ABC NATIONAL NEWS | विदेश | 21 अक्टूबर 2026
सऊदी अरब में मक्का क्षेत्र की एक मस्जिद में अश्लील हरकत के मामले में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने से कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, नजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर को 14 अक्टूबर को मौत की सजा दी गई। मंत्रालय ने बताया कि अदालत ने दोनों को दोषी ठहराने के बाद ‘ताजीर’ के तहत यह सजा सुनाई थी।
हालांकि, इस मामले में अपराध की पूरी जानकारी, मुकदमे की तारीखों, बचाव के लिए वकील की उपलब्धता और अपील के अवसर को लेकर अब तक विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। बांग्लादेश सरकार ने भी कहा है कि उसे मामले से जुड़े अदालती दस्तावेज नहीं मिले हैं और वह सऊदी अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांग रही है।
मीडिया रिपोर्टों में दोनों को पति-पत्नी बताया गया है, लेकिन सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने उन्हें केवल एक पुरुष और एक महिला के रूप में संदर्भित किया है। दोनों के वैवाहिक संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
क्या है ‘ताजीर’, जिसके तहत दी गई मौत की सजा?
‘ताजीर’ इस्लामी न्यायशास्त्र में विवेकाधीन सजा की एक श्रेणी है। इसके तहत अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधीश सजा तय कर सकता है। यह ‘हुदूद’ और ‘किसास’ से अलग है, जिनकी कानूनी व्यवस्था और सजा के आधार अलग-अलग हैं।
इस्लामी कानून की पारंपरिक व्याख्या में हुदूद उन अपराधों से संबंधित है जिनके लिए धार्मिक कानून में निर्धारित सजाओं का प्रावधान है। किसास मुख्य रूप से हत्या और शारीरिक चोट जैसे मामलों में प्रतिशोध या उसके बदले मुआवजे की व्यवस्था से जुड़ा है। वहीं, ताजीर के मामलों में सजा तय करने के लिए न्यायिक विवेक की भूमिका अधिक होती है।
मानवाधिकार संगठनों ने सऊदी अरब की आपराधिक न्याय व्यवस्था में स्पष्ट लिखित कानूनों और न्यायिक फैसलों की पारदर्शिता को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब अपराध की परिभाषा और सजा तय करने में न्यायाधीश के विवेक की व्यापक भूमिका हो, तो आरोपी के लिए कानूनी स्थिति को पहले से समझना और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।
फरवरी 2021 में सऊदी अरब ने विवेकाधीन सजाओं से संबंधित एक लिखित दंड संहिता तैयार करने की योजना की जानकारी दी थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उस समय सामने आए मसौदे की समीक्षा करते हुए चिंता जताई थी कि इससे मौत की सजा के इस्तेमाल पर पर्याप्त रोक नहीं लगेगी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित संहिता बाद में लागू हुई या नहीं।
सऊदी सरकार ने क्या बताया?
सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने सरकारी समाचार एजेंसी के माध्यम से जारी बयान में कहा कि सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों को गिरफ्तार किया था। जांच के बाद मामला अदालत में पहुंचा, जहां उन्हें दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई। मंत्रालय के अनुसार, फैसले के बाद शाही आदेश के जरिए सजा पर अमल की मंजूरी दी गई।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने अपराध की गंभीरता, मस्जिद की पवित्रता और घटना की परिस्थितियों को सजा तय करने के आधार के रूप में देखा।
हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने अपराध की प्रकृति, संबंधित मस्जिद का नाम और मुकदमे की विस्तृत कार्यवाही सार्वजनिक नहीं की है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि दोनों आरोपियों को अपने बचाव में वकील उपलब्ध कराया गया था या उन्हें अपील करने का अवसर मिला था।
बांग्लादेशी परिवार को मीडिया से मिली मौत की खबर
बांग्लादेशी समाचार पत्र ‘द डेली स्टार’ की रिपोर्ट के अनुसार, नजरुल इस्लाम के परिवार को उनके बेटे की मौत की सजा के बारे में मीडिया के जरिए जानकारी मिली। परिवार का कहना है कि उन्हें पता था कि नजरुल जेल में हैं, लेकिन सजा पर अमल से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं मिली।
रिपोर्ट के मुताबिक, नजरुल के पिता अब्दुल बासिर ने कर्ज लेकर नवंबर 2022 में अपने बेटे को रोजगार की तलाश में सऊदी अरब भेजा था। वहां नजरुल को सफाईकर्मी का काम मिला। परिवार का दावा है कि सऊदी पहुंचने के करीब छह महीने बाद ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया था और वह तीन साल से अधिक समय तक जेल में रहे।
परिवार के अनुसार, नजरुल हर रविवार को फोन पर उनसे बात करते थे। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें अपने बेटे के मामले में कानूनी प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं मिली। अब परिवार चाहता है कि नजरुल का शव बांग्लादेश वापस लाया जाए।
ये विवरण बांग्लादेशी मीडिया में प्रकाशित परिवार के बयानों पर आधारित हैं। सऊदी अधिकारियों ने इन दावों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
बांग्लादेश सरकार ने मांगा स्पष्टीकरण
बांग्लादेश के विदेश मामलों के अधिकारियों ने घटना पर चिंता जताई है। विदेश मामलों की राज्य मंत्री शामा ओबैद इस्लाम के अनुसार, बांग्लादेश सरकार को अब तक अदालती आदेश की प्रति नहीं मिली है। सरकार ने सऊदी अरब से आरोपों और कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानकारी मांगी है।
बांग्लादेश ने सऊदी अरब के राजदूत के समक्ष भी यह मामला उठाया है। बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ढाका को मौत की सजा दिए जाने की जानकारी पहले आधिकारिक माध्यमों के बजाय समाचारों से मिली।
विदेश मामलों के अधिकारियों ने कहा है कि सऊदी अरब से आवश्यक जानकारी मिलने के बाद सरकार आगे के कदम तय करेगी। इसमें दोनों के शवों को बांग्लादेश वापस लाने का मुद्दा भी शामिल है।
विदेशी नागरिकों के अधिकारों पर क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
बांग्लादेश और सऊदी अरब, दोनों वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशंस के पक्षकार हैं। इस समझौते के अनुच्छेद 36 के तहत हिरासत में लिए गए विदेशी नागरिक को उसके कांसुलर अधिकारों की जानकारी दी जानी चाहिए। यदि वह अपने देश के वाणिज्य दूतावास को सूचना देने का अनुरोध करता है, तो संबंधित अधिकारियों को सूचना देने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
कन्वेंशन के अनुच्छेद 37 में किसी विदेशी नागरिक की मृत्यु होने पर संबंधित कांसुलर अधिकारियों को सूचना देने से जुड़े प्रावधान भी हैं।
इस मामले में अहम सवाल यह है कि क्या दोनों नागरिकों को उनके कांसुलर अधिकारों की जानकारी दी गई थी और क्या बांग्लादेश के संबंधित अधिकारियों को समय रहते सूचित किया गया था। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से इन सवालों का निर्णायक उत्तर नहीं मिलता।
मौत की सजा के इस्तेमाल पर भी बहस
सऊदी अरब दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां मौत की सजा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य संगठनों ने वहां मृत्युदंड के इस्तेमाल, निष्पक्ष सुनवाई और पारदर्शिता को लेकर समय-समय पर चिंता जताई है।
इस मामले में विवाद केवल सजा की गंभीरता तक सीमित नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई मिली या नहीं, उनके बचाव के अधिकारों की रक्षा हुई या नहीं और उनके परिवार तथा संबंधित देश को पर्याप्त जानकारी दी गई या नहीं।
मक्का की मस्जिद में हुई घटना को लेकर सऊदी अधिकारियों का पक्ष सामने है, लेकिन मुकदमे से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य अभी सार्वजनिक नहीं हैं। इसलिए कानूनी प्रक्रिया पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले अदालत के दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक जवाब का इंतजार करना जरूरी है।
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है: गंभीर अपराध के आरोप में भी क्या हर व्यक्ति को पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया, कानूनी बचाव और अपने कांसुलर अधिकारों का पूरा अवसर मिला?



