ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 सितंबर 2026
लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ चुनाव में नहीं होती। उसकी असली ताकत इस बात में होती है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसके ऊपर संविधान और कानून की निगरानी कितनी मजबूत है। अमेरिका से आई एक घटना इसी बुनियादी सवाल को फिर सामने खड़ा करती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने CNN, MS NOW और Politico के पत्रकारों की व्हाइट हाउस पहुंच रोक दी। पत्रकार अदालत पहुंचे और संघीय जिला अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए उनकी पहुंच बहाल करने का आदेश दिया। जज टिमोथी केली ने कहा कि सरकार किसी संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार को छीनने से पहले संबंधित व्यक्ति को सूचना और अपनी बात रखने का अवसर देने के सामान्य सिद्धांत का पालन करे। यानी राष्ट्रपति शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन अदालत के सामने राष्ट्रपति भी कानून के दायरे में है।
यहां से भारत के लिए सवाल शुरू होता है। क्या भारत में भी आम नागरिक को हमेशा यह भरोसा महसूस होता है कि सरकार के सामने अदालत उतनी ही स्वतंत्र और निर्णायक दीवार बनकर खड़ी होगी? यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि भारतीय अदालतें सरकार के पक्ष में ही फैसला करती हैं। भारतीय न्यायपालिका ने कई मौकों पर सरकारों के फैसलों पर रोक लगाई है, नागरिक अधिकारों की रक्षा की है और कार्यपालिका को जवाबदेह बनाया है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे मामले भी हैं जहां फैसले में लंबा समय लगा और इस देरी के कारण अदालत के अंतिम फैसले का व्यावहारिक असर सीमित हो गया। लोकतंत्र में न्याय सिर्फ सही फैसला देने का नाम नहीं है; समय पर न्याय मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यही बात चुनाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। जब मतदाता सूची, SIR, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता या चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जैसे सवाल अदालत के सामने आते हैं, तब हर दिन की देरी का अपना राजनीतिक और संवैधानिक महत्व होता है। उदाहरण के लिए SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने अंततः इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटना अपने आप में किसी व्यक्ति के भारतीय नागरिक न होने का अंतिम फैसला नहीं है और कुछ मामलों को नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना होगा।
इस फैसले से एक बात बिल्कुल साफ होती है—SIR को “अवैध” कहना भी सही नहीं है और SIR के दौरान उठी हर आपत्ति को नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। अदालत ने प्रक्रिया को संवैधानिक माना, लेकिन प्रक्रिया में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए सीमाएं और आगे की प्रक्रिया भी बताई। यही न्यायपालिका का काम है—न तो सरकार का प्रवक्ता बनना और न विपक्ष का प्रवक्ता; बल्कि संविधान की कसौटी पर हर कार्रवाई को परखना।
लेकिन भारत में असली चिंता केवल फैसले की दिशा नहीं, फैसले की गति भी है। अगर किसी कानून या सरकारी फैसले को चुनौती देने वाली याचिका वर्षों तक अदालत में लंबित रहती है, तब तक सरकार उस कानून को लागू कर सकती है, प्रशासन उस पर कार्रवाई कर सकता है और नागरिक उसके प्रभाव को झेल सकते हैं। बाद में अदालत अगर उस कार्रवाई को गलत ठहराती भी है, तो सवाल रह जाता है—जो समय बीत गया, उसे कौन वापस करेगा?
यही वजह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की चर्चा केवल इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि अदालत ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया या सरकार के खिलाफ। असली कसौटी यह है कि अदालत ने मामले को कितनी स्वतंत्रता से सुना, सभी पक्षों को बराबर अवसर दिया, अपने फैसले के कारण स्पष्ट किए और जरूरत पड़ने पर समय रहते अंतरिम राहत दी या नहीं। किसी भी लोकतंत्र में अदालत का काम सरकार को हर मामले में रोकना नहीं है। उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार संविधान की सीमा के भीतर रहे।
भारत में चुनाव आयोग की नियुक्ति को लेकर चल रही संवैधानिक बहस इसका अच्छा उदाहरण है। 2023 के कानून में CEC और EC की नियुक्ति वाली चयन समिति से CJI को बाहर रखा गया है। इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में सुनवाई करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर गंभीर संवैधानिक सवालों पर विचार किया। अदालत ने संसद की ओर से कानून बनाने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए थे।
इसी तरह SIR के मामले में भी अदालत के सामने गंभीर सवाल पहुंचे। लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए, बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल हुईं और अदालत को लगातार चुनाव आयोग से आंकड़े मांगने पड़े। सितंबर 2026 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की। कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं। यह आंकड़ा अपने आप में किसी “वोट चोरी” को साबित नहीं करता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि मतदाता सूची में बदलाव कितना बड़ा और संवेदनशील प्रशासनिक अभ्यास है।
अब अमेरिका की घटना पर लौटिए। वहां अदालत ने यह तय नहीं किया कि ट्रंप अच्छे राष्ट्रपति हैं या खराब। उसने यह भी नहीं कहा कि पत्रकारों की खबरें सही हैं या गलत। अदालत ने सिर्फ यह देखा कि सरकार ने संवैधानिक अधिकारों से जुड़े एक मामले में उचित प्रक्रिया का पालन किया या नहीं। यही न्यायपालिका की ताकत है। व्यक्ति नहीं, प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। सत्ता नहीं, संविधान सर्वोच्च है।
भारत को भी इसी कसौटी पर अपनी न्याय व्यवस्था को देखना होगा। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अदालत किस पार्टी के पक्ष में फैसला कर रही है। सवाल यह होना चाहिए कि क्या अदालत हर नागरिक, हर सरकार और हर राजनीतिक दल के लिए समान संवैधानिक मानक लागू कर रही है? अगर BJP सरकार का कोई फैसला कानून सम्मत है तो अदालत को उसे कायम रखना चाहिए। अगर वही सरकार संविधान की सीमा पार करती है तो अदालत को बिना किसी दबाव के उसे रोकना चाहिए। यही नियम कांग्रेस, TMC, AAP, BJP या किसी भी दूसरी पार्टी की सरकार पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में अदालत सरकार की दुश्मन नहीं होती। लेकिन अदालत सरकार की सहायक भी नहीं हो सकती। अदालत संविधान की अदालत होती है। अमेरिका की इस घटना से भारत को यही सबक लेना चाहिए कि न्यायपालिका की असली प्रतिष्ठा सरकार को हर बार हराने में नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सरकार के सामने खड़े होने की उसकी संस्थागत क्षमता में है। और उससे भी बड़ा सवाल है—जब किसी नागरिक का अधिकार आज प्रभावित हो रहा हो, तो क्या उसे न्याय आज मिलेगा या कई साल बाद? क्योंकि देर से मिला न्याय सिर्फ एक कानूनी समस्या नहीं है। कई बार वह लोकतंत्र में खो चुके भरोसे की कीमत भी बन जाता है।


