ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026
लोकतंत्र में सरकार बदलने की बात कोई अपराध नहीं है। सरकारें चुनाव में बदलती हैं, जनता के फैसले से बदलती हैं और राजनीतिक विरोध भी इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में जब दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का जिक्र आता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस शब्द को लेकर इतनी चिंता क्यों है?
अदालत ने कहा कि सत्ता परिवर्तन आम तौर पर मतदान के जरिए होता है। यह बात अपनी जगह सही है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और अगली बार सरकार बदलने की मांग करना भी नागरिकों का अधिकार है। सरकार बदलने की मांग और हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों के जरिए सत्ता बदलने की कोशिश—दोनों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।
विरोध का मुद्दा बदलना अपने आप में अपराध कैसे?
दिल्ली हाई कोर्ट CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत बढ़ाने के खिलाफ याचिका पर सुनवाई कर रहा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि संगठन के विरोध के मुद्दे समय के साथ क्यों बदलते रहे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि शांति भंग होने की आशंका हो, तो संगठन की प्रकृति, उद्देश्य और गतिविधियों पर विचार करना प्रासंगिक हो सकता है।
यह सवाल जांच और कानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में पूछा जा सकता है। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में किसी संगठन का मुद्दा बदलना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। छात्र आंदोलनों से लेकर नागरिक अधिकारों के अभियानों तक, कई संगठन समय और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग मुद्दे उठाते हैं।
असल सवाल यह होना चाहिए कि क्या किसी खास विरोध प्रदर्शन में कानून तोड़ा गया, हिंसा हुई या सार्वजनिक शांति को वास्तविक खतरा पैदा हुआ। यदि ऐसा हुआ है, तो सबूतों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल विरोध के मुद्दे बदलने से किसी संगठन की मंशा को गलत मान लेना उचित नहीं होगा।
‘रेजीम चेंज’ कहना लोकतंत्र के खिलाफ कैसे?
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने CJP संस्थापक अभिजीत दीकपे और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सत्ता परिवर्तन की मांग लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। बीजेपी ने उनके बयान की आलोचना करते हुए दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के पीछे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का उद्देश्य है।
इन बयानों के बीच एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। किसी सरकार को चुनाव में हराने की मांग करना लोकतंत्र का हिस्सा है। वहीं, हिंसा या गैरकानूनी तरीकों से सत्ता बदलने की कोशिश अलग मामला है और उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।
इसलिए ‘रेजीम चेंज’ शब्द का इस्तेमाल भर किसी आंदोलन को गैरकानूनी या देशविरोधी ठहराने का आधार नहीं बन सकता। संदर्भ, वास्तविक गतिविधियां और उपलब्ध सबूत ही महत्वपूर्ण होने चाहिए।
अदालत की चिंता और नागरिकों के अधिकार—दोनों जरूरी
अदालत का काम कानून और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों पर विचार करना है। यदि किसी विरोध प्रदर्शन से शांति भंग होने की वास्तविक आशंका हो, तो उस पर न्यायिक समीक्षा हो सकती है। लेकिन इसी के साथ शांतिपूर्ण विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया का महत्व भी कम नहीं होता।
सौरव दास और आशुतोष रांका को 13 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था। उनकी याचिका न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने से संबंधित थी। सुनवाई में अदालत ने उनकी उम्र और संगठन की प्रकृति पर भी टिप्पणियां कीं। हालांकि, किसी व्यक्ति का Gen Z होना या न होना उसके कानूनी अधिकारों का निर्धारण नहीं करता।
इस मामले में मुख्य सवाल यही है कि हिरासत और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े फैसले कानून, तथ्यों और उचित प्रक्रिया के आधार पर लिए जा रहे हैं या नहीं। अदालत की टिप्पणियों को अंतिम फैसला नहीं समझना चाहिए; मामले में कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना भी जरूरी है
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं आती। इसकी मजबूती इस बात से भी तय होती है कि नागरिक सरकार की आलोचना कर सकते हैं या नहीं, विरोध कर सकते हैं या नहीं और सत्ता परिवर्तन की मांग रख सकते हैं या नहीं।
यदि कोई आंदोलन कानून तोड़ता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहे हैं, तो उनकी मांगों को केवल राजनीतिक असहमति के कारण संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार बदलने की मांग लोकतंत्र का हिस्सा है; कानून तोड़ना अलग सवाल है। दोनों के बीच अंतर बनाए रखना अदालत, सरकार, पुलिस और नागरिक समाज—सभी के लिए जरूरी है।



