ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026
क्या अदालत को भी यह डर सताता है कि कहीं सरकार के खिलाफ आंदोलन से सत्ता की नींव न हिल जाए? शांतिपूर्ण विरोध करने वालों पर इतनी सख्ती क्यों? और सबसे बड़ा सवाल—क्या अदालत का काम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना है या उन पाबंदियों को मजबूत करना, जो लोगों की आवाज को सीमित कर सकती हैं?
कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के नेताओं अशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई के बाद ये सवाल फिर चर्चा में हैं। दोनों नेताओं को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिया गया था। यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में नाम काटे जाने को लेकर था।
21 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने दोनों नेताओं की रिहाई का आदेश दिया। लेकिन रिहाई के साथ शर्तें भी जुड़ी हैं। दोनों को 50-50 हजार रुपये के निजी और जमानती बांड देने, हर सुनवाई पर अदालत में उपस्थित रहने और शांति बनाए रखने का निर्देश दिया गया। उन्होंने यह लिखित आश्वासन भी दिया कि जंतर-मंतर जब तक अधिसूचित प्रदर्शन स्थल नहीं है, वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे और आगे के आंदोलन संविधान के दायरे में करेंगे।
जंतर-मंतर पर पाबंदी, लेकिन सवालों पर नहीं?
जंतर-मंतर लंबे समय से दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। अगर किसी स्थान को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वहां प्रदर्शन पर प्रशासनिक प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
लेकिन सवाल यह है कि जब किसी जगह पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि नागरिकों की आवाज उठाने का अधिकार भी सीमित हो जाए? क्या प्रशासन और अदालतों की जिम्मेदारी केवल प्रतिबंधों का पालन कराना है, या यह सुनिश्चित करना भी है कि नागरिकों को अपनी शिकायत दर्ज कराने और शांतिपूर्ण विरोध करने का व्यावहारिक अवसर मिले?
किसी भी लोकतंत्र में स्थान, समय और सुरक्षा से जुड़े उचित नियम हो सकते हैं। लेकिन ऐसे नियमों का इस्तेमाल विरोध की आवाज को पूरी तरह दबाने के लिए नहीं होना चाहिए। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल कौन-सा है और वहां नागरिकों को अपनी बात रखने की कितनी स्वतंत्रता है।
क्या सरकार के खिलाफ बोलना व्यवस्था के खिलाफ होना है?
CJP नेताओं का प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के सवालों से जुड़ा था। इन आरोपों और दावों की जांच अपने कानूनी और संवैधानिक रास्ते से होनी चाहिए। किसी आरोप को बिना जांच के सच नहीं माना जा सकता, लेकिन सवाल उठाने वालों को केवल सवाल उठाने के कारण संदेह की नजर से देखना भी लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।
चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना, मतदाता सूची में गड़बड़ियों की शिकायत करना और संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से जवाब मांगना अपने आप में अपराध नहीं है। हां, यदि किसी प्रदर्शन में कानून तोड़ा जाता है, पुलिस के काम में बाधा पहुंचाई जाती है या हिंसा होती है, तो उन विशिष्ट आरोपों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर शांतिपूर्ण असहमति और अवैध गतिविधियों के बीच का अंतर स्पष्ट रखा जाए।
अदालत है या सरकार की एजेंट?
अदालत को नरेंद्र मोदी की एजेंट कहना एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसके समर्थन में ठोस प्रमाण जरूरी हैं। किसी एक आदेश या शर्त के आधार पर पूरी न्यायपालिका को सरकार का एजेंट घोषित करना उचित नहीं होगा। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि अदालतों के फैसलों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। लोकतंत्र में न्यायिक आदेशों की आलोचना, उनकी संवैधानिकता पर बहस और नागरिक अधिकारों पर उनके प्रभाव का मूल्यांकन पूरी तरह जायज है।
इस मामले में असली सवाल किसी संस्था को अपमानजनक नाम देने से आगे का है: क्या लगाई गई शर्तें जरूरी और उचित हैं? क्या विरोध के लिए कोई वास्तविक विकल्प उपलब्ध है? क्या नागरिकों को अपनी राजनीतिक असहमति व्यक्त करने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है?
इन सवालों के जवाब आदेशों, कानून और उनके व्यावहारिक प्रभाव के आधार पर मिलने चाहिए—न कि किसी संस्था के प्रति अंधविश्वास या पूर्वाग्रह के आधार पर।
लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां है?
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने, नीतियों का विरोध करने और सत्ता से जवाब मांगने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अगर किसी आंदोलन में कानून का उल्लंघन होता है, तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन अगर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सीमित होते जाएं और हर आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाने लगे, तो नागरिकों के अधिकार केवल कागजों तक सिमटने का खतरा पैदा होता है।
CJP नेताओं की रिहाई राहत की खबर है, लेकिन उसके साथ लगी शर्तें एक बड़ी बहस को जन्म देती हैं। सवाल यह नहीं कि किसी पार्टी या नेता को कितनी छूट मिले। सवाल यह है कि एक आम नागरिक, छात्र, किसान या राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी शिकायत लेकर कहां जाए और अपनी बात कैसे रखे?
सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं होते। अदालतों की विश्वसनीयता भी इसी में है कि नागरिकों को यह भरोसा रहे—उनकी आवाज सत्ता के खिलाफ हो, तब भी कानून और संविधान उनकी रक्षा करेंगे।



