026
संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव कम होने के बजाय और तेज होता दिखाई दे रहा है। सोमवार को एक तरफ राज्यसभा ने Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 को विपक्षी दलों के वॉकआउट के बीच पारित कर दिया, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में लगातार नारेबाजी और विरोध के कारण कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और अंततः सदन को मंगलवार तक के लिए स्थगित करना पड़ा।
संसद का मौजूदा सत्र 13 अगस्त को समाप्त होना है। ऐसे में सरकार के सामने लंबित विधेयकों को पारित कराने की चुनौती है, जबकि विपक्ष छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने पर अड़ा हुआ है।
बैंकिंग कानून में बदलाव—डिजिटल दौर के हिसाब से जरूरी कदम
राज्यसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 1891 के कानून के दौर से भारत की अर्थव्यवस्था काफी बदल चुकी है। बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन तेजी से डिजिटल हो चुके हैं और आज कई सेवाएं मोबाइल तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संचालित होती हैं।
सरकार का तर्क है कि पुराने कानून को आधुनिक डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप बदलना जरूरी है। इससे बैंक रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक वित्तीय दस्तावेजों को लेकर कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और मौजूदा तकनीकी व्यवस्था के अनुरूप हो सकती है। सरकार इसे बैंकिंग व्यवस्था में भरोसा और पारदर्शिता मजबूत करने की दिशा में कदम बता रही है।
लेकिन विपक्ष का वॉकआउट लोकतांत्रिक चिंता भी
विधेयक पारित होने के समय विपक्षी सांसदों का सदन से बाहर चले जाना संसद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वित्त मंत्री ने भी विपक्ष के वॉकआउट को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर विपक्ष को चर्चा में भाग लेना चाहिए।
यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं है। संसद केवल विधेयक पारित करने की जगह नहीं, बल्कि कानूनों की बारीक जांच, सरकार से सवाल और संभावित कमियों पर बहस का मंच भी है। यदि विपक्ष लगातार सदन से बाहर रहता है तो कानून के अलग-अलग पहलुओं पर उसकी आपत्तियां रिकॉर्ड में आने का अवसर कम हो जाता है।
लेकिन दूसरी तरफ सरकार के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित की जा रही है। यदि सदन में लगातार हंगामा हो और विधेयक बिना पर्याप्त बहस के आगे बढ़ें, तो संसदीय समीक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
छात्रों का मुद्दा बना सबसे बड़ा राजनीतिक टकराव
संसद के बाहर और भीतर विपक्ष का सबसे बड़ा मुद्दा फिलहाल छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई है। 20 जुलाई को NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहा है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पैलेट गन, लाठी और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
सरकार ने अब इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार होने का संकेत दिया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि सरकार छात्रों के आंदोलन पर विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है और अमित शाह इस चर्चा का जवाब देंगे। सरकार ने विपक्ष से अपील की है कि गृह मंत्री के जवाब के दौरान सदन में व्यवधान न डाला जाए।
सरकार की पहल सकारात्मक, लेकिन विपक्ष का अविश्वास कायम
सरकार की ओर से छात्रों के मुद्दे पर चर्चा और गृह मंत्री के जवाब की पेशकश को गतिरोध तोड़ने की कोशिश माना जा सकता है। यदि अमित शाह सदन में पुलिस कार्रवाई, छात्रों की मांगों और सरकार के रुख पर विस्तार से जवाब देते हैं, तो इससे लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक विवाद को तथ्यात्मक बहस की दिशा मिल सकती है।
लेकिन विपक्ष अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि केवल चर्चा का प्रस्ताव पर्याप्त नहीं, बल्कि सरकार को पुलिस कार्रवाई पर जवाबदेही भी तय करनी चाहिए।
यही वजह है कि संसद के भीतर राजनीतिक टकराव अभी खत्म होता नहीं दिख रहा।
चार दिन बाकी, बड़ा सवाल—संसद चलेगी या फिर हंगामा?
मानसून सत्र खत्म होने में अब सिर्फ कुछ दिन बाकी हैं। सरकार के एजेंडे में Tribunals Reforms Bill, Mines and Minerals Amendment Bill, Kerala का नाम बदलने से जुड़ा विधेयक और अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव हैं। कुछ विधेयक सदन में पेश भी किए जा चुके हैं।
सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार डिजिटल अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था जैसे बदलते क्षेत्रों के लिए पुराने कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाने की कोशिश कर रही है। नकारात्मक पक्ष यह है कि लगातार हंगामे, वॉकआउट और स्थगन के बीच संसदीय बहस का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के पास बहुमत होना जरूरी है, लेकिन विपक्ष की आवाज सुनना भी उतना ही जरूरी है। वहीं विपक्ष के लिए भी यह जिम्मेदारी है कि वह विरोध के साथ-साथ विधेयकों पर बहस में भाग ले और अपनी आपत्तियां सदन के रिकॉर्ड पर रखे। अब अगले तीन दिन तय करेंगे कि संसद बहस और जवाबदेही का मंच बनती है या राजनीतिक टकराव का अखाड़ा।




