अपराध | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 25 सितंबर 2026
तमिलनाडु के चर्चित Gem Granites कारोबारी आर. वीरमणि से जुड़ा POCSO मामला अब सिर्फ एक कारोबारी के खिलाफ नाबालिग से यौन अपराध के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है। मामला अब पुलिस की शुरुआती जांच, उसे बंद करने की कोशिश, अदालत के हस्तक्षेप, नए बयानों, डिजिटल सबूतों, वित्तीय लेन-देन और शुरुआती जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की भूमिका तक पहुंच चुका है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस मामले में पुलिस के पास एक वीडियो था, FIR दर्ज हुई थी और घटना से जुड़े स्थान तक पुलिस पहुंची थी, उसी मामले में फरवरी 2026 में आगे की कार्रवाई रोकने की रिपोर्ट क्यों दाखिल की गई? अब इसी शुरुआती जांच की दोबारा समीक्षा हो रही है।
कहानी की शुरुआत एक लिफाफे और पेन ड्राइव से हुई
मामला 6 अक्टूबर 2025 को सामने आया। एक 42 वर्षीय बाल अधिकार कार्यकर्ता के कार्यालय में एक अज्ञात व्यक्ति पहुंचा और एक लिफाफा देकर चला गया। लिफाफे में एक कागज और पेन ड्राइव थी। कागज में वीरमणि का नाम था और उसमें एक नाबालिग लड़की से यौन अपराध होने का दावा किया गया था। बताया गया कि इससे जुड़ा वीडियो पेन ड्राइव में मौजूद है। बाल अधिकार कार्यकर्ता ने पुलिस को शिकायत दी और उसी दिन पेन ड्राइव पुलिस की Anti-Vice Squad तक पहुंची। 7 अक्टूबर 2025 को POCSO Act की Sections 7 और 8 के तहत FIR दर्ज की गई। इसके 2 दिन बाद जांच Anti-Vice Squad के ACP को सौंप दी गई।
इसके बाद पुलिस ने वीडियो में दिखाई दे रही जगह और उससे जुड़े लोगों की जानकारी जुटानी शुरू की। शिकायत में जिस मकान का जिक्र था, वहां पुलिस पहुंची। वीरमणि और उनकी सहयोगी शांति से पूछताछ की गई। आसपास रहने वाले लोगों और मकान में काम करने वाले लोगों से भी जानकारी ली गई। लेकिन शुरुआती जांच के दौरान पुलिस के सामने कई सवाल आए। वीडियो में दिखाई देने वाली लड़की की पहचान नहीं हो पा रही थी। उसकी उम्र भी तय नहीं हो सकी थी। पुलिस के अनुसार, कथित घटना की मूल DVR रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध नहीं हो पाई।
फरवरी में पुलिस ने कहा—आगे कार्रवाई का आधार नहीं
जांच के दौरान वीरमणि ने वीडियो में मौजूद व्यक्ति होने से इनकार किया। शांति ने भी वीडियो में दिखाई दे रही जगह को अपना मकान मानने से इनकार किया। पुलिस ने आसपास के लोगों से पूछताछ की और कुछ लोगों ने कहा कि उस मकान में बाहरी लोगों का आना-जाना नहीं था। जिस अज्ञात व्यक्ति ने पेन ड्राइव पुलिस तक पहुंचाई थी, उसका भी पता नहीं चल सका। लड़की की पहचान और उम्र की पुष्टि भी नहीं हो पाई।
इन परिस्थितियों को आधार बनाते हुए Anti-Vice Squad ने 18 फरवरी 2026 को मामले में “Further Action Dropped” की रिपोर्ट दाखिल कर दी। यानी पुलिस ने उस समय आगे की कार्रवाई रोकने की रिपोर्ट अदालत के सामने रखी। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
विशेष POCSO अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और जांच आगे बढ़ाने का रास्ता खुला रखा। यही वह मोड़ था, जिसके बाद मामले की दिशा बदल गई। अदालत के हस्तक्षेप के बाद जांच फिर आगे बढ़ी और पुलिस उस लड़की तक पहुंचने में सफल रही, जिसकी पहचान शुरुआती जांच के दौरान नहीं हो पाई थी।
जिस लड़की को पुलिस खोज नहीं पाई थी, वह आखिरकार मिल गई
जांच दोबारा आगे बढ़ने के बाद पुलिस उस लड़की तक पहुंची, जो मूल वीडियो में दिखाई दे रही थी। पुलिस के अनुसार, लड़की ने वीडियो में मौजूद व्यक्ति की पहचान की और उसका बयान Judicial Magistrate के सामने दर्ज किया गया। पुलिस का कहना है कि घटना के समय वह नाबालिग थी।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि शुरुआती जांच में लड़की की पहचान और उसके ठिकाने का पता नहीं चलना पुलिस के सामने बड़ी बाधा माना गया था। अब उसी लड़की का बयान जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
इसके बाद जांच का दायरा भी बढ़ा। पुलिस ने कुछ अन्य महिलाओं और लड़कियों की पहचान की, जिन्हें मामले में संभावित पीड़ित माना जा रहा है। कम से कम 7 अन्य पीड़ितों के बयान दर्ज किए गए हैं। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या मामले में और लोग प्रभावित हुए हैं। हालांकि, इन सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में होने वाली न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी।
29 अगस्त को वीरमणि और 2 अन्य गिरफ्तार
जांच आगे बढ़ने के बाद 29 अगस्त 2026 को वीरमणि को गिरफ्तार किया गया। उनके साथ शांति और उनके पति महेंद्र सिम्हन को भी गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने शांति और महेंद्र पर अपराधों में मदद करने तथा सबूतों से छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट करने से जुड़े आरोप लगाए हैं। अदालत ने तीनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
जांच में एक और नाम सामने आया—गणेशन। वह वीरमणि की कंपनी में करीब 23 साल तक काम कर चुका था। पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार किया। पुलिस का दावा है कि उसके मोबाइल फोन में वीरमणि और एक नाबालिग लड़की से जुड़ा वीडियो मिला। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि वीडियो गणेशन तक कैसे पहुंचा और उसके पास मौजूद होने के बावजूद इसकी जानकारी अधिकारियों को क्यों नहीं दी गई। मोबाइल से किसी डेटा को हटाए जाने की भी जांच की जा रही है।
पुलिस ने एक पीड़ित के अनुसूचित जाति समुदाय से होने की जानकारी सामने आने के बाद मामले में SC/ST Act की धाराएं भी जोड़ी हैं।
अब जांच पुलिस के भीतर भी पहुंच गई है
मामले का सबसे महत्वपूर्ण नया पहलू यही है। Central Crime Branch ने शुरुआती जांच से जुड़े एक ACP और 2 निरीक्षकों को पूछताछ के लिए बुलाया है। जांच का एक हिस्सा यह पता लगाने पर केंद्रित है कि शुरुआती जांच में कोई चूक हुई थी या किसी स्तर पर जांच को कमजोर किया गया।
वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वीरमणि से जुड़े लोगों और पुलिस अधिकारियों के बीच कोई आर्थिक संपर्क था या नहीं। हालांकि, यह जांच अभी चल रही है और इन बातों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
पुलिस ने वीरमणि से जुड़े 5 ठिकानों पर भी तलाशी ली है। इनमें Dr Radhakrishnan Salai स्थित कार्यालय और Teynampet का एक गेस्ट हाउस शामिल हैं। तलाशी के दौरान मोबाइल फोन और डिजिटल सामग्री जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। एक कथित सहयोगी के खिलाफ Look Out Circular भी जारी किया गया है। पुलिस अब संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों और फरवरी के आसपास हुए वित्तीय लेन-देन की भी जांच कर रही है।
दो वरिष्ठ IPS अफसर भी पद से हटाए गए
मामले में 24 सितंबर को तमिलनाडु सरकार ने 2 वरिष्ठ IPS अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया। तमिलनाडु पुलिस अकादमी के ADGP ए. अरुण और कोयंबटूर के पुलिस आयुक्त एन. कन्नन को तत्काल प्रभाव से उनके पदों से स्थानांतरित कर compulsory wait पर भेज दिया गया।
दोनों अधिकारी उस समय चेन्नई पुलिस आयुक्तालय में महत्वपूर्ण पदों पर थे, जब वीरमणि के खिलाफ पहली शिकायत सामने आई थी। हालांकि, सरकार के आदेश में दोनों अधिकारियों को हटाने की वजह नहीं बताई गई है। इसलिए इस प्रशासनिक कार्रवाई को अपने आप में किसी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी या दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
मामले की शुरुआती जांच संभालने वाली ACP एम.ए. यास्मीन का भी तबादला किया गया है। अब यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि शुरुआती जांच में क्या हुआ था और उस समय मामले को आगे बढ़ाने के बजाय “Further Action Dropped” रिपोर्ट क्यों दाखिल की गई।
राजनीतिक विवाद भी तेज
मामले ने तमिलनाडु की राजनीति में भी विवाद पैदा कर दिया है। TVK सरकार के मंत्रियों ने पिछली DMK सरकार पर मामले को पर्याप्त गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाने के आरोप लगाए हैं और सवाल उठाया है कि जब पुलिस के पास वीडियो मौजूद था तो जांच रोकने की नौबत क्यों आई।
दूसरी ओर DMK ने इन आरोपों को खारिज किया है। DMK के वरिष्ठ वकील एन. आर. एलंगो ने कहा है कि पुलिस ने अक्टूबर 2025 में मामला दर्ज किया था, तलाशी और जांच की थी और उस समय पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने के कारण आगे की कार्रवाई रोकने की रिपोर्ट दाखिल की गई थी। उनका कहना है कि इस रिपोर्ट का मतलब यह नहीं था कि भविष्य में नए सबूत मिलने पर जांच आगे नहीं बढ़ सकती।
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने मामले की शुरुआती जांच की समीक्षा और अगर किसी स्तर पर जांच दबाने या उसमें देरी करने की बात सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। पुलिस के अनुसार, अतिरिक्त आयुक्त और IGP नरेंद्रन नायर को मामले की समीक्षा का जिम्मा दिया गया है।
सबसे बड़ा सवाल—अगर अदालत ने रिपोर्ट मान ली होती तो?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। अगर विशेष POCSO अदालत पुलिस की “Further Action Dropped” रिपोर्ट स्वीकार कर लेती, तो क्या वीडियो में दिखाई देने वाली लड़की कभी सामने आती? क्या उसका बयान दर्ज होता? क्या अन्य कथित पीड़ितों तक पुलिस पहुंच पाती? क्या 29 अगस्त की गिरफ्तारियां होतीं?
इन सवालों का निश्चित जवाब देना संभव नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद जांच की दिशा बदल गई। जो मामला फरवरी 2026 में आगे की कार्रवाई रोकने की स्थिति तक पहुंच गया था, वही मामला बाद में नए बयानों, गिरफ्तारियों, डिजिटल सबूतों, तलाशी और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच तक पहुंच गया।
अब इस मामले की असली परीक्षा यही है कि जांच कितनी निष्पक्ष और कितनी गहराई से आगे बढ़ती है। अगर शुरुआती जांच में कोई गलती हुई थी तो उसका कारण सामने आना चाहिए। अगर किसी अधिकारी ने जानबूझकर जांच को कमजोर किया, तो उसके लिए भी कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और अगर शुरुआती पुलिस कार्रवाई नियमों के मुताबिक थी, तो उसका आधार भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए।
अक्टूबर 2025 में एक लिफाफे और पेन ड्राइव से शुरू हुई यह कहानी अब कई सवालों के बीच खड़ी है। एक तरफ वीरमणि और अन्य आरोपियों के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच चल रही है, दूसरी तरफ यह भी पता लगाया जा रहा है कि शुरुआती जांच में क्या हुआ था और उसे फरवरी में रोकने की नौबत क्यों आई। POCSO जैसे संवेदनशील मामले में अंतिम सच न राजनीतिक आरोप तय कर सकते हैं, न मीडिया की सुर्खियां—अंतिम फैसला जांच में जुटाए गए सबूत और अदालत में उनकी कानूनी जांच से ही होगा।



