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वोट, SIR और चुनाव आयोग पर सबसे बड़ा सवाल: क्या अब जवाबदेही से बच पाना संभव है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 सितंबर 2026

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग सिर्फ एक सरकारी संस्था नहीं है। यह वह संवैधानिक संस्था है जिस पर सत्ता बदलने की पूरी प्रक्रिया का भरोसा टिका है। इसलिए जब उसी संस्था के भीतर से उसके कामकाज पर गंभीर सवाल उठें, जब 3 सदस्यीय आयोग के 2 सदस्य किसी फैसले पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज कराएं और जब उन आपत्तियों में कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” कहा जाए, तो देश में सवाल उठना स्वाभाविक है। इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच ने इसी वजह से चुनाव आयोग को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, SIR की प्रक्रिया और मतदाता डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।

लेकिन यहीं एक जरूरी सवाल और है। क्या इन 14 आपत्तियों का मतलब यह साबित हो गया कि देश में “वोट चोरी” हुई और नरेंद्र मोदी या BJP को अवैध तरीके से चुनाव जिताया गया? उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता। इंडियन एक्सप्रेस की जांच ने आयोग के भीतर गंभीर मतभेद और प्रक्रियागत सवाल जरूर सामने रखे हैं, लेकिन उसने यह साबित नहीं किया कि किसी चुनाव का परिणाम वोट चोरी के कारण बदला गया। खुद रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में कहा गया है कि SIR के दौरान हुई कटौतियों और चुनाव परिणामों के बीच कोई प्रमाणित संबंध सामने नहीं आया। इसलिए असली मुद्दा यह है कि जिस संस्था को हर वोट की निष्पक्षता की रक्षा करनी है, उसकी आंतरिक प्रक्रिया इतनी पारदर्शी क्यों नहीं दिख रही कि इन सवालों का स्पष्ट जवाब मिल सके।

सबसे गंभीर बात Form 6 को लेकर उठी। यही वह फॉर्म है जिसके जरिए कोई नया मतदाता मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल इसमें SIR से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया और आवेदन आगे बढ़ाने के लिए उस सवाल का जवाब देना जरूरी हो गया। विवेक जोशी ने मई में ही इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि Form 6 में इस तरह बदलाव के लिए नियमों में संशोधन जरूरी था। सुखबीर सिंह संधू ने अगस्त में इस बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग की। सवाल सीधा है—अगर आयोग के 2 सदस्य किसी प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठा रहे थे, तो उस पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण क्यों नहीं आया?

दूसरा बड़ा सवाल मतदाता डेटा के नियंत्रण का है। रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के “क्रमिक केंद्रीकरण” पर चिंता जताई और यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट की बात कही कि बदलाव करने की अनुमति सिर्फ संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो। संधू ने भी राज्य स्तर के अधिकारियों की ERONet तक पहुंच को लेकर सवाल उठाए। यह सिर्फ तकनीकी मामला नहीं है। मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी जमीन है। अगर नाम जोड़ने, हटाने या सुधारने की डिजिटल प्रक्रिया में अधिकारों की स्पष्ट सीमा और निगरानी नहीं होगी, तो हर गलती राजनीतिक विवाद बन सकती है और हर विवाद चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है।

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला इस चिंता को और ठोस बनाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन मतदाताओं को Electoral Registration Officers ने योग्य माना था, लेकिन सॉफ्टवेयर में जरूरी प्रक्रिया पूरी करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था और अंततः वे अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके। 97 नाम संख्या में छोटे लग सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र का सिद्धांत संख्या से तय नहीं होता। एक योग्य नागरिक का नाम भी अगर तकनीकी या प्रशासनिक गलती से मतदाता सूची से बाहर रह जाता है, तो सवाल उठता है कि व्यवस्था में गलती सुधारने की पर्याप्त सुरक्षा मौजूद है या नहीं।

पश्चिम बंगाल का SIR विवाद भी इसी बहस के केंद्र में है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से ज्यादा ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की। कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें 22.21 लाख नाम जोड़ने और 16.10 लाख नाम हटाने से जुड़ी थीं। इस पूरी प्रक्रिया ने यह सवाल जरूर पैदा किया है कि मतदाता सूची में बदलाव का फैसला कितना पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन इन आंकड़ों को सीधे “वोट चोरी” का प्रमाण कहना भी तथ्य से आगे जाना होगा।

फिर आता है राजनीतिक सवाल। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और चुनाव व्यवस्था को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने “वोट चोरी”, “कानून चोरी” और “संस्था चोरी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। राहुल गांधी का दावा है कि चुनाव प्रक्रिया में ऐसी खामियां सामने आई हैं जो लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा हैं। यह उनका राजनीतिक आरोप और आकलन है; इसका अंतिम प्रमाण या निष्कर्ष अभी किसी न्यायिक संस्था ने नहीं दिया है।

विपक्ष के दूसरे नेताओं ने भी इस रिपोर्ट को अपने पहले से उठाए जा रहे सवालों की पुष्टि के रूप में देखा है। उद्धव ठाकरे ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और नए चुनाव की मांग की है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने भी आयोग से जवाब मांगा है। अब खबर यह है कि विपक्ष संसद के दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर नया नोटिस लाने की तैयारी कर रहा है। राज्यसभा में 24 अप्रैल को दिया गया पिछला नोटिस अभी लंबित है और INDIA bloc के दल इस मुद्दे पर संयुक्त रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों को अलग तरीके से देखा है। आयोग की ओर से कहा गया है कि अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव किसी संस्थान के भीतर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं और केवल आंतरिक नोट्स के आधार पर पूरी संस्था के फैसलों की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। आयोग का पक्ष है कि SIR और अन्य प्रमुख फैसले अंततः सर्वसम्मति से लिए गए। BJP ने भी विपक्ष के हमलों को राजनीतिक अभियान बताया है और कहा है कि आयोग के भीतर मतभेद होना लोकतांत्रिक संस्था में विचार-विमर्श का हिस्सा है।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राहुल गांधी सही हैं या BJP। असली सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग जनता के सामने हर विवादित फैसले की पूरी प्रक्रिया, हर आपत्ति और उसके जवाब को पारदर्शी तरीके से रखने के लिए तैयार है? अगर 2 चुनाव आयुक्तों ने 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं, तो देश को यह जानने का अधिकार है कि उन आपत्तियों पर अंतिम फैसला क्या हुआ, किस आधार पर हुआ और किसकी जिम्मेदारी थी। लोकतंत्र में चुनाव जीतने वाली पार्टी की वैधता का सबसे मजबूत आधार यही होता है कि चुनाव कराने वाली संस्था पर जनता का भरोसा कायम रहे।

यही वजह है कि आज “वोट चोरी” का राजनीतिक नारा अपनी जगह हो सकता है, लेकिन उससे भी बड़ा मुद्दा वोट की विश्वसनीयता है। अगर चुनाव आयोग कहता है कि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ, तो उसे सारे सवालों के दस्तावेजी जवाब सामने रखने चाहिए। अगर विपक्ष कहता है कि चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई, तो उसे भी आरोपों को प्रमाण और ठोस रिकॉर्ड के साथ आगे बढ़ाना होगा। संसद, सुप्रीम कोर्ट और जनता—तीनों के सामने अब यही असली कसौटी है। क्योंकि चुनाव सिर्फ सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं है; यह नागरिक के उस अधिकार का नाम है जिसमें उसका एक वोट सत्ता के भविष्य को तय करता है। और उस एक वोट पर उठे सवाल का जवाब जितना साफ होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

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